अंतर्धार्मिक, अंतर्जातीय विवाह और पंथनिरपेक्षता

अगस्त की एक बरसाती शाम को बहन ने बताया कि हमारे परिवार के कुछ घनिष्ठ मित्रों ने सोशल मीडिया पर एक आम राजनीतिक चर्चा को हमारे परिवार में हुए अन्तरधार्मिक विवाहों और हमारे सैक्युलर विश्वासों एवं व्यवहारों के एक असभ्य विश्लेषण में बदल दिया। हमने स्वयं अपने कुछ बहुत ही प्रिय साथियों में ऐसा ही परिवर्तन पिछले छह वर्षों के दौरान, और विशेषकर पिछले छह से बारह माह में देखा है। यह सबकुछ एक विभाजनकारी और छल से भरी छवियाँ पेश करने वाले कथानक के दिन–प्रतिदिन प्रसार और किसी भी प्रकार क

 

अंतर्धार्मिक, अंतर्जातीय विवाह और पंथनिरपेक्षता

अगस्त की एक बरसाती शाम को बहन ने बताया कि हमारे परिवार के कुछ घनिष्ठ मित्रों ने सोशल मीडिया पर एक आम राजनीतिक चर्चा को हमारे परिवार में हुए अन्तरधार्मिक विवाहों और हमारे सैक्युलर विश्वासों एवं व्यवहारों के एक असभ्य विश्लेषण में बदल दिया। हमने स्वयं अपने कुछ बहुत ही प्रिय साथियों में ऐसा ही परिवर्तन पिछले छह वर्षों के दौरान, और विशेषकर पिछले छह से बारह माह में देखा है। यह सबकुछ एक विभाजनकारी और छल से भरी छवियाँ पेश करने वाले कथानक के दिन–प्रतिदिन प्रसार और किसी भी प्रकार के वैकल्पिक कथानक के अभाव का परिणाम है। यह सब, विवाह के सम्बन्ध में पंथनिरपेक्षता (सैक्युलरिज़्म) के विविध विचारों को देखने का सबब बना, जो कि हमारे ननिहाल के कुछ उदाहरणों के साथ यहाँ प्रस्तुत है।

अपने ननिहाल के निकटतम रक्त–सम्बन्धियों के ज्ञात प्रामाणिक इतिहास में हमारी माँ पहली महिला थीं जिन्होंने अन्तरधार्मिक विवाह किया। फिर, उनकी सबसे छोटी बहन ने ‘अन्तरजातीय’ शादी की। उनकी तीन भतीजियों ने भी अन्तरधार्मिक विवाह से कोई गुरेज़ नहीं किया। हमारी माँ से लेकर हमारी सबसे छोटी बहन तक सभी ने अदालत में अपने विवाह का पंजीयन कराया, और उनमें से ज़्यादातर ने विवाह की रस्में हिन्दू व मुस्लिम रीतियों से पूरी कीं। हमारी एक बहन और उनके पति ने अपने दोस्तों के इसरार पर ईसाई रीति से भी विवाह की रस्में अदा कीं।

इन सबने आख़िर क्यों किसी एक धार्मिक रीति से ही विवाह नहीं कर लिया या फिर कोर्ट–मैरिज करके इतिश्री नहीं कर दी? इसका जवाब यह है कि उनके लिए दो व्यक्तियों का साथ आना ख़ुशी की बात है। यह अपने जीवन में केवल उस एक व्यक्ति को शामिल करना भर नहीं है, जिसे आप प्यार करते हैं, बल्कि उस व्यक्ति के क़रीबी और वृहत्तर परिवार को भी सम्मिलित करना और उनमें शरीक़ होना है जिनमें उनके सब रिश्तेदार और दोस्त शामिल हैं।

उनकी मोहब्बत एक ऐसे व्यक्ति का प्रेम है जो जाति और धर्म इत्यादि के उन ठप्पों से आगे देख सकते हैं जिन्हें समाज हमारी मानसिकता पर बचपन से ही अंकित कर देता है, जो उस अपने से भिन्न को और उन दूसरों को भी स्वीकार कर सकते हैं जो कि उनके प्रेम की साक्षात् अभिव्यक्ति के साथ आते हैं, और जो एक–दूसरे के साथ खड़े हो सकते हैं। इसलिए वे अपनी शादी की रस्म अदायगी हर उस तरीक़े से करने में प्रसन्न हैं कि जिसमें उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को ख़ुशी मिलती हो। उन्होंने किसी से भी अपनी स्वीकार्यता की या एक झूठी तसल्ली देने वाली औपचारिक–सी मुस्कान की चाहना नहीं की, बल्कि उनकी चाहत हमेशा साथ होने और समस्त वैविध्य एवं मत–भिन्नताओं के साथ सबसे मिलकर रहने के आनन्दोल्लास की रही। इन सभी युगलों ने प्रेम और आनन्द का जीवन जिया है और आगे भी जीते रहेंगे। वे ऐसा उन तमाम उतार–चढ़ावों के साथ करते रहे हैं और करते रहेंगे, जो ऐसे किसी भी अन्य युगल के जीवन में आते हैं जो बस मोहब्बत में साथ-साथ बने रहना चाहते हैं।

इस आलोक में, क्या हम पंथनिरपेक्षता (सैक्युलरिज़्म) को निम्नलिखित पाँच प्रकारों में देख सकते हैं? एक व्यक्ति की पंथनिरपेक्षता किसी अन्य व्यक्ति को जाति व धर्म इत्यादि के कृत्रिम चश्मों से न देखकर एक ऐसे इन्सान के रूप में देखने में निहित हो सकती है जिसके अपने विचार हैं, और जीवन एवं जीवन यापन के प्रति जिसका अपना विशिष्ट नज़रिया व तौर तरीक़ा है। साथ ही, ऐसे लोगों के लिए भी गुंजाइश रखनी है जो अपने कुछ विचारों को लेकर जड़ व कट्टर हैं। निश्चय ही, ऐसे लोगों से अपनी असहमती व्यक्त करनी है, लेकिन न तो मन में गाँठ बाँधकर बैठ जाना है और न ही अन्तिम निर्णय तक पहुँचने की दृष्टि से लड़ मरने की नौबत ले आने की ज़रूरत है।

एक परिवार की पंथनिरपेक्षता नए सदस्यों का स्नेहालिंगन करने में निहित हो सकती है, चाहे वे नव–जन्में हों या नवविवाहित, और चाय की चुस्कियों के बीच बैठकों में मत–भिन्नताएँ अभिव्यक्त होती रह सकती हैं। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि परिवार, जहाँ एक ओर अपने सदस्यों से पारिवारिक प्रथाओं एवं परम्पराओं को निभाने के लिए कहता है, तो वहीं दूसरी ओर उन्हें यह निर्णय करने की वैयक्तिक स्वतन्त्रता और आज़ादी भी देता है कि क्या वे ऐसा करना चाहते हैं, या किस हद तक और किस प्रकार से करना चाहते हैं। सुझाव और निर्णय की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें इस बारे में आश्वस्त किया जाता है कि पूरा परिवार उनकी पसन्द का सम्मान करता है और उनके साथ खड़ा है।

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एक सहपाठी, सहकर्मी और दोस्त की पंथनिरपेक्षता अपने साथी के विचारों और व्यवहारों को समझने में निहित हो सकती है। अपने साथी के समक्ष कोई भी पेशकश उनका ध्यान रखते हुए इस तरह से की जा सकती है कि जिससे साथी द्वारा उस पेशकश को अस्वीकार करने के लिए सम्मानजनक व सुविधाजनक पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो, फिर चाहे वह किसी सामाजिक–सांस्कृतिक–धार्मिक आयोजन का आमन्त्रण हो, कोई विशिष्ट भोजन हो, कोई बधाई सन्देश या फ़्रैण्डशिप बैण्ड ही क्यों न हो। बेशक असहमतियों पर सभ्य रूप में और तथ्यों एवं आँकड़ों के साथ चर्चा होनी चाहिए, पर आवेश से भरा माहौल बनाने से बचा जा सकता है विशेषकर तब जबकि साथी अल्पमत में हो। इस हेतु ऐसी धारणाओं को छोड़ने के सचेत प्रयास भी ज़रूरी होते हैं जिनके कारण जाति, धर्म, क्षेत्र, रंग, यौन, शारीरिक बनावट या कोई विशिष्ट शारीरिक अवस्था, अपंगता, उच्चारण, आर्थिक हालात व वित्तीय स्थिति, मिल्कियत, पहनावा, खान–पान, आवागमन के साधनों के प्रकार, अभिरुचियाँ और आमतौर पर जीवनशैली इत्यादि के आधार पर कुछ विशिष्ट शब्दों व कहावतों का इस्तेमाल किया जाता है। हँसी–मज़ाक में ऐसी बात कहकर यह सोचा जा सकता है कि जिसे इंगित करके कहा गया है वह भी इस बात को हँसी–मज़ाक में लेगा, लेकिन ऐसा कम ही होता है। लक्षित व्यक्ति भी अकसर ऐसा दिखावा कर सकता है मानो ऐसी टिप्पणियों से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा हो (ख़ास तौर पर तब, जबकि वह अल्पसंख्या में हो), परन्तु क्या वास्तव में वह ऐसा ही मानता है?

एक देश की पंथनिरपेक्षता अपने प्रत्येक समुदाय एवं उप–समूहों को दृढ़ विश्वास, और समय, और स्थान प्रदान करने में निहित हो सकती है ताकि उन्हें यह आश्वस्ति हो कि वे देश के बराबरी के सदस्य हैं। नई पीढ़ियों में समता और साथ होने की भावना इस तरह से लगातार बढ़ायी जा सकती है कि वे अपने देश (और देश के भीतर देशों) की एक लचीली एवं सर्वसमावेशी संस्कृति का उद्विकास कर सकें, और इस दौरान सदैव नए विचारों और नए लोगों के लिए मन खुला रखें।

एक राज्य या राष्ट्र की पंथनिरपेक्षता अपने प्रत्येक नागरिक को, व्यक्तिशः भी और सामूहिक तौर पर भी, केवल एक इन्सान के रूप में देखने में, और उसके प्रति जाति, धर्म, क्षेत्र, यौन,और पद या आर्थिक दर्जे से रहित दृष्टिकोण रखने में निहित हो सकती है। राज्य, सम्भवतः मानव–निर्मित सबसे शक्तिशाली ढाँचा है (यहाँ उल्लेखनीय है कि संसार भर में, और इतिहास के विस्तृत पटल पर, ‘राज्य’ की सोच में महिलाओं के विचारों को न तो आमन्त्रित किया गया, न लिया गया और न ही स्वीकारा गया)। राज्य निर्धारित कर सकता है कि क्या क़ानून सम्मत है और क्या नहीं, और यदि वह चाहे तो अपने उस विचार से पूरी तरह पलट भी सकता है। उसकी प्रबल संगठित शक्ति का उसके अपने अधिकार–क्षेत्र में मुक़ाबला कम ही किया जा सकता है, और वह अपनी विचारधारा या सनक के अनुसार अपनी सैन्य एवं आर्थिक ताक़त से अपने इस अधिकार–क्षेत्र को नई तरह से परिभाषित व निरूपित कर सकता है। अतः, ‘राष्ट्र राज्यों’ के इस युग में, राज्य के आश्वासन जो कि उसके कार्यों के माध्यम से जनता को अपने सामने होते दिखाई देते हैं, उसके द्वारा हरेक के प्रति वैसी ही गर्मजोशी दिखाकर व अवसरों की समानता उपलब्ध कराकर प्रत्येक नागरिक की स्वीकार्यता में प्रकट होते हैं, और वंचितों व अल्पमत रखने वालों के साथ उसके खड़े होने और उन्हें ज़रूरी सम्बल प्रदान कर आगे बढ़ाने में परिलक्षित होते हैं —उसके निवासियों के लिए किसी भी अन्य बात से ज़्यादा महत्त्व रखते हैं। इसके विपरीत, वही राज्य जब किसी विभाजनकारी और छल से भरी छवियाँ पेश करने वाली विचारधारा या सनक के आधार पर अपने नागरिकों में फ़र्क़ करना और कुछ की ही तरफ़दारी करना शुरू कर देता है तो वह क़हर बरपाने लगता है।

राज्य का तन्त्र और कट्टरपंथी गिरोह विनाश लेकर आते हैं, अल्पमत वालों को एक कोने में धकेलते हैं (तब भी जबकि अल्पमत वाले लोग बाक़ी हर लिहाज़ से एक सह–नागरिक की उनकी परिभाषा में ठीक बैठते हों), तथा राष्ट्र को अविश्वास, छिन्न भिन्न सामाजिक तानेबाने, और मनोवैज्ञानिक एवं भौतिक हिंसा के एक ऐसे पथ पर डाल देते हैं जिसके दुष्प्रभावों के दंश दशकों तक भोगने पड़ते हैं। एक दफ़े ऐसे हालात बन जाते हैं तो फिर वे आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष में हम यह पाते हैं कि प्यार, साथ और दूसरों के स्वीकार्य के तक़रीबन वही विचार हैं जो हमें अपने छोटे–से जीवनकाल में समावेशी और, अकसर से पेशतर, अधिक प्रसन्नचित्त बनाते हैं, एक व्यक्ति के रूप में भी, एक परिवार के तौर पर भी, एक साथी की भाँति भी, एक देश के जैसे भी, और एक राज्य व राष्ट्र की तरह भी। हालाँकि, ऐसी चाहना रखने और उस पर क़ायम रहने के लिहाज़ से यह बहुत उच्च आदर्श हैं, जो सतत् आत्म–निरीक्षण की और उसके अनुसार सुधार, पुनः संयोजन व व्यवहार की माँग करते हैं। यह ऐसे आदर्श हैं कि कभी इनकी ख़ातिर जीवन अर्पित करना भी पड़ सकता हो, लेकिन ज़्यादातर तो यह ज़िन्दगी को जीने के लिए लाज़िम हैं।

Views in the article are solely of the author Mr. Himalay Tehsin is a freelance translator and copyeditor.

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