मेनार में बारूद की होली का अनोखा नज़ारा
उदयपुर 5 मार्च 2026। चित्तौड़गढ़ उदयपुर नेशनल हाईवे पर स्थित मेनार गांव में बुधवार रात बारूद की होली का अनोखा नजारा देखने को मिला। आधी रात को लाल पगड़ियां और सजे-धजे कपड़ों में लोग हाथों में तलवारें लिए खड़े थे। चारों तरफ आग उगलती तोपें, एक के बाद एक धमाके और बंदूकों से चलती गोलियों के बीच माहौल ऐसा लग रहा था मानो कोई युद्ध छिड़ गया हो।
यह आयोजन उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर मेनार गांव में हर साल होलिका दहन के 48 घंटे बाद यानी जमरा बीज की रात को होता है। करीब 451 साल पहले मुगल चौकी ध्वस्त करने की जीत की खुशी में मेनारिया ब्राह्मण समाज बारूद की होली खेलता है।

कहा जाता है कि मेवाड़ में महाराणा अमर सिंह के समय जगह-जगह मुगलों की छावनियां बनी हुई थीं। मेनार गांव के पूर्वी छोर पर भी मुगल छावनी थी। छावनी के आतंक से लोग परेशान थे। इसी दौरान मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर जीत का समाचार मिला तो गांव के लोग ओंकारेश्वर चबूतरे पर जुटे और मुगल चौकी पर हमला करने की रणनीति बनाई। इसके बाद हमला कर मुगल छावनी को ध्वस्त कर दिया गया। उसी विजय की स्मृति में यह परंपरा आज भी निभाई जाती है।
जमरा बीज की रात मेनार गांव का माहौल किसी युद्ध स्थल से कम नहीं होता। गांव के लोग सैनिकों की पोशाक पहनते हैं, हाथों में मशालें और तलवारें लेकर निकलते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच तलवारों के साथ पारंपरिक गेर नृत्य किया जाता है और गांव के रास्तों की मोर्चाबंदी की जाती है। इस आयोजन को देखने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश समेत देश-विदेश से लोग मेनार पहुंचते हैं।
दोपहर में ऐतिहासिक बारूद की होली की शुरुआत ओंकारेश्वर मंदिर चौक में होती है, जहां शाही लाल जाजम बिछाकर मेनारिया ब्राह्मण समाज के पंचों और बुजुर्गों का स्वागत किया जाता है। इसके बाद गांव के जैन समाज के लोग अबीर-गुलाल बरसाते हैं और सभी एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं देते हैं।

रात करीब 10:15 बजे रस्में शुरू होती हैं। पूर्व राजवाड़ों के सदस्य सैनिकों की पोशाक, धोती-कुर्ता और कसूमल पाग बांधकर तलवारें और बंदूकें लेकर घरों से निकलते हैं। अलग-अलग रास्तों से ललकारते हुए वे ओंकारेश्वर चौक पहुंचते हैं।
यहां चबूतरे पर गांव के पांच रास्तों की मोर्चाबंदी का आदेश दिया जाता है। पांच टुकड़ियां पांच मशालें लेकर ढोल की थाप पर गांव की मोर्चाबंदी के लिए निकलती हैं। जब पांचों दल एक साथ कूच करते हैं तो रोमांच चरम पर पहुंच जाता है और हजारों लोग इस नजारे के गवाह बनते हैं।
महिलाएं सिर पर मंगल कलश रखकर और पुरुष आतिशबाजी करते हुए बीचरी माता की घाटी पहुंचते हैं, जहां मुगल चौकी पर जीत की शौर्य गाथा पढ़ी जाती है। इसके बाद महिलाएं थंभ चौक पर मुख्य होली को ठंडा करने की रस्म निभाती हैं।
ढोल-नगाड़ों के साथ आगे टुकड़ियां और पीछे महिलाएं ओंकारेश्वर चौक की ओर बढ़ती हैं। रास्ते में तलवार और लकड़ी के डंडों के साथ नृत्य किया जाता है और हैरतअंगेज करतब दिखाए जाते हैं। महिलाएं वीर रस के गीत गाती हैं।

ओंकारेश्वर चौक पहुंचते ही बारूद की होली का मुख्य आयोजन शुरू होता है। पांचों टुकड़ियों के योद्धा एक साथ हवाई फायर करते हैं, आतिशबाजी होती है और तोपों में बारूद भरकर धमाके किए जाते हैं।
मेनार की बारूद की होली में हिस्सा लेने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। विदेशों में रहने वाले मेनारिया समाज के लोग भी कई दिन पहले गांव पहुंच जाते हैं। हालांकि इस बार इजरायल-ईरान युद्ध के चलते कुछ लोग फ्लाइट बंद होने के कारण नहीं आ सके।
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