लोकसंत राजऋषि योगीवीर्य महाराज चतुर सिंह जी बावजी के आत्मसाक्षात्कार का शताब्दी महोत्सव मनाया

लोकसंत राजऋषि योगीवीर्य महाराज चतुर सिंह जी बावजी के आत्मसाक्षात्कार का शताब्दी महोत्सव मनाया

वक्ताओं ने बावजी चतुर सिंह से संबोधित महत्वपूर्व प्रसंगों की चर्चा करते हुए उनके आध्यात्मिक कृतित्व को रेखांकित किया
 

विद्या प्रचारिणी सभा व भूपाल नोबल्स संस्थान के प्रताप हाॅल शोध संग्रहालय में मेवाड़ के लोकसंत बावजी चतुर सिंहजी के आत्मसाक्षात्कार के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में स्मरण गोष्ठी रखी गई। जिसमें वक्ताओं ने बावजी चतुर सिंह से संबोधित महत्वपूर्व प्रसंगों की चर्चा करते हुए उनके आध्यात्मिक कृतित्व को रेखांकित किया। 

बावजी लोकसंत थे लोक की वाणी में उन्होंने जीवन और जगत् के यथार्थ को आमजन तक पहुचाया। संस्थान के प्रबन्ध निदेशक मोहब्बत सिंह राठौड़ ने कहा कि शताब्दी वर्ष बाद भी बावजी की वाणियों की सार्थकता व प्रासंगिकता है। उनकी वाणियों को जीवन में अपनाकर जीवन को सहज और सुखमय बनाया जा सकता है। 

संस्थान के सचिव  डाॅ. महेन्द्र सिंह आगरिया ने कहा कि बावजी ने लोकवाणी मेवाड़ी में अपने अद्भुत विचारों को साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया और उनके दोहे लेखन की गूढ़ बातों को आसान शब्दों में बयां कर देते थे। सुखद संयोग ही हैं कि भूपाल नोबल्स संस्थान भी 100 वर्ष पूर्व ही शुरू हुआ था। 

संस्थान के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रदीप कुमार सिंह सिंगोली ने बावजी को गागर में सागर भरने वाले, पतंजलि व वाल्मिकी सदृश्य ऋषि बताया। इनके बाद प्रसिद्ध भजन गायक पुष्कर ‘गुप्तेश्वर’ ने अपनी सुरीली आवाज में बावजी रचित भजनो को गाया उसमे ’मायला मुरजी वे तो मान नितर ई घोड़ा चैगान’ और ‘धरम रे गेला री गमनी है’, ’उदिया अलख पिछाण’ सुनाया और सभी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। 

मुख्य वक्ता लक्ष्मणपुरी गोस्वामी ने बावजी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला और उनके जीवन से संबंधित कई उद्धरण प्रकट किये और कविताओं और दोहों के माध्यम से बावजी के शिक्षाओं को जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया। और उनके द्वारा रचित साहित्य के बारे में जानकारी दी एवं संस्थान में समय-समय पर ऐसे आध्यात्मिक समागमों की उपयोगिता पर भी हर्ष व्यक्त किया। 

इस अवसर पर डाॅ. रामसिंह लक्ष्मणपुरा ने चतुरसिंह जी के लेखन और दोहों पर प्रकाश डाला। संस्थान के संयुक्त मंत्री शक्ति सिंह कारोही ने अपने पिता डाॅ. संग्राम सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘चतुर सिंह: कृतित्व व व्यक्तित्व’’ को रेखांकित किया तथा अन्त में उन्होंने उपस्थित सभी श्रोताओं मेहमानों का आभार व्यक्त किया। 

डाॅ. कमलसिंह बेमला ने मंच का संचालन किया। इस मौके पर तथा दिलीप सिंह दुदोड़, गजेन्द्र सिंह घटियावली, राजेन्द्र सिंह पिपलान्त्री, विश्वविद्यालय की विभिन्न प्रवृत्तियों के अधिष्ठाता, अध्यापक, छात्रावासों के वार्डन, विद्यार्थी और स्टाफ व गणमान्य हितैषीजन उपस्थित थे। उन्हें मेवाड़ की संस्कृति, शौर्य, त्याग, स्वाधीनता व देशभक्ति की भावना से अवगत कराया गया। 
 

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