गुजरात में पलायन की त्रासद घटनाएं क्यों?

हम कैसा समाज बना रहे हैं? जहां पहले हिन्दू और मुसलमान के बीच भेदरेखा खींची गई फिर सवर्ण और हरिजन के बीच, फिर अमीर और गरीब के बीच और ग्रामीण और शहरी के बीच। अब एक प्रांत और दूसरे प्रांत के बीच खींचने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब करके कौन क्या खोजना चाहता है- मालूम नहीं? पर यह निश्चित एवं दुखद है कि राष्ट्रीयता को नहीं खोजा जा रहा है, राष्ट्रीयता को बांटने की कोशिश की जा रही है। इनदिनों गुजरात में ऐसा ही कुछ हो रहा है, जहां रहने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को धमकी देकर भगाए जाने की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं घटी है और इन मामलों पर सियासत तेज हो रही है।

 

गुजरात में पलायन की त्रासद घटनाएं क्यों?

हम कैसा समाज बना रहे हैं? जहां पहले हिन्दू और मुसलमान के बीच भेदरेखा खींची गई फिर सवर्ण और हरिजन के बीच, फिर अमीर और गरीब के बीच और ग्रामीण और शहरी के बीच। अब एक प्रांत और दूसरे प्रांत के बीच खींचने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब करके कौन क्या खोजना चाहता है- मालूम नहीं? पर यह निश्चित एवं दुखद है कि राष्ट्रीयता को नहीं खोजा जा रहा है, राष्ट्रीयता को बांटने की कोशिश की जा रही है। इनदिनों गुजरात में ऐसा ही कुछ हो रहा है, जहां रहने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को धमकी देकर भगाए जाने की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं घटी है और इन मामलों पर सियासत तेज हो रही है।

गुजरात में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के प्रति जैसी भावनाएं दिख रही हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है और राष्ट्रीयता को आहत करने वाला है। अब शायद उसका असर दूसरे व्यवहारों पर भी पड़ने लगा है। वडोदरा में गत सोमवार की रात बिहार के सात लोगों पर कुछ स्थानीय लोगों ने सिर्फ इसलिए हमला कर दिया कि उन्होंने लुंगी पहन रखी थी। हमले के पीछे दलील दी जा रही है कि लुंगी पहनने वाले लोग कथित रूप से अश्लील तरीके से बैठे हुए थे। मगर यह समझना मुश्किल है कि एक साथ इतने लोग जानबूझ कर लुंगी पहन कर अश्लील तरीके से क्यों बैठेंगे भला? सवाल यह भी है कि स्थानीय लोगो की शिकायत को सही भी मान लिया जाए कि लुंगी पहनकर वहां अश्लील तरीके से न बैठने के लिए लगातार कहे जाने के बावजूद वे लोग नहीं मान रहे थे, तो उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की गई?

प्रश्न है कि गुजरात में ऐसा क्या हुआ कि एकाएक प्रवासियों को अपनी रोजी-रोटी छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है। मुख्य वजह भले ही हाल में बलात्कार की एक घटना के बाद मूल रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोगों पर हमले से पैदा हुई हवा बनी है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष राजनीति स्वार्थों की ओर भी इशारा कर रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ समय से बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है। इसकी वजह से बहुत सारे प्रवासियों ने या तो गुजरात छोड़ दिया है या फिर वहां बचे हुए लोग एक खास तरह के डर के बीच रह रहे हैं। अपनी ओर से उकसावे की कोई छोटी घटना भी इन लोगों पर स्थानीय निवासियों के हमले की थम रही आग को फिर से हवा दे सकती है और दे रही है। लुंगी पहनकर अश्लीलता फैलाना एक बहाने के तौर पर ऐसी ही हवा का काम कर गयी है। जहां तक लुंगी पहनने से शिकायत का सवाल है, तो क्या होगा वहां इस पहनावे में रहने वाले लोग केवल बिहार या उत्तर प्रदेश के होंगे? तमिलनाडु और केरल के लोगों सहित देश भर में एक बड़ी आबादी ऐसी है, जो या तो क्षेत्रीय पहनावे के तौर पर या फिर घरों में रोजमर्रा के एक सुविधा जनक वस्त्र के रूप में लुंगी का इस्तेमाल करती है।

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गुजरात में प्रवासियों पर हो रही हिंसा एवं उन्हें पलायन के लिये विवश करने की घटनाओं को लेकर राजनीति खूब हो रही है। आज गुजरात में जो विकास दिख रहा है, वह बिहारी ही नहीं पूरे देश के लोगों के खून-पसीने का नतीजा है। गुजरात ही क्यों देश का हर क्षेत्र एक-दूसरे पर आश्रित है, सब आपस में मिलकर ही राष्ट्रीयता को मजबूती देते हैं। फिर यह प्रांतीयता की भावना क्यों उकसायी जा रही है, क्यों एक ही देश के नागरिकों को आपस में लड़ाया जा रहा है, भड़काया जा रहा है? यदि समाज पूरी तरह जड़ नहीं हो गया है तो उसमें सुधार की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। यह सामाजिक जीवन की प्राण वायु है। यही इसका सबसे हठीला और उत्कृष्ट दौर है। क्योंकि राष्ट्रवादी की लड़ाई सदैव अवसरवादी से है, तो फिर वहीं पर समझौता क्यों? वहीं पर घुटना टेक क्यों? अवसरवाद कहीं इतना ताकतवर नहीं बन जाए कि राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाए। राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी की मुखरता प्रभावशाली बनी रहे। सुधार में सदैव हम अपेक्षाकृत बेहतर मुकाम पर होना चाहते हैं, न कि पानी में गिर पड़ने पर हम नहाने का अभिनय करने लगें। वह तो फिर अवसरवादी राजनीति ही होगी।

कुछ प्रवासी लोगों का कहना है कि उनके मकान मालिकों ने उनसे घर छोड़ने को कहा। जबकि पुलिस ने भी कहा कि प्रवासियों को लक्षित करने के लिए गांधीनगर, अहमदाबाद, साबरकांठा, पाटन और मेहसाणा जिलों में कम से कम 180 लोगों को गिरफ्तार किया गया। कानून-व्यवस्था को ताक पर रखकर क्षेत्र या समुदाय आधारित किसी खास पहचान वाले लोगों पर हमले की प्रवृत्ति सख्ती से रोकी नहीं गई, तो इसके नतीजे जटिल हालात पैदा कर सकते हैं। किसी भी बहाने से अगर एक खास समुदाय या क्षेत्र के लोगों के खिलाफ हमले शुरू होते हैं या उन्हें निशाना बनाया जाने लगता है तो उसमें इसके लिए सिर्फ पहचान चाहे वह लूंगी ही क्यों न हो, को आधार बना लिया जाता है। फिर हमला करने वाले लोग एक भीड़ में तब्दील हो जाते हैं, जिनके लिए तर्क या संवेदना कोई महत्व नहीं होता। ऐसे लोग जीवन के हर मोड़ पर मिलेंगे बस सिर्फ चेहरे बदलते रहते हैं। ऐसे लोगों के पास खोने को कुछ नहीं होता। इसलिए नुकसान में सदैव वे होते हैं, जिनके पास खोने को बहुत कुछ होता है।

वक्त इतना तेजी से बदल जाएगा, यह उन्होंने भी नहीं सोचा था जो वक्त बदलने चले थे। धूप को भला कभी कोई मुट्ठी में बन्द रख पाया है? जो सीढ़ी व्यक्ति को ऊपर चढ़ाती है, वह ही नीचे उतार देती है। सीढ़ी के ऊपर वाले पायदान पर सदैव कोई खड़ा नहीं रह सकता। जीर्ण वस्त्रों पर से विजय के सुनहरी तगमे उतार लिए जाते हैं, एक दिन सबको पराजय का साक्षात्कार करना पड़ता है। इतिहास में सब कुछ सुन्दर और श्रेष्ठ नहीं होता। उसमें बहुत कुछ असुन्दर और हेय भी होता है। सभी जातियों और वर्गों एवं पार्टियों के इतिहास में भी सुन्दर और असुन्दर, महान् और हेय, गर्व करने योग्य और लज्जा करने योग्य भी होता है। अतीत को राग-द्वेष की भावना से मुक्त करने के लिए समय की एक सीमा रेखा खींचना जरूरी होता है। क्योंकि इतिहास को अन्ततः मोह, राजनीतिक स्वार्थ, वैर से परे का विषय बनाना चाहिए। उदार समाज इतिहास की इस अनासक्ति को जल्दी प्राप्त करता है और पूर्वाग्रहित, धर्मान्ध समाज देरी से। लेकिन इस अनासक्ति को प्राप्त किये बगैर कोई समाज, कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता।

सोच के कितने ही हाशिये छोड़ने होंगे। कितनी लक्ष्मण रेखाएं बनानी होंगी। सुधार एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। कानून सुधार की चार दीवारी बनाता है, धरातल नहीं। मन परिवर्तन ही इसकी शुद्ध प्रक्रिया है। अगर समाज की गलती के लिए कोई अभियुक्त है तो समकालीन सभी नेता और कार्यकर्ता सह अभियुक्त हैं। जैसे शांति, प्रेम, राष्ट्रीयता की भावना खुद नहीं चलते, चलाना पड़ता है, ठीक उसी तरह राजनीतिक स्वार्थ एवं वोट की राजनीति के लिये समुदाय, क्षेत्रवाद एवं प्रान्तवाद की संकीर्णताएं दूसरों के पैरों से चलती है। जिस दिन उनसे पैर ले लिये जायेंगे, वे पंगु हो जायेंगे।

महान् अतीत महान् भविष्य की गारण्टी नहीं होता। राजनीतिक बयानों और भाषणों में सुधार की आशा करना गर्म तवे पर हाथ फेरकर ठण्डा करने का बचकाना प्रयास होगा। मनुष्य के सुधार के प्रति संकल्प को सामूहिक तड़प बनाना होगा। मनुष्य के चरित्र पर उसकी सौगन्धों से ज्यादा विश्वास करना होगा। कुछ विषय अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों एवं पंचों की तरफ से परस्पर संवादों के लिए प्रसारित किये जाते हैं। उनमें से एक है कि ”राजनीतिक दलों और सरकारों को बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए।“ इस विषय के कई प्रबल पक्षधर हैं तो कई “न्याय हो” का नारा देकर बदले की भावना को साफ नीयत का जामा पहना रहे हैं।

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