उदयपुर: शिल्पग्राम में मल्हार में सुरों ने रचा सावन, तबले ने जगाया लय का उत्सव
Udaipur Times, Shilpgram Event: झीलों की नागरी मे भले ही सावन अपनी रिमझिम लय से रूठा और रूखा नजर आया लेकिन शिल्पग्राम स्थित दर्पण सभागार मे सुरों की अपनी ऋतु हौले से आकार ले रही थी। जिसमें कहीं राग मारवा की गंभीर, गहन और आत्ममंथन करती स्वर-छाया थी, तो कहीं गौड़ मल्हार में बरखा की भीनी-भीनी अनुभूति। इसी सांगीतिक यात्रा को संगतकार पुष्कराज जोशी के तबले की दमदार थाप और और सुप्रिया मोड़क जोशी के हारमोनियम की लयकारी ने एक अलग ऊंचाई दी।
पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘मल्हार’ उत्सव की पहली संध्या भारतीय शास्त्रीय संगीत के कई रंगों को एक साथ समेटे रही। कार्यक्रम की शुरुआत में केंद्र निदेशक डॉ अश्विन एम दलवी, पूर्व केंद्र निदेशक फुरकान खान और कलाकार विनायक चित्तर ने दीप प्रज्जवन किया।
विदुषी गौरी पाठारे ने राग मारवा से संध्या का आरंभ किया। विलंबित झूमरा ताल में निबद्ध ख्याल को उन्होंने जिस ठहराव और संयम से विस्तार दिया, उसने राग की गंभीर प्रकृति को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। स्वर विस्तार में न कोई जल्दबाजी थी, न अनावश्यक प्रदर्शन; बल्कि आलाप और तानों के बीच एक सहज संवाद बना रहा।
इसके बाद द्रुत तीनताल की बंदिश ने प्रस्तुति में गति और चंचलता भर दी। मारवा की गंभीर भावभूमि से निकलकर जब गौरी पाठारे ने राग गौड़ मल्हार की ओर रुख किया, तो मानो सभागार में सावन का दृश्य ही बदल गया। स्वरों में मेघों की उमड़न, बूंदों की रिमझिम और वर्षा के उल्लास की अनुभूति सहज रूप से उभरती रही। अंत में कजरी की प्रस्तुति ने शास्त्रीय संगीत की ऊंचाइयों को लोक की मिट्टी से जोड़ते हुए आत्मीय समापन दिया।
संध्या का दूसरा हिस्सा तबले के नाम रहा। इसमें हेतल मेहता जोशी ने विलंबित धमार में एकल वादन शुरू करते हुए ताल की गंभीरता और वीर रस को प्रभावपूर्ण रूप से उभारा। उठान, चलन, चारी, बांट, रेला, उपज और विविध तिहाइयों के माध्यम से उन्होंने तबले की परंपरागत संरचना के भीतर अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया। मध्यलय तीनताल में पहुंचते-पहुंचते वादन और अधिक संवादपूर्ण हो गया। पारंपरिक रचनाओं के साथ मौलिक टुकड़ों ने प्रस्तुति को समकालीन ऊर्जा दी। राजेंद्र बनर्जी की हारमोनियम लेहरा संगत ने लय के इस विस्तार को सुरों का मजबूत आधार प्रदान किया।
पहली संध्या ने यह अहसास कराया कि ‘मल्हार’ केवल मौसम का नाम नहीं, बल्कि भारतीय संगीत में भाव, प्रकृति और साधना के संगम का भी प्रतीक है। इस दौरान केंद्र उप निदेशक (कार्यक्रम) पवन अमरावत, सहायक निदेशक (वित्त एवं लेखा) दुर्गेश चांदवानी, अधीक्षण अभियंता सी. एल. सालवी, कार्यक्रम अधिशासी हेमंत मेहता, सिद्धांत भटनागर सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।
इसी कड़ी में रविवार 9 अगस्त को मल्हार की दूसरी संध्या में 7 बजे विनायक चित्तर का सितार वादन और पल्लवी कृष्णन द्वारा मोहिनीअट्टम की प्रस्तुति इस सांगीतिक यात्रा को नया आयाम देगी। सभी संगीत रसिकों के लिए प्रवेश निःशुल्क है।
