लोक और शास्त्रीय वाद्य यंत्रों की अनुगूंज से ‘‘शिल्पग्राम उत्सव’’ का समापन

लोक और शास्त्रीय वाद्य यंत्रों की अनुगूंज से ‘‘शिल्पग्राम उत्सव’’ का समापन

शिल्पग्राम उत्सव दिन-10
 
लोक और शास्त्रीय वाद्य यंत्रों की अनुगूंज से ‘‘शिल्पग्राम उत्सव’’ का समापन
आखिरी दिन शिल्प उत्पादों की जमकर बिक्री हुई शिल्पकारों कलाकारों ने ली विदा

उदयपुर। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की ओर से आयोजित दस दिवसीय ‘‘शिल्पग्राम उत्सव-2019’’ की समापन सांझ कला रसिकों के लिये एक स्मरणीय सांझ बन सकी जब पहले लोक वाद्य यंत्रों की झंकार और बाद में शास्त्रीय वाद्यों के एन्सेम्बल ने दर्शकों को भारत की कलाओं के वैविध्य से रूबरू करवाया।

उत्सव के आखिरी दिन सामवार को कलात्मक वस्तुओं के खरीददार मेला प्रारम्भ होते ही शिल्पग्राम पहुंचना प्रारम्भ हो गये तथा दोपहर में विभिन्न शिल्पकारों की दुकानों पर खरीददारों की भीड़ रही। कोई आखिरी दिन के चलते मोल भाव करता दिखा तो कोई अपनी पसंद की वस्तु को अपने झोले, थैले में समेटता नजर आया। 

एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना से निहित इस उत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के शिल्पकार यहां आये विशेष कर भारत के उत्तर पूर्वी प्रांतों के शिल्पकार जिन्होंने पहली बार शिल्पग्राम उत्सव में हिस्सा लिया।

शाम को हाट बाजार का आलम ये था कि जहां नजर दौड़ाओं शिल्प वस्तु खरीदते लोगों का हुजूम सा नजर आया। कलात्मक पस्तुओं में पत्थर के चाय के कप, प्लेट, सर्विंग बाउल आदि, बांस व बेंत के बने फूलदान, डेकोरेटिव फर्नीचर, गर्म व ऊनी वस्त्र, ऊनी टोपियाँ, आर्टिफिशियल फ्लाॅवर्स, बुके आदि को लोगों द्वारा खूब पसंद किया गया वहीं पूर्वोत्तर के परिधान, लकड़ी के फर्नीचर, कलात्मक फोटो फ्रेम, काॅटन बेडशीट, मिट्टी के कलात्मक पाॅट्स, आर्टिफिशियल ज्वैलरी, वूलन कारपेट, बनारसी साड़ियां, विभिन्न प्रकार के परिधान, काॅटन साडियाँ, जूट के बैग्स, मोजड़ी, कोल्हापुरी चप्पल, फुलकारी काम, कच्छी शाॅल, बाड़मेरी पट्टू व जैकट्स आदि की जम कर बिक्री हुई। 

इसके अलावा लोगों ने बंजारा रंगमंच पर हिवड़ा री हूक कार्यहृम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। यहां म्यूजिक मेकर्स के कलाकारों ने लोगों की प्रस्तुति को श्रवणीय और दर्शनीय बनाया।

शाम को मुकताकाशी रंगमंच पर कार्यक्रम की शुरूआत ओडिशा के सिंगारी नृत्य से हुई। रंगमंच पर समापन सांझ में एक ओर जहां केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी तनेराज सिंह सोढ़ा द्वारा सृजित तथा लोक वाद्य यंत्रों से सजी ‘‘झंकार’’ लोगों के विशेष आकर्षण का केन्द्र रही। प्रस्तुति की दौरान दर्शक दीर्घा में मौजूद दर्शकों ने ताल वाद्यों की लयकारी पर ताल मिलाते हुए तालियां बजा कर अनूठी संगत दी।

वहीं इस मौके पर दर्शक-श्रेाताओं को शास्त्रीय संगीत से भी रूबरू करवाय गया। पुणे के चारूदत्त फड़के व उनके साथियों ने इन्स्ट्रूमेन्टल एन्सेम्बल में अपने वादन से शिल्पग्राम की वादियों में भारत के संगीत का माधुर्य घोला। राग किडवानी पर आधारित व तीन ताल में निबद्ध दो कम्पोजिशन्स में बांसुरी, तबला, सितार, पखावज आदि का सामंजस्य उत्कृष्ट बन सका। प्रस्तुति के दौरान बांसुरी सितार और जेम्बे की त्रिवेणी ने ‘‘कैमल वाॅक’’ कम्पोजिशन में राजस्थान की संस्कृति को सगीत की नजर से दर्शाने का रचनात्मक प्रयास किया जिसे दर्शकों ने चाव से सुना और करतल ध्वनि से अभिवादन किया।

समापन अवसर पर केन्द्र प्रभारी निदेशक सुधांशु सिंह ने उत्सव के सफल आयोजन में सहयोग के लिये संस्कृति मंत्रालय, जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, नगर निगम, नगर विकास प्रन्यास, अजमेर विद्युत वितरण निगम, विभिन्न बैंक्स, चिकित्सा एवं सवास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग इत्यादि के प्रति आभार व्यक्त किया। दस दिवसीय उत्सव का संयोजन हिमानी दीक्षित और मोहिता दीक्षित द्वारा किया गया।


 

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