बेहद ‘खास’ ही है बांसवाड़ा का ‘आम’


बेहद ‘खास’ ही है बांसवाड़ा का ‘आम’

आलेख प्रस्तुति - डॉ. कमलेश शर्मा
 
बेहद ‘खास’ ही है बांसवाड़ा का ‘आम’
बांसवाड़ा की 18 स्थानीय और 28 ख्यात प्रजातियों की देशभर में पहुंच

उदयपुर/बांसवाड़ा, 9 जून 2020। यों तो राजस्थान का दक्षिणाचंल बांसवाड़ा अपने बेनज़ीर शिल्प-स्थापत्य और लूठी-अनूठी परंपराओं के चिरंतन काल से जाना-पहचाना जाता है परंतु गर्मियों की ऋतु में आने वाले फलों के राजा ‘आम’ की चर्चा हो तो बात कुछ ‘खास’ ही हो जाती है। वागड़ गंगा माही से सरसब्ज बांसवाड़ा जिला फलों के उत्पादन के लिए भी सर्वथा उपयुक्त है और यहीं वजह है कि यहां पर आम की कुल 46 प्रजातियों की हरसाल बंपर पैदावार होती है और इनकी पहुंच देशभर में हैं। इन दिनों इन सभी प्रजातियों के आम बाजार में भरपूर उपलब्ध है और वागड़वासी इसके अमृतमयी रस का लुत्फ उठा रहे हेैं।

देसी रसीले आम की भी 18 प्रजातियां

देखा जाए तो बांसवाड़ा जिले में परंपरागत रूप से पैदा होने वाली देसी रसीले आम की 18 प्रजातियों के साथ देशभर में पाए जाने वाली उन्नत किस्म की 28 अन्य प्रजातियों का भी उत्पादन होता है। जिले में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा संचालित क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र एवं कृषि विज्ञान केन्द्र, बोरवट (बांसवाड़ा) पर भी बड़े क्षेत्र में मातृ वृक्ष बगीचे स्थापित हैं जिसमें देशी व उन्नत विभिन्न किस्म की कुल 46 प्रजातियों की आम किस्मों का संकलन है। यहां पर आम के ग्राफ्टेड पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध करवाये जाते हैं। इसके साथ ही उद्यान विभाग के अधीन गढ़ी कस्बे में ‘राजहंस नर्सरी’ भी स्थापित है जहां से विभिन्न उन्नत किस्मों के आम के पौधे किसानों को अनुदान पर उपलब्ध करवाये जाते हैं।

इन प्रजातियों का होता है बड़े पैमाने पर उत्पादन

जिले के विभिन्न बगीचों में आम की किशन भोग, बोम्बे ग्रीन, बोम्बई, केसर, राजस्थान केसर, फजली, मूलागो, बैगनपाली, जम्बो केसर गुजरात, स्वर्ण रेखा, बंगलौरा, नीलम, चौसा, दशहरी, मनकुर्द, वनराज, हिमसागर, जरदालु, अल्फांजो, बजरंग, राजभोग, मल्लिका, लंगड़ा, आम्रपाली, फेरनाड़ी, तोतापूरी, रामकेला आदि 28 प्रजातियों का तो उत्पादन होता ही है, साथ ही  देसी रसीले आम की 18 प्रजातियों यथा टीमुरवा, आँगनवाला, देवरी के पास वाला, कसलवाला, कुआवाला, आमड़ी, काकरवाला, लाडुआ, हाडली, अनूप, कनेरिया, पीपलवाला, धोलिया, बारामासी, बनेसरा, सागवा, कालिया, मकास आदि प्रजातियों का भी उत्पादन होता है। सबसे खास बात है कि आम की 18 स्थानीय प्रजातियां रेशेदार है और इनका उत्पादन सिर्फ दक्षिण राजस्थान में ही होता है।  

जिले में फलोत्पादन का 86 प्रतिशत सिर्फ आम  

विभागीय आंकड़ों को देखें तो उद्यानिकी फसलों की दृष्टि से बांसवाड़ा जिला धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। जिले में 6 हजार 316 हेक्टेयर क्षेत्र में फल एवं सब्जियों का उत्पादन होता है। जिलेभर में फलों का कुल उत्पादन 45 हजार 443 मीट्रिक टन होता है जिसमें आम, आवंला, नींबू, अमरूद, पपीता, अनार, चीकू तथा अन्य है। आम उत्पादन के क्षेत्र को देखें तो जिले के कुल फल उत्पादन क्षेत्र 3 हजार 480 हेक्टेयर में से 3 हजार 115 हेक्टेयर में आम का उत्पादन होता है जो कि कुल फलोत्पादन क्षेत्र का 90 प्रतिशत है। इसी प्रकार फलों के कुल 45 हजार 443 मीट्रिक टन उत्पादन के मुकाबले सिर्फ आम का उत्पादन 39 हजार 120 मीट्रिक टन है जो कुल फलोत्पादन का 86 प्रतिशत है। इस उत्पादन में स्थानीय स्तर पर छोटे किसानों द्वारा किया जाने वाला उत्पादन शामिल नहीं है।

पहले ‘मेंगो फेस्टिवल’ से मिली आम को पहचान

जिले में पैदा होने वाली आम की 46 से अधिक प्रजातियों की बंपर पैदावार व उपलब्धता के कारण जिला प्रशासन, कृषि अनुसंधान केन्द्र और पर्यटन उन्नयन समिति, बांसवाड़ा द्वारा पहल करते हुए गत वर्ष 7 से 9 जून, 2019 तक तीन दिवसीय ‘बांसवाड़ा मेंगो फेस्टिवल, 2019’ का आयोजन किया गया। यह मेंगो फेस्टिवल राजस्थान का पहला मेंगो फेस्टिवल था और इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य यहां पैदा होने वाले आम की स्थानीय और उन्नत किस्मों से जनसामान्य को रूबरू कराना, किसानों को आम बगीचे लगाने प्रेरित करना तथा उद्यमियों को आम प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना था।इसके साथ ही ‘मेेंगो हब’ के रूप में विकसित हो रहे बांसवाड़ा जिले का नाम राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के उद्देश्य से तत्कालीन जिला प्रशासन की पहल से यह आयोजन राज्य का पहला और सफल आयोजन साबित हुआ।    

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