कोटा मेडिकल कॉलेज में प्रसूताओं की मौत: क्या ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन जिम्मेदार? विशेषज्ञों ने बताई सच्चाई

 | 

Udaipur Times, Kota maternal deaths: 27 मई 2026। कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रसूताओं की मृत्यु के प्रकरण में दवाओं की जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद कुछ मीडिया माध्यमों में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को सीधे तौर पर मौत का कारण बताया जा रहा है जबकि चिकित्सकीय तथ्यों एवं विशेषज्ञों की राय के अनुसार ऐसा निष्कर्ष प्रमाणित नहीं है।

न्यू मेडिकल कॉलेज, कोटा के प्रधानाचार्य डॉ. नीलेश जैन ने बताया कि औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा इस प्रकरण में उपयोग में ली गई विभिन्न दवाओं एवं चिकित्सा उपकरणों के कुल 37 सैंपल जांच हेतु लिए गए थे। इनमें से 28 सैंपल राज्य औषधि परीक्षण प्रयोगशाला, जयपुर तथा अन्य सैंपल राष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाओं को भेजे गए। अब तक प्राप्त रिपोर्ट्स में लगभग सभी दवाएं मानक गुणवत्ता की पाई गई हैं। केवल ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन (ब्रांड नाम TOCIN, बैच नंबर I-7881) के एक सैंपल में निर्धारित घटक नहीं पाया गया, जिसके आधार पर उक्त बैच को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी प्युरियस” घोषित किया गया है। Kota hospital maternal deaths

राज्य सरकार एवं औषधि नियंत्रण विभाग ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की है। संबंधित बैच के समस्त उपलब्ध स्टॉक की बिक्री एवं उपयोग पर तत्काल रोक लगा दी गई है तथा निर्माता, सप्लायर एवं वितरण श्रृंखला की विस्तृत जांच प्रारंभ कर दी गई है। संबंधित प्रकरण में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

डॉ. जैन ने बताया कि उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड्स एवं विशेषज्ञों की समीक्षा में यह स्पष्ट है कि मृत प्रसूताओं में प्रमुख रूप से सेप्सिस (गंभीर संक्रमण) तथा मल्टी ऑर्गन डिसफंक्शन सिंड्रोम (MODS) जैसी जटिलताएं पाई गईं। रेकार्ड्स में ऐसा कोई स्पष्ट चिकित्सकीय प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह स्थापित हो कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के प्रभावहीन होने के कारण अनियंत्रित रक्तस्राव हुआ हो अथवा वही मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण बना हो। मेडिकल कॉलेज के फार्माकलॉजी के विभागाध्यक्ष का भी यह कहना है कि किसी दवा में कोई कंटेट शून्य होने पर वह दवा कार्य करने में तो असमर्थ हो सकती है, लेकिन इससे रीनल फेल्योर हो जाए, यह चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से संभव प्रतीत नहीं होता।  Oxytocin injection investigation

विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रसवोत्तर रक्तस्राव की स्थिति में ऑक्सीटोसिन के अतिरिक्त कई अन्य प्रभावी एवं स्थापित उपचार उपलब्ध रहते हैं, जिनमें मिसोप्रोस्टोल, कार्बोप्रोस्ट, मेथाइल एर्गोमेट्रिन, ट्रानेक्सेमिक एसिड, यूटेराइन टैम्पोनैड एवं आवश्यक सर्जिकल इंटरवेंशन शामिल हैं। उपलब्ध अभिलेखों में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि ऑक्सीटोसिन के प्रभावहीन रहने के कारण इन वैकल्पिक उपचारों की आवश्यकता विशेष रूप से उत्पन्न हुई हो।

प्रधानाचार्य ने अधीक्षक नवीन चिकित्सालय, जे.के.लोन चिकित्सालय व विभागाध्यक्ष फार्माक्लोजी के माध्यम से बताया कि संबंधित ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन सामान्य प्रसव के दौरान गर्भाशय संकुचन के लिए भी उपयोग में लिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी में इसका उपयोग मृत्यु के प्रत्यक्ष कारण के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व सभी चिकित्सकीय, प्रयोगशाला एवं प्रशासनिक जांचों का पूर्ण होना आवश्यक है। वर्तमान उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को प्रसूताओं की मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।

राज्य सरकार इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, वैज्ञानिक एवं पारदर्शी जांच के लिए प्रतिबद्ध है तथा दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति, संस्था अथवा कम्पनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

Follow UdaipurTimes on Facebook , Instagram , and Google News