MPUAT: अब जैव आधारित खेती के लिए तैयार होगा बायोस्टिमुलेंट

MPUAT: अब जैव आधारित खेती के लिए तैयार होगा बायोस्टिमुलेंट

जैव आधारित खेती के लिए देश की सबसे बड़ी संस्था इफको ने एमपीयूएटी से एमओयू किया है

 
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उदयपुर. खेती के क्षेत्र में नवाचारों के लिए पहचान बना चुके एमपीयूएटी के खाते में एक बड़ी उपलिब्ध जुड़ गई है। अब जैव आधारित खेती के लिए देश की सबसे बड़ी संस्था इफको (Indian Farmers Fertiliser Cooperative IFFCO) ने एमपीयूएटी से एमओयू किया है। जो आने वाले समय में जैव आधारित बायोस्टिमुलेंट तैयार कर गुणवत्तापूर्ण फसल व पैदावार बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। इसके लिए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को इफको की ओर से राशि भी प्रदान की गई है। पर्यावरणीय टिकाऊ कृषि प्रौद्योगिकी के लिए एमपीयूएटी और इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर को-ऑपरेटिव (इफको) ने एक शोध परियोजना शुरू की है। जिसकी लागत 1.06 करोड़ रुपए है। दोनों संस्थान बदलती जलवायु के तहत फसलों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए जैव-अपशिष्ट आधारित बायोस्टिमुलेंट विकसित करेंगे।

क्या है जैव-अपशिष्ट आधारित बायोस्टिमुलेंट

परियोजना प्रभारी एवं जैव प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद सहारण ने बताया कि जैव-अपशिष्ट आधारित बायोस्टिमुलेंट को समुद्री खाद्य उद्योग के जैव-अपशिष्ट से संसाधित किया जाता है। ये प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों से निपटने के लिए पौधे की आंतरिक प्रतिरक्षा मजबूत करता है। ये पौधे, मिट्टी के पोषक तत्वों को अवशोषित करने में भी मददगार होता है। समुद्री खाद्य (झींगा, लॉबस्टार जैसे क्रेस्टियन समूह) प्रसंस्करण से प्राप्त जैव-अपशिष्ट पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। जोकि बड़ा मुद्दा है। इस अपशिष्ट का खेती में किस तरह से उपयोग किया जाए। इस दिशा में काम किया जाएगा।

बायोस्टिमुलेंट में बदल सकते हैं जैव अपशिष्ट

गौरतलब है कि दुनिया में हर साल लगभग 104-106 मिलियन टन जैव-अपशिष्ट समुद्री-खाद्य उद्योग से प्राप्त होता है। इसमें से करीब 20-30 प्रतिशत समुद्री खाद्य जैव-अपशिष्ट जैव-इंजीनियरिंग के माध्यम से बायोस्टिमुलेंट में बदला जा सकता है। जैव-अपशिष्ट आधारित बायोस्टिमुलेंट फसल की उत्पादकता, गुणवत्ता, किसानों के लिए खेती की लागत और कीटनाशकों, कवकनाशी और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 20-30 प्रतिशत की कमी की जा सकती है।

इसलिए आया विचार

आपको बता दें कि 50 वर्षों से खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके उपयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता पर बल्कि मानव के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कृषि में रसायनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण में कार्बन और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में चुनौती बना है। इसको देखते हुए अब एमपीयूएटी व इफको मिलकर काम करेंगे।

एमपीयूएटी के कुलपति डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक का कहना है की प्रयोगशाला से किसानों के खेत तक कृषि प्रौद्योगिकी पहुंचाने के लिए एमपीयूएटी का इफको के साथ एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

एमपीयूएटी के प्रबंधन बोर्ड सदस्य, प्रो. एसआर मालू का कहना है की इस बहुउद्देश्यीय परियोजना की लागत 1.06 करोड़ रुपए है। परियोजना का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से नई पीढ़ी के बायोस्टिमुलेंट से कृषि-नवाचार करना है। ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ कृषि उत्पादन को बेहतर बनाया जा सके । इससे न केवल राज्य बल्कि देश के किसानों को भी फायदा होगा।

एमपीयूएटी के अनुसंधान निदेशक डॉ. अरविंद वर्मा बताते है की एमपीयूएटी और इफको के बीच संयुक्त अनुसंधान को लेकर करार हुआ है। इससे किसानों के लिए नवीन आर्थिक रूप से विश्वसनीय और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी विकसित करेंगे।

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