मानवता पूछ रही है: क्या विश्व नेतृत्व ने सबक लिया?

लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, सामाजिक विचारक, उदयपुर

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Iran-Israel conflict escalation with Strait of Hormuz oil disruption and US policy shift

लगभग 7250 से अधिक मौतें, 300 अरब डॉलर की तबाही। तेल बाजारों में उथल-पुथल। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता। और पूरी दुनिया में एक भय-क्या दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की ओर धकेल दिया गया है?

फिर अचानक युद्धविराम और समझौते की खबर आती है। दुनिया राहत की सांस लेती है। शेयर बाजार मुस्कुराने लगते हैं। कूटनीतिज्ञ इसे अपनी सफलता बताते हैं। लेकिन इसी शोर और राहत के बीच मानवता एक सवाल पूछती है-क्या यह समझौता स्थायी शांति का मार्ग है या अगले संघर्ष से पहले की एक खामोशी?

युद्ध कभी केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता। वह इंसानों के मन में भी लड़ा जाता है। मिसाइलें शहरों को नष्ट करती हैं लेकिन अपमान, प्रतिशोध और अविश्वास की आग पीढ़ियों तक जलती है। यही कारण है कि युद्ध का अंत तो केवल कागजों पर होता है,  प्रभाव लंबे समय तक जीवित रहते हैं। युद्धविराम हथियारों को शांत कर सकता है लेकिन घावों का मरहम नहीं बन सकता।

ईरान के लिए यह संघर्ष सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं था। यह राष्ट्रीय सम्मान, संप्रभुता और अस्तित्व का प्रश्न भी बन गया। ऐसे में यह मान लेना कि एक समझौते के बाद सारी कटुता समाप्त हो जाएगी, शायद इतिहास की समझ से दूर होगा। राष्ट्र भूल सकते हैं लेकिन समाज जल्दी नहीं भूलते। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन खोए हैं, उनके लिए युद्धविराम केवल एक राजनीतिक शब्द है, मरहम नहीं। उनके लिए हर समाचार में किसी अपनों की याद जुड़ी होती है।

दूसरी ओर अमेरिका विश्व राजनीति में शुरू से अपना दबदबा बनाए की कोशिश करता रहा है। लेकिन हर शक्ति अपने पीछे असंतोष के बीज भी छोड़ जाती है। दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं जो अमेरिकी नीतियों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। वे प्रत्यक्ष टकराव की स्थिति में न हों लेकिन अवसरों की प्रतीक्षा अवश्य करते हैं। इसलिए यह संघर्ष केवल दो देशों का मामला नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रश्न भी है। आज कोई भी बड़ी सैन्य कार्रवाई सीमाओं में कैद नहीं रहती। उसकी गूंज महाद्वीपों तक सुनाई देती है।

दुनिया पहले जैसी नहीं रही। एक क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है और उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। पश्चिमी एशिया में तनाव बढ़ता है तो भारत में पेट्रोल महंगा होता है। यूरोप में उद्योग प्रभावित होते हैं। एशिया में निवेशकों की चिंता बढ़ती है। अफ्रीका में खाद्य संकट गहराता है। यही वैश्वीकरण का दूसरा चेहरा है। इसलिए अब कोई भी युद्ध क्षेत्रीय नहीं रहा।

विडंबना देखिए, जिस धन से अस्पताल बन सकते थे, स्कूल खुल सकते थे, शोध केंद्र विकसित हो सकते थे, वह धन बमों, मिसाइलों और विनाश में झोंक दिया गया। दुनिया के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की विकृति है। मानव विकास पर खर्च कम और विनाश की तैयारी पर खर्च अधिक हो रहा है। ऐसा लगता है मानो विज्ञान और तकनीक का उपयोग जीवन बचाने से अधिक जीवन नष्ट करने की क्षमता बढ़ाने में किया जा रहा हो।

भारतीय संस्कृति इस पूरे परिदृश्य को अलग दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल हमारा नारा नहीं बल्कि जीवन-दर्शन है। पूरी पृथ्वी एक परिवार है। परिवार में मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसके विनाश की कामना नहीं। संवाद हो सकता है, लेकिन संहार नहीं। भारत की सभ्यता ने हमेशा शक्ति और शांति के बीच संतुलन की बात की है। शक्ति संपन्न राष्ट्र आवश्यक है लेकिन उसका उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, सुरक्षा और स्थिरता स्थापित करना होना चाहिए।

महाभारत काल में अठारह दिन का  कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त हुआ पर क्या कोई वास्तव में विजेता था? हस्तिनापुर बच गया लेकिन रिश्ते टूट गए। राज्य बच गया लेकिन पीढ़ियां उजड़ गईं। विजय मिली, पर शांति नहीं। आधुनिक युद्ध भी इसी सत्य की पुनरावृत्ति हैं। युद्ध के मैदान में जीत हार है, लेकिन उससे मनुष्य के भीतर पैदा हुआ शून्य क्या कभी भर पाएगा।

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता स्वागत योग्य है। दुनिया को युद्ध नहीं, संवाद चाहिए। लेकिन केवल समझौता ही पर्याप्त नहीं है। यदि उसके पीछे विश्वास नहीं होगा, यदि न्याय का भाव नहीं होगा, यदि प्रतिशोध की आग को शांत करने का प्रयास नहीं होगा, तो यह समझौता केवल संदेह और संशय का शिलालेख तो बनेगा पर समाधान नहीं। शांति तब टिकती है जब वह भय नहीं, भरोसा पैदा करें।

मानवता का प्रश्न भी यही है-क्या विश्व नेतृत्व ने युद्ध से कोई सबक लिया? क्या वे समझेंगे कि शक्ति का प्रदर्शन शांति की गारंटी नहीं होता? क्या वे स्वीकार करेंगे कि भय से स्थिरता नहीं आती बल्कि संवाद से आती है? क्या वे यह मानेंगे कि किसी भी संघर्ष की अंतिम मंजिल बातचीत की मेज ही होती है?

क्योंकि इतिहास का एक कठोर नियम है-युद्ध कभी समाप्त नहीं होते, उन्हें केवल अगली पीढ़ियों के लिए टाल दिए जाते हैं, यदि उनके कारणों का समाधान न किया जाए। तब तक अन्याय, अविश्वास और प्रभुत्व की मानसिकता रहेगी और शांति मात्र दिवास्वप्न। 

आज दुनिया को हथियारों की नहीं, विश्वास की आवश्यकता है। मिसाइलों की नहीं, संवाद की आवश्यकता है। प्रभुत्व की नहीं, सह-अस्तित्व की आवश्यकता है। मानवता को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो युद्ध जीतने से अधिक शांति बचाने को अपनी सफलता माने।

समय का एक प्रश्न अमेरिका और ईरान से ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व नेतृत्व से है। यदि हर संघर्ष का अंतिम पड़ाव संवाद ही है, तो मानवता को विनाश के रास्ते से क्यों गुजरना पड़ा?

वक्त का यह प्रश्न भविष्य की सबसे बड़ी चेतावनी भी है। शांति समझौतों से नहीं, समझदारी से जन्म लेती है। शक्ति भय पैदा कर सकती है, लेकिन विश्वास नहीं। और जब समझदारी देर से आती है, तब उसकी कीमत अक्सर मानवता को अपने खून, अपने भविष्य और उसकी पीढ़ियों के सपनों से चुकानी पड़ती है।

मानवता आज भी प्रतीक्षा में है-क्या विश्व नेतृत्व ने वास्तव में कोई सबक लिया है या इतिहास स्वयं को फिर दोहराने की तैयारी कर रहा है?

डिस्क्लेमर:

यह लेख वर्तमान घटनाओं, मीडिया रिपोर्ट्स और सार्वजनिक चर्चाओं के आधार पर लिखा गया एक विश्लेषणात्मक एवं विचारात्मक लेख है। इसका उद्देश्य  विभिन्न मुद्दों पर जनचर्चा को सामने लाना है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी दृष्टिकोण हैं और इन्हें किसी न्यायिक निष्कर्ष या आधिकारिक पुष्टि के रूप में न लिया जाए।

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