बाल दुष्कर्म:कैसे मिलेगा पीड़िताओं को न्याय?

बाल दुष्कर्म:कैसे मिलेगा पीड़िताओं को न्याय?

28 सितम्बर को दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपे एक लेख के अनुसार श्रीगंगानगर की एक चौदह वर्षीय किशोरी ने अपने जीजा और उसके दोस्तों पर गैंग रेप का आरोप लगाया| परिजनों को जानकारी मिली तो उन्होंने महिला पुलिस थाना में जीजा और उसके दोस्तों पर मुकदमा दर्ज किया

बाल दुष्कर्म:कैसे मिलेगा पीड़िताओं को न्याय?

28 सितम्बर को दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में छपे एक लेख के अनुसार श्रीगंगानगर की एक चौदह वर्षीय किशोरी ने अपने जीजा और उसके दोस्तों पर गैंग रेप का आरोप लगाया| परिजनों को जानकारी मिली तो उन्होंने महिला पुलिस थाना में जीजा और उसके दोस्तों पर मुकदमा दर्ज किया| गौर तलब है कि करीब तीन माह से पीड़िता घर में अकेली थी, जिससे जीजा रोजाना मौका मिलते ही उसके साथ जबरन दुष्कर्म किया करता था और जान से मारने की धमकी देता था| पीड़िता ने परिवाद में बताया की आरोपी उसके परिवार के सभी सदस्यों के साथ मारपीठ करता था और उनकी गरीबी का फायदा उठाते हुए सभी को चुप रहने पर विवश करता था|


इन परिस्थितियों के चलते आखिरकार पीड़िता ने स्कूल में अपनी सहेलियों को खुद के साथ हुई ज्यादती के बारे में बताया, जिन्होंने उसे हनुमानगढ़ से भागकर श्रीगंगानर में अपनी शिकायत दर्ज करने की सलाह दी| इतनी कम उम्र में ऐसी बुध्दि तत्परता देखना बहुत ही काबिले-तारीफ है|

अब सवाल ये उठता है की क्या हर बच्चे में ऐसी बुद्धि तत्परता और समस्या को हल करने की क्षमता है ? क्या उनमे इतना साहस है की वे खुद के साथ हो रही दरिंदगी का बयां कर सके ? अगर वे अपने परिजनों को इस बात का खुलासा करते है, तो क्या उनकी बात पर विश्वास किया जाता है और पुलिस थाने में इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है?

आइये करते है इस अंतराष्ट्रीय बालिका दिवस पर इन मुद्दों पे चर्चा|

बाल दुष्कर्म का खुलासा: बाधाएं और चुनौतियां

आम तौर पे बच्चियां दुष्कर्म के अनुभव से इतनी आघात हो जाती है की वे आगे चलकर इसका खुलासा नहीं कर पाती| बाल दुष्कर्म की घटनाएं पीड़िताओं में कई प्रकार की व्यवाहरिक और भावनात्मक समस्याएं उत्पन्न कर देती है, जिसके चलते उन्हें खुद के साथ हुये सुलूक का बयां करने में काफी मुश्किल होती है| इसके अलावा जिन मामलों में पीड़िता दुष्कर्म की एकलौती गवाह होती है, वहां घर के सदस्य उनकी बातों पे विश्वास नहीं करते और उल्टा उनके बयान पे सवाल करते है|

लेकिन जो पीड़िताएं हिम्मत करके अपनी आपबीती का खुलासा करती है, उन्हें अक्सर घर वालों से गुस्सा और अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है – जिससे वे और शर्मसार हो जाती है और अपने आप को दुष्कर्म की कसूरवार मानने लगती है | असल में दुष्कर्म पीड़िताएं बेहद डरी हुई और सुभेद्य होती है| वे अपनी कहानी एक बार में न बताके, कण और टुकड़े में बताती है, जिससे उनके विवरण में काफी बेजोड़ता हो सकती है| उल्लेखनीय है की पीड़िताएं खुद के साथ हुई ज़्यादती का खुलासा करते वक्त गलत फेहमी का शिकार भी बन जाए| और अखबार में अपनी खबर सुनकर या पढ़करअपने आप पे फिर से अत्याचार होता महसूस करे|

रिश्तेदार: रक्षक या दुष्कर्मी?

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (2007) द्वारा की गयी एक शोध के अनुसार 95 प्रतिशत मामलों में बाल योन शोषण के आरोपी घर के सदस्य या फिर कोई विश्वसनीय रिश्तेदार या पडोसी होते है| उल्लेखनीय है की अगर दुष्कर्म का कारण घर का कोई ऐसा सदस्य है जिससे बच्ची का महत्वपूर्ण रिश्ता है, तो अक्सर ऐसे मामलों में बच्ची डर, शर्म, दोष, और टकराव की वजह से अपनी पीड़ा बयान नहीं कर पाती| इसका एक मुख्य कारण ये है की पारिवारिक समीकरण में पीड़िता कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती जिससे उस (आरोपी!) सदस्य पर, जिनसे वे बहुत प्यार करती थी, किसी भी तरह की मुसीबत आये| इसे साइकोलॉजी में 'लॉयलिटी कनफ्लिक्ट' भी कहा जाता है, जिसकी वजह से पीड़िता घर की इज़्ज़त बनाये रखने के लिए खुद के साथ हुई दरिंदगी का खुलासा नहीं कर पाती|

इस कॉन्फ्लिक्ट की वजह से उन्हें ऐसा महसूस होता है की जैसे वे फस गयी हो और इस विपत्ति से बहार निकालने के लिए उन्हें कोई मदद नहीं कर सकता| ये कॉन्फ्लिक्ट घर के अन्य सदस्यों को भी महसूस होता है जिसके चलते वे आरोपी (रिश्तेदार!) को कानूनी सजा से बचाने के लिए दुष्कर्म की शिकायत पुलिस को करने की बजाये उस वारदात को घर में ही दफन कर देते है – आखिर पोक्सो एक्ट के तहत कौन अपने घर के सदस्य को मृत्यु दंड मिलते देखना पसंद करेगा| इसके अलावा बाल दुष्कर्म पीड़िताओं पे किये गए कई अध्धयनों से पता चला है की आरोपी पीड़ित को अक्सर जान से मारने की धमकी देते है और परिस्थितियों को हेर फेर करने की कोशिश करते है, ताकि वे अपनी बदसलूकी जारी रख सके और इस डर से पीड़ित अपने दर्द को गुप्त रखे|


अपने मोबाइल पर UDAIPURTIMES पढने के लिए यहाँ CLICK करें


कन्वर्शन रिपोर्टिंग में गिरावट

बाल दुष्कर्म के प्रति हमारे समाज का नजरिया और व्यवहार दोनों ही बदल रहा है| लेकिन आज भी दुष्कर्म से जुड़ा कलंक हमारी सोच और मानसिकता से पूरी तरह मिट नहीं पाया है| इस वजह से अधिकतर मामलों में घर के सदस्य बाल दुष्कर्म की शिकायत पुलिस थाने में दर्ज नहीं करवाते, और यहीं से पीड़िता के लिए न्याय के दरवाज़े बंद हो जाते है| गौरतलब है की न्याय पाने के लिए कोर्ट के दरवाजे खटखटाने से पहले, आम जन को पुलिस स्टेशन में ऍफ़.आई.आर. दर्ज करानी पढ़ती है, जिसके पश्चात् उस मामले में पुलिस द्वारा जांच पड़ताल की जाती है, और पक्का सबुत मिलने पर ही पुलिस आरोपी के विरुद्ध चार्ज शीट तैयार करती है| यानी न्याय तक पहुँचने के लिए एक पीड़ित को आपराधिक न्याय व्यवस्था के फ्रंटलाइनर्स (यानी की पुलिस) से एक्सेस मिलना आव्यशक है| इसलिए रपोर्ट करते समय किसी अधिवक्ता या फिर घर के सदस्य का बच्ची के साथ मौजूद होना महत्वपूर्ण है| ऐसा माहौल उजागर करने से पीड़िता समर्थित होने का एहसास करेगी और बिना डरे, आगे चल कर अपने संग हुई ज़्यादती की कहानी पुलिस को बता पाएगी|

हालाँकि निर्भया रेप केस के बाद कन्वर्शन रिपोर्टिंग में काफी हद तक बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अधिकाँश मामलों में देखा गया है की पीड़िताओं को दुष्कर्म का खुलासा करने में कई महीनें या फिर सालों लग जाते है, जिससे क्रुशल एविडेंस खो जाने या नष्ट हो जाने की संभावना रहती है, और ये भी मुमकिन है की दुष्कर्म के संकेत मेडिकल जांच के दौरान आसानी से पता न चल सके| इसके अलावा अक्सर देखा गया है की पुलिस अपने रिकार्ड्स में क्राइम का दर कम दिखाने के लिए दुष्कर्म के मामले दर्ज करने में हिचकिचाती है और पीड़िता से अपमानजनक व असवैंधनशील सवाल पूछा करती है, जिस वजह से अधिकतर मामलें एफआईआर में कन्वर्ट नहीं हो पाते|

न्याय प्रणाली में पीड़ित की भागेदारी

बाल दुष्कर्म की पीड़िताओं के लिए न्याय के अवसर खोलने हेतु ये दो सुझाव अपनाने होंगे|

1. दुष्कर्म का खुसाला उद्देश्यपूर्ण या फिर आकस्मिक रूप का हो सकता है| इसकी जांच बच्ची की कम्प्लेन के बाद ही जारी की जा सकती है| इसलिए केवल बच्चियों को अभद्र व्यवहार पहचानने के लिए शिक्षित करना पर्यापत नहीं होगा और ना ही ये समझाना की अगर उनके साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार हो तो तुरंत बता दे| बल्कि इस विषय में माँ-बाप और घर के अन्य सदस्यों को बहुत सक्रिय भूमिका निभानी होगी| उन्हें दुष्कर्म के संकेत पहचानने के लिए बच्ची के इमोशनल और बेहवियरल परिवर्तन के साथ-साथ उनके खुलासा करने के प्रयास को भी नोटिस करना होगा| अगर उनको बाल दुष्कर्म की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी जाए, तो उन्हें बच्ची के खुलासा करने पर कैसे रियेक्ट और रेस्पॉन्ड करना है, उसकी बखूबी समझ होगी|

2. “एक्सेस टू जस्टिस” बढ़ाने के लिए हमे स्कूल लेवल से ही बच्चों को दुष्कर्म की रिपोर्ट कराने की प्रतिक्रिया के बारे में शिक्षित करना होगा, ताकि ऐसी वारदात होने पर पीड़िताएं पुलिस के पास जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो| इस शिक्षा के अंतर्गत बच्चों को ये भी बताना जरुरी है कि: पुलिस के अलावा दुष्कर्म कि शिकायत किसको और कैसे की जा सकती है?  दुष्कर्म का मामला दर्ज करने पर पुलिस क्या करती है? पीड़िता को थानेदार द्वारा किस तरह के प्रश्न पूछे जा सकते है? और दुष्कर्म का खुलासा व रिपोर्टिंग देर से करने पर क्या हानि हो सकती है? इसके अलावा कई शोधकर्ताओं द्वारा साबित किया गया है कि स्कूलों में 'सेक्शुअल्टी एजुकेशन' देने से बच्चे: खुद को दुष्कर्म कि चपेट में आने से बचा सकते है, और खुदके साथ हो रहे बर्ताव को स्पष्ट शब्दों में बता सकते है| गौरतलब है की इस शिक्षा से उनमे बौध्दिक तत्परता कौशल बढ़ेगा, जिससे वे इन विषयो में ज़्यादा खुलकर बात कर सकेंगी|

(आर. रोचिन चंद्र, सेण्टर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड पब्लिक पॉलिसी के निर्देशक है और विनीता केवलानी, उसी संस्था में पॉलिसी रिसर्च इंटर्न है)

To join us on Facebook Click Here and Subscribe to UdaipurTimes Broadcast channels on   GoogleNews |  Telegram |  Signal