यूआईटी ने भराव क्षेत्र बताकर खारिज किए आवेदन, हकीकत में खेतीहर जमीन

47 साल से मास्टर प्लान में भू उपयोग आवासीय, सवीना में 36 लोगों को आज तक नहीं मिले पट्टे

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uit udaipur

47 साल पहले वर्ष 1976 में सवीना खेड़ा की जिस जमीन के उपयोग को मास्टर प्लान में आवासीय बताया गया था। उस जमीन के हकदार लोगों को यूआईटी ने आज दिन तक मकानों के पट्टे नहीं दिए। करीब 36 लोग पट्टों के लिए सालों से लड़ाई को लड़ रहे हैं। इस बीच इनकी फाइल करीब 8 बार आगे भी खिसकी।

प्रशासन शहरों के संग अभियान के साथ मामला सरकार और अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी तक भी पहुंचा, लेकिन इन लोगों की पीड़ा आज भी जस की तस है। इस बार भी प्रशासन शहरों के संग अभियान के तहत इन लोगों को पट्टा नही दिया जाएगा यूआईटी का कहना है कि ये जमीन राजस्व रिकॉर्ड में कृषि भूमि है और भराव क्षेत्र में आ रही है। जबकि पीड़ितों का कहना है की वर्ष 2006 में केवल एक बार यहाँ बने मकानों में पानी भरा था । उसके पहले और बाद में यहाँ पानी ठहरने जेसी घटना नही हुई। 

दरअसल, सवीना खेड़ा के पुराने आराजी संख्या 40 रकबा 4 बीघा 6 बिस्वा जमीन को 36 लोगों ने आवासीय प्रयोजन से वर्ष 1981 में ख़रीदा था। नियमानुसार ये ज़मीन खातेदारों के नाम पर चढ़ भी गई। इसके बाद कृषि भूमि को आवासीय में कन्वर्ट करने के लिए फाइल आगे चली। तब तत्कालीन उपखंड अधिकारी भूमि रूपांतरण (द्वितीय) ने इस फाइल को रद्द कर दिया। तब लोगों ने यूआईटी की समपर्ण योजना में भूमि निशुल्क समर्पित कर आरक्षित दर पर भूखंड आवंटन के लिए प्रार्थना-पत्र लगाए।

समीप में आवासीय आराजी नंबर 37, 38, 39 की तर्ज पर आरजी 40 का आवश्यक संशोधन के साथ ले-आउट प्लान बनाया। वर्ष 1991 में समर्पण पत्र, आपसी बंटवारे के साथ ले-आउट प्लान भी सौंपा। इस बीच वर्ष 1999 में प्रदेश सरकार ने कृषि भूमि नियमन के नए नियम जारी किए। इसमें स्वविवेक से नियमन शुल्क जमा करने का प्रावधान जारी हुआ। हितधारकों ने जनवरी 2000 में आवेदन कर 2001 में यूआईटी में चालान भी जमा करा दिया. ये भी बताया की पुराना आरजी संख्या 40 (वर्तमान आराजी नंबर 525 से 529) कभी भी जल भराव भूमि था ही नही।

नाला बना, 100 फीट प्रस्तावित सड़क के बाद प्लान में फिर किया संशोधन 

वर्ष 2006 में अतिवृष्टि के दौरान यहां पानी भरा। तब पानी निकासी के लिए एडीपी योजना में 75 लाख की लागत से नाले का निर्माण हुआ। तभी एनएच-8 के गोवर्धन विलास और उदयपुर सलूंबर रोड 100 फीट चौड़ी सड़क के प्रस्ताव बने। नाले की भूमि को भूखंडों में समायोजित करने के बाद 2004 में फिर से नया ले-आउट प्लान पेश किया। इससे पहले वर्ष 1986 में यूआईटी अध्यक्ष पीके देव ने समझौते के माध्यम से सरकार को इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए पत्र लिखा था। 1988 में तत्कालीन कलेक्टर पीसी जैन ने न्यास की समान्य बैठक में इस इलाके को आवासीय बनाने के लिए एजेंडा पेश किया था।

वर्ष 1976 में पहले ड्राफ्ट मास्टर प्लान, इसके बाद 2000 और 2003 के मास्टर प्लान में जमीन को आवासीय ही रखा गया। लोगों का आरोप है कि हिरण मगरी सेक्टर-13 योजना का कुछ हिस्सा इसी ज़मीन से सटा है। बावजूद इसके लोगों को यहाँ आवासीय निर्माण के लिए पट्टा नही दिया जा रहा है।

फूटा तालाब का हिस्सा,पट्टे नही जारी होंगे: यूआईटी

यूआईटी के सेक्रेटरी सावन कुमार चायल का कहना है की 36 भूखंड पट्टों के लिए जो आवेदन अभियान में मिले है। हकीकत में वह मीन फूटा तालाब का हिस्सा है। इस कारण यहाँ पर आवासीय पट्टे नियमानुसार जारी नही किए जा सकते है।

पीड़ित बोले- 41 सालों से लड़ाई जारी, कई साथी तो लड़ते-लड़ते दुनिया से विदा हो गए

प्रशासन शहरों के संग अभियान में पट्टा नहीं मिलने से पीड़ित रमेशचंद्र शर्मा का कहना है कि करीब 41 सालों से भूखंडो के मालिकों की लड़ाई जारी है। इस बीच बहुत से साथी तो खुद के मकान का सपना मन में लिए हुए दुनिया से विदा हो गए। मौके पर पानी भरने जैसे हालात बिल्कुल भी नहीं है। यूआईटी हठधर्मिता पर उतरी हुई है।

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