समाज विशेष के लगभग 400 बच्चो में सामने आई टाइफाइड की शिकायत

समाज विशेष के लगभग 400 बच्चो में सामने आई टाइफाइड की शिकायत 

टाइफाइड की बीमारी दूषित पानी पीने से या दूषित खाना खाने से होती है 

 
typhoid

लगभग हर साल की तरह, उदयपुर में इन दिनों बच्चो में टाइफाईड की बीमारी की शिकायत सामने आ रही है। हैरत की बात यह है की इनमे से अधिकांश (लगभग 400 के आसपास) मामले दाऊदी बोहरा समाज के बच्चो में होना सामने आया है। दूसरी हैरत की बात यह है की सभी बच्चे, साइफन, नवरत्न कॉम्प्लेक्स, फतहपुरा, पंचवटी इलाके और मोती मगरी स्कीम के रहने वाले बताए जा रहे हैं। साथ ही बीमारी से प्रभावित होने वाले की बच्चे 10 से लेकर 15-17 साल के बीच की आयु वर्ग से है। 

एक ही समुदाय से इतनी बड़ी मात्रा में बच्चो का इस बीमारी से ग्रसित होना न सिर्फ आम आदमी को बल्कि डॉक्टर्स को भी अचरज में डाल रहा है। इस सम्बन्ध में जब उदयपुर टाइम्स की टीम ने शहर के तीन बड़े चाइल्ड स्पेशलिस्ट्स (बाल रोग विशेषज्ञ) से बात की तो उन्होंने जानकारी दी कि ज़्यादातर बच्चो में डिस्परपोशनेट टाइफाइड (Disproportionate Typhoid) की बीमारी सामने आ रही है, जिसका मुख्य सम्बन्ध दूषित पानी पीने से या दूषित खाना खाने से है। 

एक ही जगह से दूषित पानी या दूषित खाना? 

चाइल्ड स्पेशलिस्ट (बाल रोग विशेषज्ञ) डॉ. संजय मांडोत ने बताया कि वैसे तो मानसून के साथ टाइफाइड के मामले आने लगते हैं, लेकिन इस बार एक ही समाज के बच्चो में यह बीमारी होने की बात लगातर सामने आ रही है और हॉस्पिटल में बीमार बच्चों का आना लगातार जारी है। डॉक्टर मांडोत ने कहा कि टाइफाइड एक वाटर बाउंड और इन्फेक्टेड फ़ूड के सेवन से होने वाली बीमारी है। ऐसे में हो सकता है कि इन बच्चो ने किसी ऐसी जगह पर एक साथ दूषित पानी या दूषित पानी से बनी खाद्य सामग्री का सेवन किया जिससे बड़ी मात्रा में यह बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ गए। 

चिंता का विषय, अभिभावक सावधान रहें 

इसी प्रकार, शहर के श्री कृष्णा हॉस्पिटल के चाइल्ड स्पेशलिस्ट्स डॉ अनूप पालीवाल ने बताया कि इस पूरे महीने में बड़ी मात्रा में बच्चे तेज़ बुखार होने की शिकायत के साथ हॉस्पिटल में आए थे और अब तक भी आ रहे हैं। उन्होंने बताया की एक ही समाज के बच्चो को एक ही प्रकार की समस्या से ग्रसित होने की वजह से यह चिंता का विषय है। समाज और बच्चो के अभिभावकों को एहतियात बरतने की ज़रूरत है। अभिभावकों को यह ध्यान रखना होगा कि जैसे ही उनके बच्चो को इस समस्या (बुखार) की शिकायत हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर्स से सम्पर्क करें। समय पर इलाज मिलने से बच्चे जल्दी ठीक हो पाएंगे और उन्हें भर्ती करवाने की जरूरत नहीं पडेगी। 

डॉ अनूप ने कहा कि वैसे तो यह बीमारी मानसून में आती है लेकिन एक ही समाज के बच्चो में सामने आना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं कोई गलती हुई है, जिसकी वजह से यह फैला है। 

उन्होंने बताया कि यह एक बैक्टीरियल फीवर है और वाटर बाउंड डिसीज़ है, जो की दूषित पानी और खाने के सेवन से फैलता है। दूसरी तरफ यह भी होता है कि जो व्यक्ति पहले से ही टाइफाइड से ग्रसित है उसके सम्पर्क में आने से यह फैलता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमे व्यक्ति कॅरियर स्टेट (Carrier State) में भी रहता है एवं उसके द्वारा अगर किसी का हाथ लगा खाना या पानी सर्व किया जाए तो सामने वाल व्यक्ति भी इसकी चपेट में आ सकता है।  इसके लिए अहम प्रॉपर सेनिटेशन और हाइजीन मेंटेन करना चाहिए। 

डॉ अनूप ने कहा कि इस बीमारी से ग्रसित होने वाले बच्चो के अभिभावकों से बातचीत पर यह पता चाल कि हाल ही में इस समाज का एक बड़ा इवेंट (मुहर्रम) गुज़रा है, जिस दौरान समाज के लोग बड़ी संख्या में एक जगह (मस्जिद या कम्यूनिटी सेंटर) पर एकत्र होते है और साथ में खाते पीते है। अनुमान लगाया जा रहा है कि हो सकता है कि इस दौरान यह बीमारी एक साथ सब में फ़ैल गई क्यूंकि अगर पीने के पाने से यह बीमारी फ़ैल रही होती तो कॉलोनी में और भी लोग रहते है, उनको भी हो सकती थी। लेकिन जब बड़ी मात्रा में एकत्रित होकर ऐसे कार्यक्रम में जाते है हो सकता है वहां पर ऐसी कोई चीज़ खाने पीने में आ गई हो जिससे यह बच्चो में फ़ैल गया।    

इस मामले पर बात करते हुए श्रेयस हॉस्पिटल के चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ रामाकृष्णन ने भी यही बताया की पिछले कुछ दिनों से बोहरा समाज के बच्चो में डिस्परपोशनेट टाइफाइड के मामले लगातार सामने आ रहे है। पहले शुरुआत में जो केस सामने आये ही उसमे फतहसागर में तैरने से दूषित पानी उनके शरीर में जाने से बीमार होने की बात सामने आई थी। दूसरा, मुहर्रम के समय समाज के बच्चे पूरा पूरा दिन मस्जिद में रहते थे एवं वहां पर शर्बत और दूसरी चीज़े रहती, जिसका सेवन करते थे। अनुमान लगाया जा रहा है की वहीं पर शायद पानी की क्वालिटी सही नहीं रही हो या दूषित हों। इसी के मद्देनज़र पिछले लम्बे समय से लगातार टाइफाइड के मामले हॉस्पिटल में आ रहे है। 

इनक्यूबेशन पीरियड और बच्चों में ही क्यों?  

डॉ रामाकृष्णन ने बताया कि अलग अलग बीमारी का इन्क्यूबेशन पीरियड अलग अलग होता है। फ़ूड पोइज़निंग का इन्क्यूबेशन एक या दो घंटे का होता है, डायरिया डिसेंट्री में इन्क्यूबेशन पीरियड एक या दो दिन का होता है। चिकन पॉक्स में 10 से 14 दिन का  इन्क्यूबेशन पीरियड होता है, वहीँ टाइफाइड का  इन्क्यूबेशन पीरियड 25 से 45 दिन का होता है। जिसके लक्षण धीरे धीरे सामने आते है। ऐसा लगा रहा है की यह बीमारी वहां से (मुहर्रम के लगभग एक माह बाद) आई है।  

बच्चो को इस बीमारी द्वारा अपनी चपेट में लेने की बात पर डॉक्टर रामकृष्णन ने कहा कि क्यूंकि एडल्ट्स में इम्युनिटी पावर बच्चो के मुकाबले अधिक होती है, या फिर जिनके जीवन में माइल्ड टाइफाइड की बीमारी पहले से हो चुकी होती है, जिससे उनका शरीर इम्यून हो चूका होता है। उन्होंने कहा कि अब तक 100 से अधिक बच्चे उनके हॉस्पिटल में आ चुके हैं और लगातार मरीज़ो (बच्चों) का आना जारी है। 

समाज के किचन इंचार्ज से बातचीत 

उदयपुर टाइम्स ने बोहरा समाज की खारोल कॉलोनी स्थित बुरहानी मस्जिद के किचन इंचार्ज आमिर अली से बात की। आमिर अली ने बताया कि दस दिन पहले हमारे मस्जिद में आने वाले  कुछ लोगो की शिकायत आई थी, कि दूषित पानी की वजह से बच्चो में टाइफाइड की शिकायत आ रही है। साथ ही क्षेत्र के कुछ हॉस्पिटल से भी लोगो के फ़ोन आए थे, जिसको लेकर हमने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है। आमिर ने कहा कि मरकज़ में फ़िल्टर प्लांट लगा हुआ है और खाना बनाने में इसी फ़िल्टर प्लांट का पानी इस्तेमाल में लिया जाता है। बोरवेल और RO दोनों की पानी को चेक करवाया गया, जिस पर दोनों का पीएच (pH) लेवल सही पाया गया। साथ ही पानी के सैम्पल्स को दो अलग अलग बोतलों में भरकर सैंपलिंग के लिए लैब में भेज दिया गया है जिसकी रिपोर्ट दो दिन में मिल जायेगी। 

शरबत बनाने की बात पर आमिर ने कहा कि शरबत भी मरकज़ के किचन में बनाया जाता है जो कि ज़्यादातर दूध से बनता है और अगर शरबत पानी से बनाया जाता है उसके लिए अलग से पानी के कैंपर्स बाहर से मंगवाए जाते है और इसी पानी को इस्तेमाल किया जाता है और इसके अलावा कोई पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता है।  

जानकारी के अनुसार खरोल कॉलोनी की बुरहानी मस्जिद में बना खाना और शर्बत ही मोती मगरी स्थित समाज के मरकज़ (Community Hall) में पहुंचाया जाता है। अभिभावकों से मिली जानकारी में यह बात सामने आई थी की बीमार होने वाले बच्चों में कुछ बच्चे मोती मगरी स्कीम, पंचवटी एवं सहेलियों की बाड़ी के आस पास के भी रहने वाले थे, जो की इस तरफ इशारा करता है की दूषित पानी, शर्बत या खाने से यह बीमारी फैली हो सकती है।
 

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