सिस्टम का शिकार हैं मनरेगा मज़दूर

राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता 'कमल' द्वारा प्रस्तुत आलेख 

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MNREGA workers are victims of the system

"साहब! हमारे जॉब कार्ड तो बन गए, लेकिन अधिकतर मज़दूरों को यह तक नहीं मालूम कि काम की माँग कैसे की जाती है? मस्टररोल में नाम कैसे चढ़ता है? और मजदूरी कब और कैसे मिलती है? कोई बताने को तैयार ही नहीं है। समझ में नहीं आता है कि कहां जाएं?" यह कहते कहते बापू लाल का गला भर आया।  वह अपने आंसू छुपाने के लिए आसमान की तरफ देखने लगा। यह सिर्फ एक अशोक की कहानी नहीं है। राजस्थान के बांसवाड़ा के हर गांव में आपको ऐसे अशोक मिल जायेंगे, जिन्हें मनरेगा के नाम पर केवल धोखा और आश्वासन मिल कर रह जाता है। 

राजस्थान का बाँसवाड़ा ज़िला, जिसे कभी शाही जल नगरी कहा गया, आज भी अपनी संस्कृति, संघर्ष और संकल्प के लिए जाना जाता है। माही नदी की कल-कल ध्वनि, सौंधी मिट्टी की खुशबू और आदिवासी परंपरा की जीवंतता इस ज़मीन की पहचान है। लेकिन इसी धरती पर आज भी हज़ारों मज़दूर मनरेगा योजना के नाम पर अन्याय, अपमान और उपेक्षा की पीड़ा सह रहे हैं।

मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम-जिसे भारत सरकार ने ग्रामीणों को काम, गरिमा और आत्मनिर्भरता देने के लिए लागू किया था-वह बाँसवाड़ा जैसे ज़िलों में कागज़ों की योजना बनकर रह गई है। घाटोल, कुशलगढ़, गांगड़तलाई और सज्जनगढ़ जैसे आदिवासी ब्लॉकों में मज़दूर काम माँगते हुए पंचायतों के चक्कर लगाते हैं। कभी घंटों इंतज़ार करते हैं, कभी बार-बार लौटाए जाते हैं. कभी कहा जाता है “फिलहाल काम नहीं है”, तो कभी “बाद में आना।” कहकर उन्हें आगे का समय दे दिया जाता है। लेकिन नहीं दी जाती है तो केवल मनरेगा के तहत मज़दूरी और उसके पैसे। 

जब मज़दूर एकजुट होकर संगठित ढंग से काम की माँग करते हैं, तो उन्हें तोड़ने की कोशिश होती है। जहाँ एकता है, वहाँ असहमति फैलाई जाती है, क्योंकि “पूरा काम, पूरा दाम” की माँग करने वाले मज़दूर दरअसल भ्रष्टाचार की जड़ों को हिलाने लगते हैं। गोलियावाड़ा, जालिमपुरा और बोरपी खाटा जैसी पंचायतों में मजदूरों ने काम के लिए आवेदन दिए, रसीद भी मिली, लेकिन काम स्थल पर कोई काम नहीं था। और जब सवाल पूछा गया, तो मस्टररोल में दर्ज किया गया-“जीरो।” यानी काम भी नहीं, पैसा भी नहीं, और न्याय भी नहीं।

डिजिटल इंडिया की हकीकत जब जंगलों की सीमा पर पहुँचती है, तो वह तकनीक का उत्सव नहीं, बल्कि बहिष्कार बन जाती है। बाँसवाड़ा के कई गाँव आज भी नेटवर्क, बिजली और स्मार्टफोन जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। ऐसे में जब मनरेगा में हाजिरी मोबाइल ऐप से ली जाती है, तो मज़दूरों का नाम मस्टररोल में दर्ज नहीं होता। पूरा दिन काम करने के बाद, केवल इस वजह से उनका नाम “0” हो जाता है। सवाल यह है कि यह तकनीक प्रगति का माध्यम है या गरीब और अनपढ़ मज़दूरों के साथ अन्याय का एक नया हथकंडा?

सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि हर साल बाँसवाड़ा से हज़ारों महिलाएँ काम की तलाश में गुजरात और महाराष्ट्र पलायन करती हैं, जहाँ वे खेतों, ईंट-भट्टों और फैक्ट्रियों में अमानवीय परिस्थितियों में काम करती हैं। कई बार उनके साथ हिंसा, शोषण और लापता हो जाने जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं। लेकिन इसे कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। हालांकि जिन पंचायतों में मनरेगा की सही जानकारी दी गई, वहां की परिस्थिति काफी बदल गई है। ऐसे गांवों की महिलाओं को अब काम की तलाश में पलायन नहीं करनी पड़ती है। गाँव में ही काम मिलना केवल राहत ही नहीं, बल्कि जागरूकता और हक़ के लिए आवाज़ उठाने की शुरुआत है।

यह लेख सिर्फ़ आँकड़ों की रिपोर्ट नहीं है, बल्कि मनरेगा मज़दूरों के साथ होने वाले शोषण का आँखों देखा हाल है। मैं पिछले 9 वर्षों से मजदूरों के साथ काम कर रहा हूँ। मैंने वो रजिस्टर देखे हैं जहाँ मज़दूरों ने पूरी मेहनत से काम किया, लेकिन मस्टररोल में "0" दिखाया गया। मैंने पंचायतों में जनसुनवाइयाँ करवाई हैं, अफसरों से सवाल किए हैं और इसके लिए मुझे कई बार धमकियां भी मिली। लेकिन डर नहीं लगा, क्योंकि मजदूरों की आँखों में भरोसा था।

मेरा मानना है कि “मज़दूर दोषी नहीं, व्यवस्थाएं जवाबदेह हैं।” लेकिन अक्सर सुनने को मिलता है “मज़दूर खुद काम नहीं करना चाहते”, “वे ही गड़बड़ी करते हैं”, “फर्जीवाड़ा उन्हीं की वजह से होता है।” यह एक बहुत बड़ी भूल है, क्योंकि जो गलतियाँ पंचायत स्तर पर होती हैं, उन्हें मजदूरों के सिर पर मढ़ दिया जाता है। प्रशासन की चुप्पी, मज़दूरों के साथ अन्याय का माध्यम बनती जा रही है। जब एक मज़दूर काम माँगता है, वह भीख नहीं अपने संवैधानिक अधिकार की माँग करता है। लेकिन अक्सर प्रशासनिक रवैया टालने वाला होता है। शिकायतें तो की जाती हैं, लेकिन जाँच नहीं होती। कर्मचारी अपनी तनख्वाह समय पर लेते हैं, लेकिन मज़दूर महीनों काम की बाट जोहता है।

सवाल उठता है कि क्या मनरेगा जैसे अधिनियम को कमजोर कर हम भारत के सबसे मेहनती वर्ग की उम्मीदों को तो नहीं तोड़ रहे? क्या आदिवासी क्षेत्रों को केवल योजनाओं के नाम पर छोड़ देना विकास कहलाएगा? और क्या प्रशासन की असफलता को मज़दूरों पर मढ़ देना सबसे आसान रास्ता बन गया है? मनरेगा को बचाना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि संविधान में दर्ज गरिमा और आत्मसम्मान की गारंटी है। इसके पीछे हज़ारों संगठनों, कार्यकर्ताओं और मज़दूरों की सामूहिक आवाज़ है। यह अधिनियम पलायन, भुखमरी और आत्महत्या के खिलाफ एक सशक्त योजना है।

आज बाँसवाड़ा की घाटियों से आवाज़ उठ रही है “पूरा काम, पूरा दाम चाहिए। जानकारी, इज्ज़त और अधिकार चाहिए।” यह उस सोच को चुनौती देता है जो मानती है कि मजदूर असंगठित, अनपढ़ और कमजोर हैं। ऐसे लोग, संगठन और विचारधारा यह भूल जाती है कि वे जाग चुके हैं, और अब वे चुप नहीं रहेंगे।मनरेगा को बचाना, मतलब सिर्फ एक योजना को बचाना नहीं बल्कि भारत के भविष्य को बचाना है. बाँसवाड़ा से उठी यह आवाज़ अब पूरे देश में गूंजनी चाहिए ताकि हर मज़दूर को उसका हक़, सम्मान और काम मिले और वह फिर किसी सिस्टम का शिकार न हो। 

नोट: लेखक 'कमल' राष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो पिछले 9 वर्षों से देश के अलग-अलग राज्यों और वर्तमान में बाँसवाड़ा ज़िले के आदिवासी क्षेत्रों में मनरेगा मज़दूरों के अधिकारों के लिए ज़मीनी स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं। वे सूचना, संगठन और न्याय आधारित आंदोलनों से जुड़े हैं, और प्रशासनिक जवाबदेही के लिए निरंतर सक्रिय हैं।

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