होली | "सृष्टि का भी आज त्यौहार..."


होली | "सृष्टि का भी आज त्यौहार..."

 
Holi
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सृष्टि का भी आज त्यौहार
मारी पिचकारी वृष्टि ने आज
धरा का आँचल भीगा
होली का यह निमंत्रण अनूठा

जाग मनुज जाग:-
प्रकृति मनोरम, त्यौहार मनोहारी
रंग रंगीन, पर्व लहरी
प्रियसी उल्लसित, प्रियतम हर्षित ,
पुष्प का मकरंद, तितलियों का गुंजन

प्रेयसि सजी है अंग-अंग ,
दिवस आज नवरंग
मारी पिचकारी सतरंग
हरे क्लेश जो झरे सबरंग

मधुरता को रंग लगा दे,
अंतरतम का संग बना ले ,
अलौकिक सा लोक है
यह रंगो का आलोक है

प्रिय-मिलन का संजोग है
फिर कहाँ यह योग है

कृष्ण निहारे राधा छवि
बरस पड़े जो पिचकारी

सजनी साजन की मनुहार
निहारो तुम फूलों का हार ,
पुष्प हँसे, खुशबू बसे
नयन मिले, स्नेह जरे

बैरभाव मिटे , मनभेद घटे
सुरभि की महक, दिलों में चहक
 रंगो की फुलझड़िया, प्रेम-स्नेह की लड़ियाँ
होली सतरंगी, इंद्रधनुष बहुरंगी

सृष्टि का भी आज त्यौहार
मारी पिचकारी वृष्टि ने आज

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