UT Legal Talk - मौत की सज़ा (Capital Punishment) के क्या प्रावधान हैं


UT Legal Talk - मौत की सज़ा (Capital Punishment) के क्या प्रावधान हैं

"मृत्यु दंड, जिसे मौत की सजा के रूप में भी जाना जाता है, एक अपराधी का निष्पादन है जिसे कानून की अदालत ने एक गंभीर गुंडागर्दी के लिए मौत की सजा सुनाई है।"

 
Capital Punishment Advocate Rao Ratan Singh Udaipur  UT Legal Talk Awareness Series on Capital Punishment

मृत्यु दंड या मौत की सजा का प्रावधान हमारे देश की कानून व्यवस्था में मौजूद है। यह सजा जब दी जाती है तो सज़ा मिलने वाले की मौत हो जाती है। एक तरफ पीड़ित पक्ष को इन्साफ मिलता है, तो किसी के घर का सदस्य दुनिया से चला जाता है। लेकिन कुछ अपराध इतने गंभीर होते है की अपराध करने वाले को इससे कम सज़ा मिलना भी नहीं चाहिए या फिर अगर उस घम्भीर प्रवत्ति के अपराध करने वाले अपराधी को शायद छोड़ा जाए तो वो समाज में एक बार फिर भय का माहोल बना सकता है।

इसी अहम् सज़ा के प्रावधान में उदयपुर टाइम्स के लीगल टॉक्स सेगमेंट में हम ने बात की हमारे शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता राव रतन सिंह से। उसे मुलाक़ात के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु आपके समक्ष प्रस्तुत किए जा रहे हैं:

म्रत्यु दंड किन परिस्थितियों में होती है?

ऐड्वकेट राव रत्न सिंह जी ने बताया की मृत्युदंड ‘रेयरेस्ट ऑफ़ दी रेयर’ केस जो एक दम विश्म परिस्थितियों में किया गया हो, जैसे हत्या, या एक से अधिक हत्या की हो या व्यक्ति ने पूर्व में भी बहुत अपराध किये हो। ऐसे में ये देखा जाता है की आगर वो एक क्रूर व्यक्ति है और अगर उसे छोड़ दिया गया तो समाज के लिए घातक होगा। और भी गंभीर अपराध जैसे POCSO में रेजिस्टर्ड रेप विथ मर्डर, देश द्रोह, आदि अपराधों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान है।

दंड से मुक्त

वकील साहब ने बताया की ऐसे की तरह के लोग है जिनको इस दंड से मुक्त रखा गया है।

  • इस श्रेणी में सब से अहम् है गर्भवती महिला। अगर गर्भवती महिला को मृत्यु दंड की सज़ा दी जाए, तो उसे के साथ-साथ उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की भी मौत हो जाएगी, यानि की एक साथ दो मौते होंगी। इसलिए यदि एक गर्भवती महिला को मौत की सज़ा सुनाई जाती है, तो कानून में यह प्रावधान है की उस सज़ा को बदल कर उम्र क़ैद की सज़ा कर दिया जाए।

इसके अलावा दो और तरह के व्यक्ति हैं, जो मृत्यु दंड से मुक्त हैं:

  • 18 साल स कम उम्र के व्यक्ति (नाबालिग) को मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती।
  • एक जघन्य अपराध करते समय एक व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार हो और यह नहीं समझ सकता, कि उसके द्वारा किए गए प्रदर्शन की प्रकृति जोखिम भरी है, ऐसे व्यक्ति को मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता है।

कोर्ट से राहत

अक्सर देखा जाता है लोअर कोर्ट ने मौत की सजा सुना दी है लेकिन अगर वो अपर कोर्ट में अपील करता है तो उसे रहता मिल जाती  है।

वकील राव रतन सिंह ने बताया की हमारे कानून में ये स्पष्ट है की IPC में तो offence बनते है, उसकी पूरी इन्वेस्टीगेशन की जाती है, और इन्वेस्टीगेशन के बाद चार्जशीट पेश की जाती है।  उसके बाद CRPC (भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता) के अंतर्गत ट्राइल चलाई जाती है। ट्राइल इसलिए चलती है क्योंकी किसी बेगुनाह व्यक्ति को सज़ा नहीं मिले, भले ही गुनाहगार सबूत के आभाव में छुट जाए।  इस लिए CRPC में ये प्रावधान बना हुआ है कि जिनपर आरोप है उनको पूरा मौका दिया जाता है की वो अधिवक्ता नियुक्त कर दे और नहीं कर सकता है तो सरकार की तरफ से उसे अधिवक्ता उपलब्ध करवाया जाता है, जो उसकी पैरवी करे। राव ने मुंबई आतंकवादी हमले का उदहारण देते हुए कहा की पाकिस्तान के आतंकवादी कसाब को भी अपना डिफेन्स (पक्ष) रखने के लिए कानून के तहत मौक़ा दिया गया था।  इसका तात्पर्य ये है की जो कानूनी प्रक्रिया है उसका पूरा पालन होना चाहिए।

प्रेसीडेन्शियाल पार्डन

कई बार एसा भी देखा जाता है की लोअर और अपर दोनों ही कोर्ट ने मृत्यु दंड की सजा दे दी, लेकिन राष्ट्रपति ने उसे सजा से मुक्त कर दिया। इस प्रावधान को समझाते हुए राव रतन सिंह ने बताया की आपको लोअर कोर्ट के इन्वेस्टीगेशन के दोरान पूरी ट्राइल चलती है।  कुछ मामलो में सेशनकोर्ट द्वारा ट्राइल चलती है और कुछ मामलों में ट्राइल लोवर कोर्ट द्वारा चलाई जाती है। लेकिन कुछ मामले जेसे की POCSO के मामले, एसीडी (रिश्वत लेनें के मामले), और एनडीपीएस (नशीले प्रदार्थ) के मामलो में विशेष कोर्ट है।

भारत के संविधान (अनुच्छेद 72) के तहत, भारत के राष्ट्रपति विशेष रूप से मौत की सज़ा वाले मामलों में दोषी व्यक्ति की सज़ा को क्षमा कर सकते हैं, या कम कर सकते हैं। अनुच्छेद 161 के तहत एक समान और समानांतर शक्ति प्रत्येक राज्य के राज्यपालों में निहित है।

क्षमा राष्ट्रपति की क्षमा की अभिव्यक्ति है और आम तौर पर अपराध के लिए आवेदक की जिम्मेदारी की स्वीकृति और सजा या सजा पूरी होने के बाद एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए अच्छा आचरण स्थापित करने की मान्यता में दिया जाता है। यह मासूमियत का प्रतीक नहीं है।

वरिष्ठ अधिवक्ता राव रतन सिंह के साथ साक्षात्कार

मृत्यु दंड की सज़ा में संशोधन

यह पूछे जाने पर की क्या उन्हे लगता है की भारत में मृत्यु दंड जेसी सज़ा में कोई संशोधन होना चाहिए, वकील राव रतन सिंह ने कहा:

"लेजिसलेशन (Legislation) द्वारा संशोधन स्थिति-परिस्थिति को देखते हुए एवं समाज की स्थिति देखते, हुए समय समय पर (time to time) संशोधन किया जाना चाहिए, जेसे की एसटीएसीसी एक्ट (STSC Act),जैसे संविधान में संशोधन किया गया जाता रहा है, संशोधन हमेशा उसको किये जाने की जरुरत है। कानून में प्रावधान भी समाज की स्थिति को देखते हुए किया जाना चाहिए और जनता पर उसका क्या प्रभाव आएगा उसको देखते हुए किया जाना चाहिए।  कुल मिलाकर के जनता को न्याय मिले इसको देखते हुए कानून में प्रावधान किया जाना चाहिए।"

पुलिस को बार बार कोर्ट में क्यों आना पढ़ता है?

इस प्रश्न पर राव रतन सिंह ने कहा की पुलिस पूरा केस तैयार करती है और कोर्ट में पेश करती है। भारत में जो भी अपराध IPC के तहत आते है, उसका इन्वेस्टीगेशन करने का अधिकार CrPC में पुलिस को दे रखा है और उसकी ट्राइल कोर्ट में चलती है ताकि ट्राइल के बिना किसी का ना तो कन्विक्शन (conviction) हो और ना ही अक्विटल (acquital)। इसका तात्पर्य ये ही है की कोई निर्दोष व्यक्ति सज़ा नहीं पाए और कोई अपराधी छुटे नहीं इस लिए ये मेंडेटरी प्रावधान (procedure) है। इसी वजह से हर बार पुलिस को कोर्ट में पेश रहना पद्धत है ताकि उनके द्वारा किया गया इंवेस्टिगैशन पर उनका पूरा कंट्रोल रहे। 

उदयपुर में Capital Punishment पर चली सबसे बढ़ी कार्यवाही के बारे में बताते हुए राव रतन सिंह ने बहुचर्चित रामा हत्याकाण्ड का ज़िक्र किया। उदयपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित रामा गाँव में हुए मामले में 10 लोगो की एक साथ मौत हुई थी। पहले इस केस की ट्राइल राजसमन्द में चल रही थी, लेकिन बाद में उसकी ट्राइल एडीजे 1 उदयपुर में चली थी। घटना नाथद्वारा के आगे हुई थी। रतन सिंह ने कहा कि मामले की असलियत क्या ही वो तो भगवान ही जनता है, लेकिन फिर भी मामले की ट्राइल IPC की धारा 302 (Capital Punishment) के अंतर्गत चली थी। उस समय जज कुलश्रेष्ठ साहब ने अपने फेसले में लिखा है की “जहां ये 10 आत्माएं गई है इन्हें भी उनके पास भेज देना चाहिए”। वो एक इमोशनल फैसला (decision) था। लेकिन जब इस केस की ट्राइल राजस्थान हाई कोर्ट ने ओन लेंथ आर्गुमेंट सुना और उस समय डिफेन्स लोयर डूंगर सिंह ने सभी आरोपी (accused) को बाइज़्ज़त बरी करवाया।

ऊपर दिए गए साक्षात्कार के मुख्य बिंदुओं के बाद आईए आपको मृत्यु दंड (Capital Punishment) से जुड़ी कुछ अहम बातों के बारे में बताएं:

मृत्युदंड या मृत्युदंड हमेशा न केवल भारतीय न्यायपालिका में बल्कि अधिकांश विकसित देशों में भी विरोधाभास का विषय रहा है। मृत्युदंड के निष्पादन के बाद राज्य के अधिकार पर सवाल उठाया गया और स्थापित किया गया।

भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र दो सिद्धांतों के संयोजन पर आधारित है: एक सुधारवादी सिद्धांत है, जिसके अनुसार अपराध एक बीमारी की तरह लगता है। यह सिद्धांत मानता है कि "आप मारने से ठीक नहीं हो सकते"। इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य अपराधी के व्यक्तित्व और चरित्र में परिवर्तन लाना, उसे समाज का एक उपयोगी सदस्य बनाना है। दूसरा सिद्धांत जिसका पालन किया जाता है वह निवारक सिद्धांत है, जो कहता है कि 'रोकथाम इलाज से बेहतर है'। अपराध करने से पहले रोकथाम करना बेहतर है। इस सिद्धांत का उद्देश्य अपराधी को मौत की सजा देकर या उसे जेल में बंद करके या उसके ड्राइविंग लाइसेंस को निलंबित करके, जैसा भी मामला हो, अपराध को अक्षम करके अपराध को रोकना है।

भारत में, मौत की सजा सबसे वास्तविक और भयानक अपराधों के लिए दी जाती है। हत्या, चोरी के साथ हत्या, प्रशासन के खिलाफ हथियार उठाने आदि के लिए मौत की सजा दी जाती है। यह सजा तब दी जाती है जब अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आजीवन कारावास की कमी है।

भारत में जिन अपराधों में मृत्युदंड दिया जाता है वे इस प्रकार हैं:

  • विकराल हत्या;
  • मौत में प्रदर्शन करने वाले अन्य अपराध;
  • देश द्रोह, जासूसी;
  • आतंकवाद से संबंधित अपराध, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हुई;
  • सैन्य अपराध, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु हो या न हो;

भारत में निष्पादन के तरीके

फांसी

भारत में मृत्यु दंड के तहत निष्पादन (execution) अपराधी को मृत्यु तक फांसी पर चढ़ा कर (To be Hanged till Death) दी जाती है। 1949 में मोहनदास करमचंद गांधी के हत्यारे यानी नाथूराम गोडसे स्वतंत्र भारत में फांसी पर लटकाए जाने वाला पहला अपराधी था। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया कि मृत्युदंड की सज़ा उन मामलों में दी जानी चाहिए जो 'दुर्लभतम' ( RAREST OF THE RARE) मामलों के दायरे में आते हैं।

2010 से अब तक दो व्यक्तियों को मौत की सजा दी जा चुकी थी। एक है अफ़ज़ल  गुरु, एक आतंकवादी जिसने दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला किया था। उसकी मौत की सजा 9 फरवरी, 2013 को तिहाड़ जेल, दिल्ली में फांसी पर लटका कर दी गई थी। दूसरा अजमल कसाब का है, जो मुंबई में 2008 हमले का अकेला जीवित आतंकवादी था।  उसे मौत की सज़ा 21 नवंबर 2012 को यरवदा सेंट्रल जेल, पुणे में सुबह 7:32 बजे फांसी पर लटका कर दी गई थी।

शूटिंग

सेना अधिनियम, 1950 और वायु सेना अधिनियम, 1950 भी मृत्युदंड देने के प्रावधान और तरीके प्रदान करते हैं। वायु सेना अधिनियम, 1950 की धारा 34 न्यायालय को अधिनियम की धारा 34 (ए) से (ओ) में वर्णित अपराधों के लिए मृत्युदंड देने का अधिकार देती है।

वायु सेना अधिनियम, 1950 की धारा 163 प्रदान करती है कि:

"मौत की सजा देने में, एक कोर्ट-मार्शल, अपने विवेक से, निर्देश देगा कि अपराधी को तब तक गर्दन से लटका कर मौत की सजा दी जाए जब तक कि वह मर न जाए या गोली मारकर मौत का शिकार हो जाए।"

यह अदालत को मौत की सजा के क्रियान्वयन के लिए या तो निष्पादन या शूटिंग द्वारा प्रदान करने के लिए विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है। वायु सेना अधिनियम, 1950 के रूप में, सेना अधिनियम, 1950 और नौसेना अधिनियम, 1957 भी इसी तरह के प्रावधान प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष

मृत्यु दंड का मुद्दा एक बहस का मुद्दा है, कुछ लोगों को यह असंवैधानिक लगता है जबकि कुछ इसके पक्ष में हैं। लंबे समय तक अध्ययन करने के बाद भी इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला है।

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