दुबारा सर्जरी कर वाॅल्व रिप्लेसमेंट व रिपेयर किए


दुबारा सर्जरी कर वाॅल्व रिप्लेसमेंट व रिपेयर किए

गीतांजली मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पिटल के कार्डियो थोरेसिक एवं वेसक्यूलर सर्जन डाॅ संजय गांधी व टीम ने 55 वर्षीय रोगी की रीडू यानि दुबारा वाॅल्व रिप्लेसमेंट व वाॅल्व रिपेयर सर्जरी कर रोगी को स्वस्थ किया। लगभग 30 साल पहले वाॅल्व में सिकुड़

 
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दुबारा सर्जरी कर वाॅल्व रिप्लेसमेंट व रिपेयर किएगीतांजली मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पिटल के कार्डियो थोरेसिक एवं वेसक्यूलर सर्जन डाॅ संजय गांधी व टीम ने 55 वर्षीय रोगी की रीडू यानि दुबारा वाॅल्व रिप्लेसमेंट व वाॅल्व रिपेयर सर्जरी कर रोगी को स्वस्थ किया। लगभग 30 साल पहले वाॅल्व में सिकुड़न के कारण रोगी की वाॅल्व की ओपन हार्ट सर्जरी हुई थी। और इस बार फिर वाॅल्व के सिकुड़ जाने के कारण रीडू वाॅल्व रिप्लेसमेंट व वाॅल्व रिपेयर सर्जरी करनी पड़ी। यह सर्जरी काफी जटिल एवं जोखिमपूर्ण थी।

अपने अनुभव का पहला केस था ये….

लगभग सात आठ आॅपरेशन कर चुके डाॅ गांधी ने बताया कि उनके पिछले 15 सालों के कार्डियक सर्जरी के अनुुभव में यह उनका पहला केस था। हृदय के ऊपर टांकों की पत्थर की दीवार वाला यह प्रथम मामला है जो अत्यंत जटिल एवं दुलर्भ था। परंतु टीम में मौजूद कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डाॅ अंकुर गांधी, डाॅ कल्पेश मिस्त्री व डाॅ मनमोहन जिंदल व अन्य कार्डियक टीम के संयुक्त प्रयासों से यह आॅपरेशन सफल हो पाया।

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क्या था मामला?

डाॅ गांधी ने बताया कि 55 वर्षीय उदयपुर निवासी कमल सुहालका बैचेनी, घबराहट, सांस फूलना जैसी परेशानियों के चलते गीतांजली हाॅस्पिटल में परामर्श के लिए आए थे। जहां कार्डियोलोजिस्ट डाॅ डैनी कुमार ने ईको-कार्डियोग्राफी की जांच में पाया कि हृदय के 4 में से 2 वाॅल्व बहुत खराब हो चुके है। भर्ती करने पर और जांचों में पाया गया कि रोगी के लीवर एवं किडनी भी खराब हो चुके थे। चूंकि इस मरीज का आॅपरेशन पहले भी हो चुका था और ऐसी हालत में जहां किडनी व लीवर भी खराब थे, दुबारा आॅपरेशन करना काफी जोखिमपूर्ण एवं चुनौतीपूर्ण हो गया था। तत्पश्चात् जीएमसीएच के ही नेफ्रोलोजिस्ट डाॅ गुलशन मुखिया एवं डाॅ चेतन महाजन और गेस्ट्रोएंटरोलोजिस्ट डाॅ पंकज गुप्ता द्वारा दी गई दवाईयों से दोनों किडनी व लीवर को नियंत्रित किया गया। इसके बाद आॅपरेशन किया गया।

क्या आॅपरेशन किया गया?

वाॅल्व रिप्लेसमेंट के समय डाॅ गांधी ने पाया कि हृदय की दीवार जहां पूर्व में टांके लगे हुए थे वो पत्थर (कैलसिफाइड) की हो गई थी। जिसको कैंची से काटना और उसी को दुबारा सिलना बहुत मुश्किल हो रहा था। यदि इस दीवार को जोड़े बिना ही आॅपरेशन किया जाता तो मरीज की आॅपरेशन थियेटर में ही मृत्यु हो जाती। परंतु डाॅ गांधी द्वारा हृदय की दीवार से चिपकी हुई इस पत्थर की परत को हटाया गया और सिकुड़े हुए दोनों वाॅल्व को रिप्लेस व रिपेयर किया गया। इस सर्जरी को रीडू माइट्रल वाॅल्व रिप्लेसमेंट एवं ट्राइकस्पिड वाॅल्व रिपेयर कहते है, जो कि पत्थर की परत को हटा कर किया गया।

क्यों जटिल थी यह सर्जरी?

डाॅ संजय गांधी ने बताया कि रीडू सर्जरी काफी जटिल होती है। इसमें हृदय को दुबारा खोला जाता है और क्योंकि ओपन हार्ट सर्जरी के बाद हृदय सीने की हड्डी से चिपक जाता है जिसको खोलने पर अत्यधिक रक्तस्त्राव की संभावना होती है। इससे हृदय कभी-भी फट सकता है जिससे रोगी की मृत्यु की संभावना काफी अधिक हो जाती है। और खासकर इस मामले में रीडू सर्जरी में पहले लगाए हुए टांके पत्थर जैसे मजबूत हो गए थे जिनमें चीरा लगाना या फिर से खोलना बहुत मुश्किल था। परंतु हृदय के अंदर से पत्थर की परत को हटाने से आॅपरेशन संभव हो सका।

रोगी कमल सुहालका (उम्र 55 वर्ष) ने सन् 1987 में मुम्बई के एक निजी हाॅस्पिटल में वाॅल्व में सिकुड़न के कारण वाॅल्व सर्जरी कराई थी। पिछले एक हफ्ते से उन्हें सांस लेने में तकलीफ, बैचेनी-घबराहट होना, नींद न आना जैसी परेशानियां हो रही थी। गीतांजली हाॅस्पिटल में कार्डियोलोजिस्ट डाॅ डैनी कुमार से परामर्श के बाद उन्हें कार्डियक सर्जन डाॅ संजय गांधी के पास रेफर किया गया। रोगी अब पूर्णतः स्वस्थ है।

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