भावना अच्छी होने पर पूण्य का बंध और दूषित होने पर स्वतः होता है पाप का संचयःडाॅ.शिवमुनि


भावना अच्छी होने पर पूण्य का बंध और दूषित होने पर स्वतः होता है पाप का संचयःडाॅ.शिवमुनि

श्रमणसंघीय आचार्य डाॅ. शिवमुनि महाराज ने कहा कि प्रार्थना और पुरूषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं उसके लिये किया जाने वाला ध्यान एकाग

 
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भावना अच्छी होने पर पूण्य का बंध और दूषित होने पर स्वतः होता है पाप का संचयःडाॅ.शिवमुनिश्रमणसंघीय आचार्य डाॅ. शिवमुनि महाराज ने कहा कि प्रार्थना और पुरूषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं उसके लिये किया जाने वाला ध्यान एकाग्रचित और सच्चे मन से करना चाहिये। जब हमारी भावना अच्छी होती है तब पूण्य का बंध होता है और यदि भावना दूषित है तब पाप का संचय अपने आप होता है। वे आज शिवाचार्य समवसरण में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए ध्यानगुरू आचार्य श्री डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने कहा कि सिद्ध परमात्मा ने आठ कर्मों के बंधन को तोड़ कर सिद्ध बुद्धि मुक्ति के प्राप्त कर लिया है। आठ कर्म है और आठ ही गुण हैं। मोहनीय कर्म का जब क्षय होता है तो कर्मो का नाश करके सिद्धी बुद्धि मुक्त हो जाते है। सिद्धत्व को प्राप्त करना बीज से वृक्ष बनने की कहानी है।

उन्होंने कहा कि जब भक्त समर्पित होकर भगवान की स्तुती गुणगान करता है तब भगवान प्रसन्न नहीं होते और कोई उन्हें भला-बुरा कहे तो परमात्मा नाराज भी नहीं होते। अरिहंत परमात्मा राग, द्वेश से रहित हो गए है उन्हें संसार के किसी अच्छे बुरे से कोई मतलब नहीं हैं। वे जन्म-मरण से मुक्त होकर सिद्ध बन गए है। उन महापुरूषों का गुणगान करने से अपना भला जरूर होता है। वीतरागी परमात्मा की भक्ति या उनको दिल से वंदन करेगें तो निश्चित आत्म शांति का अनुभव होगा।

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आचार्यश्री ने कहा कि जिनका हम स्मरण कर रहे है वह सिद्ध परमात्मा सबसे पावन पवित्र है। अरिहंत परमात्मा के स्मरण मात्रा से श्रद्धा बढ़ती है, विचार शुद्ध होने लगते है। व्यवहार भी शुद्ध बन जाते है। अरिहंतो के ज्ञान का प्रकाश इतना अलौकिक और अदभुत होता है कि तीनों लोकों में उनके ज्ञान का प्रकाश होता है। ऐसे वीतरागी परमात्मा की स्तुति और गुणगान करने का अवसर नहीं चुकना चाहिए।

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