वाजपेयीजी को अलविदा नहीं कहा जा सकता

वाजपेयीजी को अलविदा नहीं कहा जा सकता

भारतीय राजनीति का महानायक, भारतीय जनता पार्टी के 93 वर्षीय दिग्गज नेता, प्रखर कवि, वक्ता और पत्रकार श्री अटल विहारी वाजपेयी मौत से जंग करते हुए इस संसार से विदा हो गये हैं। उनका निधन न केवल भारत की राजनीति की बल्कि राष्ट्रीयता की अपूरणीय क्षति है। पूरा राष्ट्र अपने महानायक से जुदा होकर आहत है, सन्न है। उनके निधन को एक युग की समाप्ति कहा जायेगा। इस समाप्ति को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, राजनीति की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जायेगा। उन्होंने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाई है।

 

वाजपेयीजी को अलविदा नहीं कहा जा सकता

भारतीय राजनीति का महानायक, भारतीय जनता पार्टी के 93 वर्षीय दिग्गज नेता, प्रखर कवि, वक्ता और पत्रकार श्री अटल विहारी वाजपेयी मौत से जंग करते हुए इस संसार से विदा हो गये हैं। उनका निधन न केवल भारत की राजनीति की बल्कि राष्ट्रीयता की अपूरणीय क्षति है। पूरा राष्ट्र अपने महानायक से जुदा होकर आहत है, सन्न है। उनके निधन को एक युग की समाप्ति कहा जायेगा। इस समाप्ति को राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, राजनीति की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने की समाप्ति समझा जायेगा। उन्होंने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाई है।

हो सकता है ऐसे कई व्यक्ति अभी भी विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हों। पर वे रोशनी में नहीं आ पाते। ऐसे व्यक्ति जब भी रोशनी में आते हैं तो जगजाहिर है- शोर उठता है। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से उनको अलंकृत किया, देश के सर्वोच्च सम्मान से जिसे सम्मानित किया जाये तो वह उस व्यक्ति की श्रेष्ठता का शिखर होता है। नेहरु – गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओं में शामिल है जिन्होंने सिर्फ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर न केवल सरकार बनाई बल्कि एक नयी सोच की राजनीति को पनपाया, सुदृढ़ किया। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। सन् 1980 से 1986 तक वे बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वे बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे। वर्ष 1942 में स्वाधीनता के आंदोलन के दौरान वे कुछ समय के लिए जेल में रहे। वे सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में काफी सक्रिय रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव सहित अनेक दिग्गज नेता उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

अटल विहारी वाजपेयी 1951 में भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे। अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया। 1957 में जनसंघ ने उन्हें लोकसभा से चुनाव लड़ाया, बलरामपुर से चुनाव जीतकर वे दूसरी लोकसभा में पहुंचे। अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय कैरियर की यह शुरुआत थी। 1968 से 1973 तक वे भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे। विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।

अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के आम चुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने। लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए।1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे।

इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। इस सेवा का उद्घाटन करते हुए प्रथम यात्री के रूप में उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नयी शुरुआत की। कुछ ही समय पश्चात् पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।

अटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके। भारत को लेकर उनकी स्वतंत्र सोच एवं दृष्टि रही है ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो। उनकी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उन्होंने विज्ञान की शक्ति को बढ़ावा देने के लिए लाल बहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान जय किसान’ में बदलाव किया और ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’ का नारा दिया।

एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफर जरा भी आसान न था। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई। उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरु किया। उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि वह हमेशा से एक पत्रकार बनना चाहते थे, लेकिन गलती से वह राजनीति में पहुंच गए।

इस शताब्दी के भारत के ‘महान सपूतों’ की सूची में कुछ नाम हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते है। अटल विहारी वाजपेयी का नाम प्रथम पंक्ति में होगा। वाजपेयीजी को अलविदा नहीं कहा जा सकता, उन्हें खुदा हाफिज़ भी नहीं कहा जा सकता, उन्हें श्रद्धांजलि भी नहीं दी जा सकती। ऐसे व्यक्ति मरते नहीं। वे हमे अनेक मोड़ों पर नैतिकता का संदेश देते रहेंगे कि घाल-मेल से अलग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है। निडरता से, शुद्धता से, स्वाभिमान से, साहस से, मौलिकता से।

मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे वाजपेयीजी से मिलने के अनेक अवसर मिले, रायसीना हिल पर अणुव्रत आन्दोलन एवं आचार्य तुलसी के कार्यक्रमों के सिलसिले में अनेक बार मिला। प्रधानमंत्री रहते 7 रेडक्रोस रोड पर तीन-चार मुलाकातें हुई। इस वर्ष उनके जन्म दिन पर कृृष्णा मेनन मार्ग पर भी उनके दर्शनों का दुर्लभ अवसर मिला। उनमें गजब का अल्हड़पन एवं फक्कड़पन था। वे हमेशा बेपरवाह और निश्चिन्त दिखाई पड़ते थे, प्रायः लोगों से घिरे रहते थे और हंसते-हंसाते रहते थे। उनके जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता एवं राष्ट्रीयता की गहराई ये जुड़े थे और उस पर वे अटल भी रहते थे। किन्तु किसी भी प्रकार की रूढ़ि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वे हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के थे और यह मुक्त स्वरूप भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप है।

भारतीय राजनीति की बड़ी विडम्बना रही है कि आदर्श की बात सबकी जुबान पर है, पर मन में नहीं। उड़ने के लिए आकाश दिखाते हैं पर खड़े होने के लिए जमीन नहीं। दर्पण आज भी सच बोलता है पर सबने मुखौटे लगा रखे हैं। ऐसी निराशा, गिरावट व अनिश्चितता की स्थिति में वाजपेयीजी ने राष्ट्रीय चरित्र, उन्नत जीवन शैली और स्वस्थ राजनीति प्रणाली के लिए बराबर प्रयास किया। यह व्यक्ति नहीं है, यह नेता नहीं है, यह विचार है, एक मिशन है। और 93 वर्ष के लंबे सफर का पगडंडियों, राजमार्गों, गांवों, महानगरों, झोपड़ियों और भवनों का अनुभव अपने में समेटे वह व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के बदलाव की सोचता रहा है, शाइनिंग इंडिया के सपने को आकार देता रहा। राष्ट्र को उन्नत राष्ट्र बनाने के लिए रात-दिन परिश्रम करता रहा है। उनका समूचा जीवन राष्ट्र को समर्पित एक जीवन यात्रा का नाम है,“ आशा को अर्थ देने की यात्रा, ढलान से ऊंचाई की यात्रा, गिरावट से उठने की यात्रा, मजबूरी से मनोबल की यात्रा, सीमा से असीम होने की यात्रा, जीवन के चक्रव्यूहों से बाहर निकलने की यात्रा। मन बार-बार उनकी तड़प को प्रणाम करता है। उस महापुरुष केे मनोबल को प्रणाम करता है!

Views in the article are solely of the author

To join us on Facebook Click Here and Subscribe to UdaipurTimes Broadcast channels on   GoogleNews |  Telegram |  Signal