अब कहाँ हैं चंदा मामा दूर के.......

अब कहाँ हैं चंदा मामा दूर के.......

चंद्रयान 3 का चँद्रमा पर उतरना किसी स्वप्न से कम नहीं

 
chandrayan 3
Blog by Atul Malikram

बचपन में दादी-नानी से यह कविता सुनकर ही हम सब बड़े हुए हैं 'चंदा मामा दूर के, पूए पकाए बूर के' लेकिन अब चंदा मामा दूर के कहाँ रहे हैं? अब तो उनके घर हमारा आना-जाना शुरू हो गया है। एक सबसे बड़ा सवाल महिलाओं के बीच जो हाल ही में उठकर आया है, वह यह है कि चाँद पर जाने के बाद हम करवा चौथ कैसे मनाएँगे? फिर सोशल मीडिया पर एक और जोक देख रहा हूँ कि दुनिया की किसी भी महिला का चेहरा चाँद से नहीं मिलता..

खैर, यह तो हुई हँसी-गुदगुदी की बात, लेकिन सच तो यह है कि सदियों से बेतहाशा तकती चकोर की नज़रों को अब जाकर राहत मिली है। उसका चाँद तो धरती पर नहीं आया, लेकिन हम चाँद पर पहुँच गए..

जैसा कि महान कवि हरिवंशराय बच्चन जी ने अपनी कविता के माध्यम से कहा:

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..

आज ये पंक्तियाँ देश की असीम विजय का शंखनाद करने का जरिया बन चुकी हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि वर्ष 2019 में चंद्रयान 2 मिशन के दौरान हमारे हाथ निराशा लगी थी और चाँद से महज़ दो किलोमीटर की दूरी पर विक्रम से हमारा संपर्क टूट गया था। उस समय भारत के हर एक वैज्ञानिक और जनता का मन चीख-चीख कर एक ही बात कह रहा था कि 'सिर्फ संपर्क टूटा है, देश के सपने नही..'

चंद्रयान 3 का चँद्रमा पर उतरना किसी स्वप्न से कम नहीं। जब विक्रम साराभाई ने इसरो की नींव रखी थी, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत भी विकसित देशों की कतार में खड़ा होकर चाँद से दूरी ही कम कर लेगा। आज आलम यह है कि पूरी दुनिया में भारत की इस अभूतपूर्व उपलब्धि का जयघोष हो रहा है। होना स्वाभाविक भी है, भारत चाँद के दक्षिण ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश है। आप अखबार उठा लीजिए, न सिर्फ भारत, बल्कि अन्य तमाम देशों के न्यूज़ चैनल्स देख लीजिए, या फिर ऑनलाइन पोर्टल्स और सोशल मीडिया छान लीजिए, हर एक जगह चंद्रयान 3 की सफलता का बोलबाला है।

इस सफलता के पीछे आँसू छिपे हैं उस शख्स के, जो विक्रम से संपर्क टूटने के दुःख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लिपट कर रोया था। आज पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आज़ाद का सपना भी पूरा हुआ है। चंद्रयान मिशन की राह हमें मिसाइल मैन कहलाने वाले साइंटिस्ट एपीजे अब्दुल कलाम ने ही दिखाई थी। आज सपना पूरा हुआ है भारत के भिलाई स्थित चरौदा के बेटे के. भरत कुमार और उनके माता-पिता का। गरीबी और अभाव में पले-बढ़े भरत के पिता
गार्ड और माँ इडली बेचती हैं। फीस भरने में अक्षम और पढ़ाई में होशियार होने पर महानुभावों का साथ मिला और आज चंद्रयान 3 में इनका बहुत बड़ा योगदान है।

यूँ तो कई नए और पुराने वीडियोज़ और फोटोज़ डिजिटल दुनिया में वायरल हो रहे हैं, लेकिन एक शख्स की सिसकियों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसरो के अध्यक्ष कैलासादिवु सिवन विक्रम से संपर्क टूटने पर जैसे खुद भी टूट गए थे। आज उनके आँसुओं का भी मोल चुकता हो गया है। शायद उन्हें इस सफलता पर सबसे ज्यादा खुशी हो रही होगी, उनकी यह मुस्कान भी तो एक सफलता ही है।

आज़ादी से लेकर अब तक भारत ने अंतरिक्ष की यात्रा बड़े ही शानदार तरीके से तय की है। साइकिल से शुरू हुई हमारी अंतरिक्ष यात्रा आज मंगल और चाँद तक पहुँच गई है। आज भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष में जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी। साल 1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तब स्थिति इतनी दयनीय थी कि हमारे पास खाने के लिये पर्याप्त अनाज, तन ढकने के लिए कपड़े और रहने के लिए मकान तक न थे। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष की कल्पना करना तो बहुत दूर की बात थी। लेकिन हम भारतीयों का साहस ही है, जो हम सभी चुनौतियों को स्वीकार कर आगे बढ़ते रहे। और अंतत: महज़ 15 साल बाद ही हमने खुद को फिर से खड़ा किया और साल 1962 में वह क्षण आया जब भारत ने अंतरिक्ष की ओर कदम रखने का फैसला किया और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की। आज इसरो दुनिया की 6 सबसे बड़े अंतरिक्ष संस्थानों में से एक है।

वह नज़ारा भी देखने ही लायक था, जब दुनिया में देश की अलग छाप छोड़ने की धुन लिए इसरो ने अपना पहला रॉकेट साइकिल पर लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया था। इस वक्त स्पेसक्राफ्ट की लॉन्चिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला सामान बैलगाड़ी की मदद से भी पहुँचाया जाता था। अंतरिक्ष में उड़ान भरने की दौड़ में भारत बेशक अन्य देशों की तुलना में बहुत देर से शामिल हुआ है, लेकिन बेहद सीमित संसाधनों के साथ यह दौड़ा बहुत आगे तक है, जिसकी मिसाल आज दुनिया के सामने है। 

भारत अब अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के कई देशों की मदद कर रहा है। 15 फरवरी, 2017 को इसरो ने 104 सैटेलाइट्स एक साथ लॉन्च किए, जो आज तक विश्व रिकॉर्ड है। इनमें से ज्यादातर सैटेलाइट्स दूसरे देशों के थे। यह स्पष्ट है कि अभी तो हमने उड़ान भरी ही है। अभी हमें बहुत आगे जाना है। हम थकेंगे नहीं.. हम रुकेंगे नहीं.. यह सफलता एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह पूरी टीम के अथक प्रयासों का नतीजा है। 

यूँ ही नहीं भारत को अनेकता में एकता की शक्ति का परिचायक कहा जाता है। यह इसरो टीम ने साबित कर दिखाया। भविष्य में और भी सफल प्रोजेक्ट्स के साथ भारत को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ और इसरो को दिल की गहराइयों से सलाम..

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