गृहमंत्री कटारिया अपने ही घर मे घिरते नज़र आ रहे है

पिछले 15 साल से विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने वाले और उदयपुर विधानसभा सीट से पांच बार चुने जाने वाले नेता जो मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश रखते है, वह इस बार अपने ही घर मे घिरते नजर आ रहै है। एक बात जो उदयपुर के विधानसभा क्षेत्र में

 

गृहमंत्री कटारिया अपने ही घर मे घिरते नज़र आ रहे है

पिछले 15 साल से विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने वाले और उदयपुर विधानसभा सीट से पांच बार चुने जाने वाले नेता जो मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश रखते है, वह इस बार अपने ही घर मे घिरते नजर आ रहै है। एक बात जो उदयपुर के विधानसभा क्षेत्र में अक्सर सुनने को मिलती थी कि ‘भाईसाब’ व्यवहार की राजनीति को बड़े अच्छे ढंग से समझते है और उसे 5वे साल भुना भी लेते है जिसके चलते हर बार उनके खिलाफ बहती हवा उनके पक्ष में हो चलती है। पर लगता है इस बार ये हवा उनसे बेरुखी हो चली है। कटारिया को चक्रव्यूह में फांसने में उनके अपने ही लोग कामयाब नज़र आ रहे है। ये बात तब ओर भी चिंता बढ़ाने वाली है जब कांग्रेस की तरफ से कद्दावर महिला नेता गिरिजा व्यास का नाम तय हो चूका है।

गृहमंत्री के लिए चक्रव्यूह तैयार करने वालो में कई नाम शामिल है जैसे दलपत सुराणा, भरत कुमावत और प्रवीण रतलिया।

बात करे दलपत सुराणा की तो जनसंघ के स्तम्भो में से एक दलपत सुराणा को आगे किया है भैरोंसिंह शेखावत के मंच ने जो जनता सेना के बैनर तले ताल ठोक रहे है। भैरोसिंह शेखावत मंच लम्बे समय से कोशिशें करता रहा है मगर प्रत्याशी को लेकर हर बार चूकता रहा है। लेकिन इस बार जनता सेना के प्रमुख और वल्लभनगर विधानसभा के विधायक रणधीर सिंह भींडर का साथ मिलने से गृहसेवक कटारिया की मुश्किलें बढती नज़र आ रही है। मंच ने इसी साल मेवाड़ में हाइकोर्ट की मांग को लेकर भी जबरदस्त प्रदर्शन किया था जिसका खामियाजा इस चुनाव में भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। ये कटारिया जैसे नेता के लिए इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि मंच से जुड़े सभी लोग जनसंघ के दौर में मेवाड़ में जुड़े थे जिन्हें आज की भाजपा में हाशिये पर धकेल दिया गया। अब ये देखने वाली बात होगी कि दलपत सुराणा कांग्रेस से कैसे टक्कर लेते है क्योंकि वह कह चुके है कि उनकी लड़ाई भाजपा से नही बल्कि कांग्रेस से है।

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इसी सूची में दूसरा नाम है भरत कुमावत का। कुमावत समाज भाजपा का पारम्परिक वोट माना जाता रहा है, हालांकि राज्य भर में कुमावत समाज ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर अपनी मांग तेज कर दी है जिसका एक दृश्य मंत्री सुरेंद्र गोयल का भाजपा का टिकट कटने के बाद दिखा। गोयल ने निर्दलीय नामांकन भरने की बात कहते हुए समाज को एकजूट किया। इतना ही नही भरत कुमावत का ये भले ही पहला चुनाव हो लेकिन राजनीतिक पृष्ठभूमि के मामले में वह नए नही दिखते। उनके चाचा युधिष्ठिर कुमावत भाजपा का बहुत बड़ा चेहरा माने जाते रहे है और नगर निकाय के सभापति भी रह चुके है। भरत कुमावत ने 2012 के अन्ना आंदोलन से जुड़ने के बाद आम आदमी पार्टी को उदयपुर में लाने में काफी मेहनत की, जिसका परिणाम रहा कि राजस्थान के संगठन ने उन्हें राज्य प्रवक्ता और विधानसभा प्रत्याशी बना दिया। अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक बेहद दिलचस्प मुहिम को लाते हुए भरत कुमावत जनता से चंदा लेने घर घर तो जा ही रहे है साथ ही इस चंदे के बदले श्रमदान भी कर रहे है। देखने वाली बात यह होगी गुलाबचंद कटारिया के वोट कितना काट पाते है और मुख्य मुकाबले में खुद को कैसे स्थापित करते है, क्यूंकि उनका और उनकी पार्टी का राजस्थान में यह पहला चुनाव है।

अंतिम और बेहद दिलचस्प नाम है प्रवीण रतलिया का, जो नाटकीय ढंग से गुलाबचंद कटारिया को टक्कर दे रहे है। सबसे युवा समाज सेवक का दावा करने वाले और अवार्ड पाने वाले रतलिया नरेंद्र मोदी विचार मंच के प्रदेश अध्यक्ष है। पिछले 2 साल से कई बड़े कार्यक्रम कर चुके रतलिया शायद बीजपी से टिकट मिलने को लेकर ऐसा आश्वस्त थे कि अब जब उन्हें बीजेपी ने टिकट नही दिया और उदयपुर इकाई के संगठन ने उनके बीजेपी से ही किसी तरह के सम्बंध को नकार दिया है तो वह प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कटारिया पर सीधा हमला बोल रहे है। कभी उनको हत्यारा बता रहे है तो कभी उनके विदेशों में सम्पत्ति अर्जित करने का दावा कर रहे है। इन दिनों में वे जिस चीज को लेकर चर्चा में है उसका कारण है उनकी बदजुबानी जिसमे उन्होंने गुलाबचन्द कटारिया को हार्ट अटैक देने की बात की जिसके बाद उनकी बुरी खिल्ली उड़ी। मगर वह युवाओ में अपनी लोकप्रियता का दावा करते हुए जीत की बात कर रहे है। युवा वर्ग बेशक महत्वपूर्ण हो, लेकिन राजस्थान में बीजेपी के खिलाफ बहती सत्ता विरोधी लहर में वह कैसे खुद को साबित कर पाएंगे जबकि वह अब तक भाजपा सरकार की नीतियों का समर्थन करते रहे है और अब जब टिकट कट गया है तो वह भाजपा सरकार के गृहमंत्री के संहार तक की बात कर रहे है। प्रोफेशनल तरीके अपनाकर लोकप्रियता हासिल करने वाले रतलिया कही ना कही राजनीतिक समझ के मामले में रणनीतिक चूक करते नज़र आ रहे है, जिसे सोशल मीडिया पर उनकी महत्वकांक्षा या अपरिपक्वता भी कहा जा रहा है। पर जो भी हो एक बात तो तय है कि जो भी वोट प्रवीण रतलिया के खाते में जायेगा उसका खामियाजा गृहसेवक को भुगतना पड़ेगा।

अंत में बात करते है गिरिजा व्यास की गिरिजा व्यास की सुश्री व्यास कांग्रेस की बड़ी नेता रह चुकी है एवं 1985 में उदयपुर विधानसभा सीट से गुलाबचंद कटारिया को परास्त कर चुकी है। एवं दो बार उदयपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। हालाँकि इन्हे उदयपुर से हार का स्वाद भी चखना पड़ा है। गिरिजा व्यास नरसिंह राव सरकार में उपमंत्री भी रह चुकी है एवं मनमोहन सरकार के दौरान महिला राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्ष के रूप में काम कर चुकी है। इस बार कांग्रेस की तरफ से फिर से उदयपुर के मैदान में कटारिया के सामने है। कटारिया के सामने अगर भाजपा की गुटबाजी और अंतरकलह कड़ी है तो कांग्रेस भी इस रोग से अछूती नहीं। हालाँकि इस बार कांग्रेस पहले के मुकबले में सशक्त और एकजुट नज़र आ रही है, वहीँ गिरिजा व्यास के सामने खुद का स्वास्थ्य भी चुनौती बनकर खड़ा है। वह अभी कुछ दिनों पहले अस्पताल से लौटी है।

कुल मिलाकर इस बार मुकाबला रोचक है। परिणाम जनता जनार्दन के हाथो में है।

1951 से लेकर अब तक उदयपुर विधानसभा का सफर

वैसे तो यह सीट राजस्थान के कद्दावर मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया की परम्परागत सीट रही है। लेकिन सुखाड़िया के बाद इस सीट पर जनसंघ से लेकर भाजपा ने भी अपना वर्चस्व बनाया है। स्वर्गीय मोहनलाल सुखाड़िया इस सीट से 1951 से लेकर 1967 तक लगातार चार बार विजयी रहे चुके है। 1972 में पहली बार इस सीट से भानु कुमार शास्त्री ने जनसंघ के परचम तले जीत हासिल की थी। उसके बाद पहली बार 1977 जनता पार्टी (जेपी) के टिकट पर गुलाब चंद कटारिया ने फ़तेह हासिल की। 1980 के चुनाव में भाजपा के बैनर तले कटारिया ने फिर से अपना दम दिखाया। वहीँ 1985 में कटारिया को कांग्रेस की गिरिजा व्यास ने पटखनी दी थी। उसके बाद कटारिया सीट बदलकर बड़ी सादड़ी चले गए और उदयपुर में 1990 और 1995 का चुनाव में भाजपा के शिव किशोर सनाढय ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। 1998 में कांग्रेस ने आखिरी बार त्रिलोक पूर्बिया के रूप में जीत हासिल की थी। उसके बाद 2003, 2008 और 2013 के चुनाव में लगातार कटारिया इस सीट से अपना दबदबा कायम रखे हुए है।

Views in the article are solely of the author Mr, Gaurav Kumar 

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