बच्चों को मत बनाइये गैजेट्स का गुलाम दीजिए विचारों का खुला आकाश

गैजेट्स की दुनिया बहुत चकाचौंध कर देने वाली है। आज हर बच्चे के चारों और मोबाइल सहित दुनियाभर के गैजेट्स हैं जो उसे तकनीक का गुलाम बना रहे हैं। उसकी स्वाभाविकता, बचपन और बाल सुलभता छीन रहे हैं। स्कूलों के कक्षा-कक्ष स्मार्ट हो गए हैं, अब खेल के मैदानों में चिंता रहित खेलकूद और मस्ती भरे बचपन के द

 
बच्चों को मत बनाइये गैजेट्स का गुलाम दीजिए विचारों का खुला आकाश

गैजेट्स की दुनिया बहुत चकाचौंध कर देने वाली है। आज हर बच्चे के चारों और मोबाइल सहित दुनियाभर के गैजेट्स हैं जो उसे तकनीक का गुलाम बना रहे हैं। उसकी स्वाभाविकता, बचपन और बाल सुलभता छीन रहे हैं। स्कूलों के कक्षा-कक्ष स्मार्ट हो गए हैं, अब खेल के मैदानों में चिंता रहित खेलकूद और मस्ती भरे बचपन के दिन नहीं दिखाई देते, बच्चा घर में ही किसी कोने में किसी न किसी वर्चुअल दुनिया में गुमसुम खोया हुआ अपना वक्त बिता रहा है। माता-पिता ध्यान दें कि कहीं इसी वजह से उसकी मैमरी कमजोर तो नहीं हो गई? उसका व्यवहार बचपन में बड़ों जैसा तो नहीं हो गया है? आदतें तो अचानक नहीं बदल रहीं?

ये विचार रविवार को बेदला स्थित लर्न एंड ग्रो इंटरनेशनल प्री-स्कूल में बच्चों के मनोविज्ञान पर सुबह 11 से 12 बजे तक आयोजित हुए विशेष सेमिनार में स्कूल के डायरेक्टर डेरेक एंड फियोना टॉप ने व्यक्त किए। उन्होंने सेमिनार में मौजूद बच्चों के अभिभावकों को बाल मनोविज्ञान की कई गूढ़ बातों को प्रजेंटेशन के माध्यम से बताते हुए कहा कि बच्चे का कोमल और निर्मल मन हमेशा वह सीखने को तत्पर रहता है जिसे हम परिवेश के रूप में उसे उपलब्ध करवाते हैं। डेरेक और फियोना ने भारतीय पारम्परिक ज्ञानार्जन पद्धित को सर्वश्रेष्ठ बताया। उन्होंने कहा कि नींव मजबूत होगी तो हमारा कल मजबूत होगा। बच्चों को कई सामाजिक बुराइयों से बचाया जा सकेगा।

मनोविशेषज्ञ डॉ. स्वाति गोखरू ने बताया कि गैजेट्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व पर असर डाल रही है जिससे वे ब्लू व्हेल जैसे गेम की ओर आकर्षित हो रहे हैं, कई बार डिपे्रशन के शिकार होकर घातक कदम उठा रहे हैं, फेसबुक और सेल्फी की दुनिया में खोकर वैचारिक मौलिकता खोने लगे हैं। इनसे बचना है तो पेरेंट्स को सबसे पहले खुद सुधरना होगा। जरूरी मोबाइल कॉल्स पूरे करके ही दफ्तर से घर आएं। घर पर टीवी, इंटरनेट, लेपटॉप, टेब-मोबाइल में मशगूल रहने की बजाय बच्चों को प्रकृति के करीब ले जाएं। उन्हें नेचुरल क्रिएशन के क्षेत्र में दिमाग के घोड़े दौड़ाने के अवसर दें।

बच्चों को मत बनाइये गैजेट्स का गुलाम दीजिए विचारों का खुला आकाश

मनोविशेषज्ञ डॉ. अजय चौधरी ने इस अवसर पर कहा कि बच्चों की साइकॉलोजी को इस तरह से डिवलप करें ताकि वे अंदर से मजबूत बन सकें, विल पावर मजबूत हो सके। इससे बच्चों का प्रकृति से स्वाभाविक अटैचमेंट बढ़ेगा और परिवार में खुशियों का स्तर भी। सेमिनार में विशेषज्ञों के विचार जानने के लिए अभिभावकों के साथ ग्रांड पैरेंट्स भी पहुंचे। इस अवसर पर प्रश्नोत्तरी सत्र में वैचारिक आदान-प्रदान हुआ।

तकनीक का हो सही इस्तेमाल

मनोविशेषज्ञ डॉ. अजय चौधरी ने बताया कि बदलते परिवेश में हम तकनीक को नकार नहीं सकते मगर उसका सही व उतना ही इस्तेमाल करें जिससे हम जीवन को आसान बना सकें, उसे उलझन नहीं बननें दें। यह सच है कि सोशल मीडिया के कई दिग्गजों ने भी अपने बच्चों को मोबाइल तब तक नहीं दिया, जब वे अपना अच्छा-बुरा सोचने के लायक नहीं बन गए। मनोविश्लेषण तकनीकों के इस्तेमाल और प्रकृति के ज्यादा करीब रहने से बच्चों की बुद्धिमत्ता में जीनियस के स्तर तक की अभिवृद्धि की जा सकती है। इस अवसर पर एम आर भारतीय एजुकेशन के निदेशक मनोज राजपुरोहित ने भी विचार व्यक्त किये।

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