झील संवाद के तहत पिछोला झील पर श्रमदान
पहाड़ो को काटने, खुर्दबुर्द होने से नही बचाया गया तो हरियाली, पानी और नदी - झील तंत्र को सदैव के लिए अमावस्या सा अंधकार देखना पड़ेगा। यह विचार रविवार को आयोजित झील संवाद में झील संरंक्षण समिति के सहसचिव डॉ अनिल मेहता ने व्यक्त किये। मेहता ने कहा कि पहाड़ो से ही नदी नालों का उदगम होता है। पहाड़ों को पाटने से नदी - तालाबों के पेटे सूख जाएंगे। धरती का पेट सूख जाएगा और भूजल समाप्त हो जाएगा।
पहाड़ो को काटने, खुर्दबुर्द होने से नही बचाया गया तो हरियाली, पानी और नदी – झील तंत्र को सदैव के लिए अमावस्या सा अंधकार देखना पड़ेगा। यह विचार रविवार को आयोजित झील संवाद में झील संरंक्षण समिति के सहसचिव डॉ अनिल मेहता ने व्यक्त किये। मेहता ने कहा कि पहाड़ो से ही नदी नालों का उदगम होता है। पहाड़ों को पाटने से नदी – तालाबों के पेटे सूख जाएंगे। धरती का पेट सूख जाएगा और भूजल समाप्त हो जाएगा।
झील विकास प्राधिकरण के सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि पहाड़ों से ही संस्कृति व समृद्धि है। पालीवाल ने कहा कि पहाड़ी संरंक्षण की ऐसी नीति की जरूरत है जो पहाड़ों को काटने व पाटने, उसका स्वरूप बदलने को गैरकानूनी घोषित करती हो।
गांधी मानव कल्याण समिति के निदेशक नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि पेड़, पहाड़ व पानी वास्तविक व टिकाऊ विकास के आधार है। नागरिकों को इन जीवन स्त्रोतों का संरंक्षण करना ही होगा। तभी मेले, त्यौहार व खुशियां बच सकेगी।
संवाद के पश्चात पीछोला अमरकुण्ड पर श्रमदान हुआ। श्रमदान में रमेश चंद्र राजपूत, रामलाल गहलोत, मोहन सिंह चौहान, जयदीप पालीवाल, नंद किशोर शर्मा, डॉ अनिल मेहता ने भाग लिया। झील से खरपतवार, पूजन सामग्री, घरेलू कचरे, मृत मछलियों को हटाया गया।
