अदृश्य बाधाएँ और समाज का मौन: दिव्यांग अधिकारों की ज़मीनी हकीकत
Udaipur Times, 5 जुलाई 2026। आधुनिकता और विकास की दौड़ में हम अक्सर उन आवाजों को पीछे छोड़ देते हैं, जो बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। दिव्यांग समाज की पीड़ा केवल उनकी शारीरिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस सामाजिक व्यवस्था की उपज है जो कदम-कदम पर उन्हें उनकी 'अक्षमता' का अहसास कराती है। हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश जाटव द्वारा उठाए गए सवाल प्रशासन और समाज, दोनों के लिए एक आईना हैं।
दोहरी चुनौती: दिव्यांग महिलाएँ और सामाजिक बेड़ियाँ
दिव्यांगता जब स्त्रीत्व के साथ जुड़ती है, तो संघर्ष की परिभाषा बदल जाती है। समाज की संकुचित सोच दिव्यांग बेटियों के सपनों को 'खतरनाक' करार दे देती है। सुरक्षा के अभाव और सुलभ परिवहन की कमी के कारण अक्सर उनकी शिक्षा बीच में ही छूट जाती है। जब एक दिव्यांग लड़की खामोश होती है, तो उसे उसकी 'सहमति' समझ लिया जाता है, जबकि हकीकत में वह उसकी टूटी हुई हिम्मत और समाज की बेरुखी का परिणाम होता है। यह मौन हमारे समाज की सबसे बड़ी विफलता है।
योग्यता बनाम अक्षमता: रोजगार का संकट
युवाओं के लिए सबसे बड़ी बाधा रोजगार के बाजार में खड़ी है। इंटरव्यू बोर्ड अक्सर किसी उम्मीदवार की योग्यता (Skills) के बजाय उसकी शारीरिक स्थिति पर ध्यान केंद्रित करता है। यदि कोई दिव्यांग सहायता मांगता है, तो उसे 'निर्भर' मान लिया जाता है, और यदि वह स्वाभिमान से खड़ा होना चाहता है, तो उसे 'अहसानफरामोश' की संज्ञा दे दी जाती है। आत्मविश्वास को निगलने वाला यह व्यवहार युवाओं को मानसिक अवसाद की ओर धकेलता है।
कानून की किताब और धरातल का सन्नाटा
भारत में दिव्यांगों के अधिकारों के लिए कड़े कानून और योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन क्या वे वास्तव में उन तक पहुँच रही हैं? कागजों पर दर्ज अधिकार अक्सर ज़मीन पर उतरते ही दम तोड़ देते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर रैंप का अभाव, परिवहन में असुविधा और प्रशासनिक उदासीनता यह दर्शाती है कि दिव्यांगों की कम संख्या के कारण उनकी आवाज़ को राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर प्राथमिकता नहीं दी जाती।
