51वाँ दादा-दादी, नाना-नानी सम्मान समर्पण समारोह सम्पन्न
आलोक सीनियर सैकण्डरी स्कूल, हिरण मगरी, सेक्टर-11 में सामाजिक संगठन योजना के अन्तर्गत ‘दादा-दादी, नाना-नानी सम्मान समर्पण समारोह’ का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसके अन्तर्गत विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के दादा-दादी, नाना-नानी का सम्मान प्रशस्ति पत्र, श्रीफल, फ्रेम, शाल तथा माल्यार्पण के साथ किया गया। लगातार तीसरे वर्ष आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का 51वां समारोह यहाँ भव्य समारोह के रूप में आयेाजित किया गया।
आलोक सीनियर सैकण्डरी स्कूल, हिरण मगरी, सेक्टर-11 में सामाजिक संगठन योजना के अन्तर्गत ‘दादा-दादी, नाना-नानी सम्मान समर्पण समारोह’ का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसके अन्तर्गत विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के दादा-दादी, नाना-नानी का सम्मान प्रशस्ति पत्र, श्रीफल, फ्रेम, शाल तथा माल्यार्पण के साथ किया गया। लगातार तीसरे वर्ष आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम का 51वां समारोह यहाँ भव्य समारोह के रूप में आयेाजित किया गया।
इस अवसर पर चयनित 201 परिजनों में दादा-दादी, नाना-नानी का भव्य समारोह के माध्यम से अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर डॉ. प्रदीप कुमावत की फिल्म ‘अनुभव की पाठशाला’ का प्रथम प्रदर्शन भी किया गया जिसमें बुजुर्गों को सम्मान देने का संदेष मर्मस्पर्शी ढंग से दिया गया है।
इस अवसर पर संस्थान के निदेषक डॉ. प्रदीप कुमावत ने कहा कि आज के दिन समाज के आधार स्तम्भों का सम्मान किया जा रहा है। जिनका समाज के कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। समाज अध्यात्मक से अलग होती जा रही युवा पीढ़ी को इस सम्मान समारोह के माध्यम से समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि जो हमारे आधार स्तम्भ हैं वह केवल हमारे ही नहीं वरन् सारे परिवार के लिये महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। अतः हमारी दृश्टि में ये महानतम व्यक्तित्व हैं।
डॉ. कुमावत ने कहा बुजुर्गों का सम्मान करने के पीछे का भाव मात्र यही है कि बच्चों के मन में संस्कारों का बीजारोपण हो। ये अनुभव की सबसे बड़ी पाठशाला हैं तथा इनके चरणों में बैठकर प्राप्त की जाने वाली शिक्षा को उपनिशद् समझा जाना चाहिये। इनके लिये मन व हृदय से आदरांजलि प्रेशित की जानी चाहिय। आज की युवा पीढ़ी मात्र अपने बारे में ही सोचती है। उन्हें इस बात का आभास करवाने की आवश्यकता है कि पीढि़यों से चली आ रही परम्परा का निर्वाह करने में कोई शर्म की बात नहीं वरन् गौरव की अनुभूति है। अतः संस्कारों को जीवन में उतारें तथा बड़े व बुजुर्गों का सम्मान करना सीखें।
