नेपाल में बुद्ध की जन्मस्थली में आबाद हो रहा है लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क


नेपाल में बुद्ध की जन्मस्थली में आबाद हो रहा है लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क

उदयपुर में प्रवासरत पक्षी वैज्ञानिक डॉ. गोपीसुंदर ने शोध के आधार पर किया खुलासा
 
नेपाल में बुद्ध की जन्मस्थली में आबाद हो रहा है लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क
मानवीय गतिविधियां खास तौर से कृषि इन पक्षियों व वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है परन्तु शोध के बाद यह पाया गया कि वन क्षेत्र के बाहर अब कृषि क्षेत्रों में भी ये पक्षी व वन्यजीव आबाद हो रहे हैं।

उदयपुर, 29 अप्रेल 2020। आमतौर पर संरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क पक्षी अब नेपाल में भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी के कृषि क्षेत्रों में भी लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क आबाद हो रहे है। इन पक्षियों पर शोध के बाद यह खुलासा उदयपुर में इन दिनों कोरोना महामारी के कारण घोषित लॉकडाउन में प्रवासरत भारत के प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. गोपी सुन्दर के दल ने किया है।

डॉ. गोपीसुंदर ने बताया कि अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार यह माना जाता था कि संरक्षित घने क्षेत्रों में हीं लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क संरक्षित रहता है और फलता-फूलता है। मानवीय गतिविधियां खास तौर से कृषि इन पक्षियों व वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है परन्तु शोध के बाद यह पाया गया कि वन क्षेत्र के बाहर अब कृषि क्षेत्रों में भी ये पक्षी व वन्यजीव आबाद हो रहे हैं।

लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क पर पहली बार हुआ स्थानीय शोध

डॉ. गोपीसुंदर ने बताया कि अब तक माना जाता था कि अतिसंकटापन लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क की आबादी घने जंगलों में ही संरक्षित हैं। पहले यह कहा जाता था कि तालाबों में खेती करने से पक्षियों का अस्तित्व खतरें में है परन्तु नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र (बुद्ध की जन्मस्थली) व कपिलवस्तु के कृषि क्षेत्रों में यह प्रजाति बहुत फल-फूल रही है।

डॉ. गोपीसुंदर के नेतृत्व में नेशनल ज्योग्राफिक की एक शोध परियोजना के तहत पक्षी विज्ञानियों के दल ने यह निरीक्षण किया कि यह स्टॉर्क बड़ी कॉलोनी नहीं बनाता है अपितु यह छोटी-छोटी 10 से 20 घोंसलों की कॉलोनियां ही बनाता है। पक्षी की जरूरत घोंसला बनाने के लिए पेड़ और चूजों के लिए भोजन की मांग स्थानीय कृषकों द्वारा संरक्षित पीपल, बरगद व सेमल के पेड़ से हो जाती है और किसानों की मिश्रित चावल व गेहूं की खेती से  भोजन हेतु मेंढ़क व घोंघे मिल जाते हैं।

इन पक्षी विज्ञानियों ने किया शोध

डॉ. गोपीसुंदर के निर्देशन में काठमाण्डू के पास खोपा कॉलेज के दो छात्र रोशिला और बिजय, कॉलेज सलाहकार कमल गोसाई, क्षेत्रीय सहयोग कैलाश जेसवाल और प्रकृति संरक्षण फाउण्डेशन के दो वैज्ञानिक स्वाति कितूर ने 101 घोसलों का 250 घंटो तक निरीक्षण किया और पाया कि उनमें 162 चूजों ने जन्म लिया जो एक सुखद आश्चर्य की बात है। इससे एक नई जानकारी प्रकाश में आई कि कृषि क्षेत्र के तालाब भी पक्षियों के आर्द्र भूमि की मांग को पूरा करते है। अतः कृषि को वन्यजीवों के अस्तित्व में खतरा न मानकर इससे इनकी आबादी में वृद्धि हुई।

शोध के नये क्षेत्र

इस शोध से ज्ञात हुआ कि नये वैज्ञानिकों के लिए शोध का क्षेत्र घने संरक्षित वन ही नहीं अपितु कृषि क्षेत्रों में भी यह शोध किया जा सकता है। शोध का विवरण अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका यूएसए द्वारा प्रकाशित वाटर बर्ड्स और ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित वाइल्ड फॉलव में प्रकाशित हुआ है।

नेपाल सरकार की सेमल प्रोत्साहन योजना

डॉ. गोपीसुंदर ने बतााय कि नेपाल सरकार इस योजना के तहत सेमल के बढ़ावे व संरक्षण के लिए कृषकों को अनुदान देती है। इससे कृषक सेमल का वृक्षारोपण करते है और इसे संरक्षित रखते हैं। इस कांटेदार रूई के पेड़ पर लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क घोंसला बनाना पसंद करते हैं।
 

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