मेवाड़ के प्राकृतिक परिदृश्यों एवं जंगलों की विविधता पर हुआ गाइड व्याख्यान


मेवाड़ के प्राकृतिक परिदृश्यों एवं जंगलों की विविधता पर हुआ गाइड व्याख्यान

वन विशेषज्ञ डॉ सतीश चंद्र शर्मा ने मेवाड़ के प्राकृतिक परिदृश्यों के साथ-साथ जंगल वनस्पति, जीव-जन्तु आदि की विविध जानकारियों से रू-ब-रू करवाया

 
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उदयपुर, 20 अप्रेल 2022 । महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन, उदयपुर की ओर से वार्षिक गाइड ओरिएंटेशन प्रोग्राम में आज वन विभाग से रिटायर्ड असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फोरेस्ट डॉ सतीश कुमार शर्मा का व्याख्यान हुआ। जिसका उद्देश्य उदयपुर में आने वाले पर्यटकों को मेवाड़ के प्राकृतिक परिदृश्यों के साथ-साथ जंगल वनस्पति, जीव-जन्तु आदि की विविध जानकारियों से रू-ब-रू करवाना रहा। जिसमें 40 से अधिक गाइड व स्टाफ ने भाग लिया।

डॉ. शर्मा ने बताया कि अरावली के जंगलों में लगभग 3500 तरह के जीव-जन्तुओं के साथ ही विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों से भरे जंगल हैं। अरावली में अफ्रिका के सहारा की ओर से आने वाली वनस्पति पाई जाती है तो पश्चिमी देशों की ओर से आने वाली वनस्पति भी पाई जाती है, इसी तरह अरावली के जंगलों में उत्तर और दक्षिणी देशों की ओर से आए हुए कई जीव भी पाए जाते है जो अपने अनुकूल वातावरण में अलग-अलग जगहों पर यहीं के होकर रह गए। 

अरावली में जहां नार्थ और साउथ दोनों तरह के जंगलों को मिलान होता है उसे ड्रूड लाइन कहा जाता है। नार्थ की ओर से आने की वजह से नदन जिसमें साल, धोक आदि वनस्पति की अधिकता तो साउथ की ओर से आने से सदन जिसमें सागवान आदि वनस्पति प्रचुरता से पाई जाती है। उन्होंने बताया कि गोगुन्दा का सागेटी नामक स्थान जहां के उत्तर व पश्चिम में सागवान बिलकुल नहीं है यानी की वहां का वातावरण सागवान के अनुकूल नहीं है। 

डॉ. शर्मा ने बताया कि भारत में पाए जाने वाले 16 तरह के जंगल है। अरावली को 5 तरह के जंगल में बांटा गया है जो ऊँचाई, तापमान और वर्षा के आधार पर पाई जाने वाली वनस्पति एवं जीवों उपलब्धता पर निर्धारित है। 

वनस्पति की विशेषता भी अरावली के जंगलों में पाई जाती है जिसमें फुलवारी की नाल में पाया जाने वाला जंगली आम वनज में लगभग 65 ग्राम तक ही होता है और कच्चा बहुत ही खट्टा होता है लेकिन पकने पर बहुत मीठा हो जाता है, यह इतना छोटा होता है कि इसे पकने पर काटा नहीं जा सकता। रीछेड़ के जुड़ की बडली का बरगद जो 1.2 हैक्टयर में फैला है जिसकी लगभग ग्यारह सौ जडे. पेड़ से लटकी हुई है। वहीं कुम्भलगढ़ में लाल और पीले फूलों वाले 2 प्रकार के पलास के पेड़ पाए जाते है जो अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलते जैसे कई भिन्न भिन्न वनस्पतियों की जानकारियां प्रदान की। 

इन वनस्पतियों के उपयोग को आज भी आदिवासी समाज के लोग अच्छी तरह से करते है और इनके महत्व व गुण को भी पहचानते हैं। आदिवासी समाज आज भी वर्षा के दौरान होने वाले मच्छर और मखियों से बचने के लिए घरों में ग्वार-पाठा (एलोविरा) को उल्टा तीन से चार जगह लटका देते है और उसे थोड़ा-थोड़ा करके दो-तीन दिन में काटते रहते ताकि एलोविरा की गंध से मच्छर-मक्खी भाग जाते है। 

इसी तरह वर्षा कब तक इनके इलाकों में होगी उसको जानने के लिए आदिवासी लोग मिर्चीयाकंद की बेल को तोड़कर कहीं भी खुंटी पर लटका देते है। बरसात से पहले का वातावरण तैयार होने पर यह बेल हवा से पानी की आद्रता से चलने लगती है, जैसे कई विविध ज्ञान पर अपने विचार प्रस्तुत किये। अंत में महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन के प्रशासनिक अधिकारी भूपेन्द्र सिंह आउवा ने डॉ. शर्मा का धन्यवाद करते हुए फाउण्डेशन की ओर से उपहार स्वरुप मेवाड़ की पुस्तकें भेंट की।
सादर प्रकाशनार्थ।

 

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