शहर में नहीं दिखा भारत बंद का असर, खुली रही मंडियां


शहर में नहीं दिखा भारत बंद का असर, खुली रही मंडियां

सब कुछ रहा सामान्य, रोजमर्रा की तरह चल रहा शहर का यातायात

 
शहर में नहीं दिखा भारत बंद का असर, खुली रही मंडियां
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किसान आंदोलन के बचाव के लिए कांग्रेस, वामदल सहित अन्य संगठनों ने किया बंद का समर्थन

देश में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर भारत बंद की अपील का उदयपुर में कोई असर नज़र नहीं आया। सुबह 9 बजे से जो लोग नियमित रुप से दफ्तर जाते थे वे आज भी निकले। बस स्टैंड, ऑटो स्टैंड पर लोगों की सामान्य दिनों की तरह भीड़ देखने को मिली। शहर में सब कुछ सामान्य गतिविधियां जारी रही।

वहीं शहर की दुकानों और फल सब्जी मंडियों में किसान आंदोलन का फिलहाल कोई खास असर देखने को नहीं मिला। सड़को पर रोजमर्रा की सामान्य हलचल रही। शहर के अधिकांश बाजार खुले। यातायात भी सामान्य रहा। साथ ही रोडवेड की बसों का संचालन भी 3 बजे बाद ही होगा। इसी दौरान शहर में जगह-जगह पुलिस कर्मी दिखाई दिए। वहीं किसान आंदोलन के बचाव के लिए कांग्रेस, वामदल बीटीपी, किसान संगठनों, श्रमिक संगठनों, सामाजिक-लोकतांत्रिक संगठनों अन्य कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया।

श्रमिक संगठनों, सामाजिक-लोकतांत्रिक संगठनों के द्वारा संयुक्त रूप से टाउन हॉल से शुरू करके बापू बाजार, धानमंडी, दिल्ली गेट होते हुए उदयपुर कलक्टर कार्यालय तक मार्च निकाला गया।  मार्च मे सैकड़ो कार्यक्रताओं ने भागीदारी की और नए कृषि विधेयकों को वापस लेने, एमएसपी पर फसलों की खरीद सुन्निचित करने, फसलों की सरकार खरीद की गारंटी, निजीकरण को बढ़ावा देने वाला बिजली बिल 2020 वापस लेने और मंडियों के निजीकरण के विरोध मे नारे लगाए। 

विरोध सभा आयोजित की गयी। 

किसान सेना के नेता रूपलाल डांगी ने कहा कि आज पूरे देश के किसान प्रधानमंत्री से पूछना चाहते है जो भलाई किसी किसान या किसान संगठन ने कभी मांगी ही नहीं वो क्यों देना चाहते है। आज जरूरत है कि सरकार तहसील और नीचे के स्तर तक मंडी व्यवस्था का विस्तार करे ताकि किसान को उसकी मेहनत का उचित दाम मिल सके ।लेकिन सरकार इसके उलट आज की मंडी व्यवस्था को भी कमजोर करने पर आमादा है।  

अखिल भारतीय किसान सभा के बाबूलाल वढ़ेरा ने कहा कि आज उदयपुर संभाग में आदिवासियों को निजि कंपनियां और सरकारी अधिकारी दोनों लूट रहे हैं।न तो वनाधिकार कानून का सही क्रियानवयन हो रहा है और न ही आदिवासियों की फसलों का सही भाव मिल रहा है,। ऐसे में अंबानी अडानी कैसे देश के किसान का भला कर देंगें?

इस मोके पर बोलते हुए भाकपा-माले की केंद्रीय कमिटी सदस्य और ऐपवा की राज्य सचिव प्रोफेसर सुधा चौधरी के कहा नवउदारवादी नीतियों को जिस तरह यह भाजपा सरकार लागू कर रही है उसका असर अर्थव्यवस्था के बहुत से सेक्टरों पर पड़ रहा है, काम-धंधे प्रभावित हो रहे है, सार्वजनिक सेक्टर तबाह हो रहा है जबकि इसका फायदा सिर्फ चुनिंदा पूंजीपति घरानों को मिल रहा है। कृषि क्षेत्र मे भी नए कृषि विधेयकों के माध्यम से इन्ही नीतियों को लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कोरोना आपदा का फायदा उठाकर केंद्र सरकार लगातार जनविरोधी फैसले लेकर आपदा का आर्थिक बोझ ग़रीबो-मजदुरो-किसानों-कर्मचारियों पर डालने पर आमादा है। 

माकपा के शहर सचिव राजेश सिंघवी ने कहा नए कृषि बिल खेती – किसानी को कॉर्पोरेट के हवाले करने के मकसद से लाये गए है । यह आवश्यक वस्तू अधिनियम मे बदलाव कर खाद्य वस्तुओं मे काला बाजारी को क़ानूनी जामा पहनाने का काम करते है।

 इंटक के प्रदेश महासचिव और कांग्रेस नेता जगदीश श्रीमाली के कहा मजदूर-किसान वो दो हाथ है जो देश की जीडीपी बनाने का काम करते है पर मोदी सरकार इन दोनों हाथों को ही काटने पर आमादा है। भाकपा के महेश व्यास ने कहा सरकार की मंशा निजी मंडियों को बढ़ावा दे कर न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को ख़त्म करने और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (contract farming) के लिए छुट का प्रावधान कर किसानो को गुलामी की तरफ धकेलने की है ।

मुस्लिम महासंघ के नेता मोहम्मद सिद्दीकी ने कहा नए कृषि विधेयको के चलते देश की खाद्य सुरक्षा  ओर खतरे मे आ जाएगी और आम जनता की थाली से सस्ता आटा-दाल गायब हो जाएगा। बीटीपी के नेता बी.एल. छानवाल ने कहा की  वन अधिकार कानून के तहत वन भूमि पर आदिवासियों को कब्जे की जमीन के बराबर के पट्टे जारी करने के नियम को लागू किया जाना चाहिए। 

श्रमिक संगठन ऐक्टू के राज्य अध्यक्ष शंकरलाल चौधरी ने कहा कि किसान आंदोलन को ट्रांसपोर्टर, कर्मचारियों, व्यापारियों, श्रमिक संगठनों, सामाजिक - लोकतांत्रिक संगठनों का व्यापक समर्थन मिल रहा है क्योकि यह सब तबके सरकार की नीतियों का हमला झेल रहे है।

एमसीपीआई की लीला देवी ने कहा  किसान संगठनों की मांगों की हाल मे लाए गए नए कृषि विधेयक वापस लिए जाए, फसलों का दाम स्वामीनाथन कमिटी रिपोर्ट के हिसाब से लागत के 1.5 गुणा पर तय हो,फसलों की सरकारी खरीद की गारंटी, कर्ज माफी आदि का हम समर्थन करते है और किसानों की मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा। प्रकृति मानव संस्थान के किरण ने भी अपने विचार रखे और कहा बिना एमएसपी की गारंटी के किसानी को नहीं बचाया जा सकता।

 सभा का संचालन सौरभ  नरुका और पवन बेनीवाल ने किया।  इस मौके पर नगर निगम पार्षद और डीवाईऍफ़आई,जिला अध्यक्ष राजेंद्र वसीठा, मानव अधिकार कार्यक्रता रिंकू परिहार, आइसा की नीतू परिहार, बहुजन क्रांति मोर्चा के बाबूलाल गवरी, डॉक्टर अंबेडकर वेलफेयर सोसाइटी के महासचिव अधिवक्ता पी.आर. सालवी, प्रोफेसर हेमेंद्र चंडालिया, प्रोफेसर लालूराम पटेल, अधिवक्ता ललित मीणा अश्विनी पालीवाल, रितेश यादव, सुरेश मीणा, गोविंद कलासुआ,गौतम मीणा, बादल आदि मौजूद थे।
 

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