अरावली में तेंदुआ-मानव संघर्ष की नई तस्वीर: नुकसान भारी, फिर भी कायम है सहअस्तित्व

जयसमंद अभयारण्य क्षेत्र में 13 साल में 572 घटनाएं, 98% मामलों में पशुधन शिकार; मुआवजा प्रणाली कमजोर, लेकिन लोगों की सहनशीलता मजबूत
 
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उदयपुर 19 अप्रैल 2026। राजस्थान के दक्षिणी अरावली क्षेत्र में इंसान और तेंदुए के बीच संबंध टकराव और सह अस्तित्व का अनोखा मिश्रण बनकर सामने आया है। जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य के आसपास किए गए एक विस्तृत शोध में यह खुलासा हुआ है कि भारी आर्थिक नुकसान के बावजूद स्थानीय समुदायों में तेंदुए के प्रति सहनशीलता बनी हुई है।

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्राणी शास्त्र विभाग के प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय कुमार कोली और उनके दल के कमल वैष्णव, निर्भय सिंह चौहान व उत्कर्ष प्रजापति द्वारा 2011 से 2024 के बीच किए गए इस अध्ययन में 572 मानव-तेंदुआ संघर्ष घटनाएं दर्ज की गई, जिनमें से लगभग 98% मामले पशुधन के शिकार से जुड़े थे।

Leopard area

रात में बढ़ता है खतरा, बकरियां सबसे ज्यादा निशाने पर

कोली ने बताया कि शोध के अनुसार तेंदुए के हमले मुख्य रूप से रात के समय होते हैं, जब पशु खुले या कच्चे बाड़ों में बंधे होते हैं। इनमें बकरियां, गाय और बछड़े सबसे ज्यादा शिकार बने। शोध में पाया गया है कि ऊंचाई वाले और अभयारण्य के पास स्थित गांवों में खतरा सबसे अधिक पाया गया, जहां मानव बस्तियां और वन क्षेत्र एक-दूसरे से सटे हुए हैं।

मुआवजा: प्रक्रिया कठिन, राशि कम

कोली ने बताया कि अध्ययन में मुआवजा प्रणाली की बड़ी खामियां भी उजागर हुईं। कुल घटनाओं में से केवल 31% मामलों में ही मुआवजे के लिए दावा किया गया। इसी प्रकार स्वीकृत राशि वास्तविक नुकसान से काफी कम रही वहीं जटिल कागजी प्रक्रिया और कम जागरूकता प्रमुख बाधाएं रहीं। इससे ग्रामीणों में आर्थिक दबाव तो बढ़ा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इससे तेंदुए के प्रति हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दिखी।

Jaisamand Sanctuary
Jaisamand Sanctaury

सह अस्तित्व की मिसाल: बदले की भावना नहीं

शोध की सबसे सकारात्मक बात यह रही कि तेंदुए के खिलाफ बदले में हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया। स्थानीय लोगों का दृष्टिकोण लगभग तटस्थ (−0.2 स्कोर) पाया गया, जो बताता है कि सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं वन्यजीव संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही हैं।

शिक्षा से बदलता नजरिया

अध्ययन में यह भी सामने आया कि अधिक शिक्षित लोग तेंदुए के प्रति अधिक सकारात्मक सोच रखते हैं जबकि कम आय और कम शिक्षा वाले परिवारों में डर और नकारात्मकता अधिक है। अर्थात शिक्षा, सहअस्तित्व की सबसे मजबूत कुंजी बनकर उभर रही है।

Leopard

संघर्ष के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों के अनुसार संघर्ष के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इसके तहत जंगल और गांवों के बीच बढ़ती नजदीकी, खुले और असुरक्षित पशु बाड़े, भूमि उपयोग में बदलाव, अभयारण्य के आसपास मानव गतिविधियां आदि तेंदुआ और मानव संर्घ के प्रमुख कारण पाए गए हैं।

क्या हैं समाधान?

शोधकर्ताओं ने इस संघर्ष को कम करने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। इसके तहत पशुओं के लिए जालीदार और मजबूत बाड़े बनाने के साथ-साथ चराई में बदलाव करते हुए जंगल के भीतर की बजाय गांव के पास चराई को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार मुआवजा प्रणाली में सुधार के तहत सरल प्रक्रिया और बाजार मूल्य के अनुरूप भुगतान किया जाना चाहिए। उन्होंने इस संघर्ष को कम करने के लिए जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को सुरक्षा और वन्य जीव व्यवहार की जानकारी देने की बात भी कही है।

Jaisamand Leopard conflict researcehr team
Research Team

एक्सपर्ट व्यू :

NTCA के सदस्य और सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक राहुल भटनागर बताते हैं कि अध्ययन स्पष्ट करता है कि तेंदुए को बचाने के लिए केवल जंगल संरक्षण पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि उन लोगों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जो इन वन्यजीवों के साथ अपनी जमीन साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरावली की पहाड़ियों में यह सह अस्तित्व की कहानी न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती है। जहां संघर्ष के बीच भी संतुलन संभव है।

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