पति की मौत के बाद गांव वालों ने कहा डायन, फिर भी नहीं मानी हार RAS क्लियर कर बनीं अफसर
Udaipur Times, RAS Rohini Gurjar : राजस्थान के अजमेर की रहने वाली रोहिणी गुर्जर की कहानी मुश्किल हालात में भी हिम्मत बनाए रखने का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। पति की मौत के बाद, उन्हें न केवल अकेले दो बेटियों की परवरिश की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी, बल्कि सामाजिक ताने-बाने और बदनामी का भी सामना करना पड़ा। कुछ ग्रामीणों ने तो उनके पति की मौत के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया और 'डायन' कहकर उनका अपमान भी किया।
ऐसे समय में जब कोई भी टूट सकता था, रोहिणी ने अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से शुरू करने का फ़ैसला किया। उन्होंने राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की RAS भर्ती-2024 परीक्षा में MBC विधवा श्रेणी में पूरे राजस्थान में दूसरी रैंक हासिल की। अफ़सर बनने का उनका सपना सितंबर 2026 में सच हुआ।
गांव की पहली लड़की जिसने BA किया
रोहिणी ने 2006 में अपनी BA की पढ़ाई पूरी की। वह अजमेर के घुघरा गाँव की पहली लड़की थीं जिन्होंने ग्रेजुएशन लेवल तक की पढ़ाई की। उनके पिता सेना में थे, इसलिए बचपन में परिवार अलग-अलग जगहों पर रहा, जिससे रोहिणी को पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल मिला। उस समय, उनके गाँव और समाज में लड़कियों की शिक्षा को लेकर वैसी सोच नहीं थी जैसी आज है। इसके बावजूद, रोहिणी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और BA की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद, उन्होंने पढ़ाई रोक दी और एक प्राइवेट स्कूल में टीचर के तौर पर काम करने लगीं।
शादी के बाद पारिवारिक जीवन में रम गईं
रोहिणी की शादी 2011 में, लगभग 22 साल की उम्र में, पास के गाँव नरेली के एक व्यक्ति से हुई। उनकी पहली बेटी का जन्म 2013 में हुआ। शादी के बाद, उनका ज़्यादातर समय घर और परिवार को संभालने में ही बीतता था। उनके ससुराल का माहौल काफ़ी पारंपरिक था। ऐसे माहौल में आगे की पढ़ाई करना या कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम की तैयारी करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। धीरे-धीरे, रोहिणी की पढ़ाई पूरी तरह छूट गई क्योंकि वह परिवार की ज़िम्मेदारियों में पूरी तरह उलझ गई थीं। हालाँकि, 2021 में हुई एक दुखद घटना ने सब कुछ बदल दिया।
पति की मौत से बुरी तरह टूट गईं
दिसंबर 2020 के आस-पास, उनके पति को हार्ट अटैक आया। करीब एक-दो महीने तक इलाज चला, लेकिन 18 फरवरी 2021 को उनका निधन हो गया। पति की मौत के बाद रोहिणी के सामने दो बड़ी ज़िम्मेदारियाँ थीं: खुद को संभालना और अपनी दो बेटियों की परवरिश करना। उनका कहना है कि पति के गुजरने के बाद उन्हें ससुराल वालों से वैसी मदद नहीं मिली जैसी उम्मीद थी।
बेटा न होने की वजह से उन्हें ताने भी सुनने पड़े। सबसे दुखद बात तब हुई जब कुछ लोगों ने पति की मौत के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। गाँव में उन्हें 'डायन' तक कहा गया और उन पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने अपने पति को 'खा लिया' है। इन बातों ने रोहिणी को अंदर से तोड़ दिया; लगभग छह महीने तक वह बहुत मुश्किल मानसिक दौर से गुजरीं।
दादी-सास ने कहा: "बेटा, तुम पढ़ाई करो"
इस मुश्किल समय में रोहिणी के भाई नरेंद्र गुर्जर और उनकी दादी-सास पुष्पा देवी उनके साथ खड़ी रहीं। उस समय उनकी दादी-सास की उम्र लगभग 95 साल थी। हालाँकि वह खुद ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने रोहिणी की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी: "बेटा, तुम पढ़ाई करो।" पति की मौत के करीब छह महीने बाद नवंबर-दिसंबर 2021 में रोहिणी ने लगभग 15 साल के गैप के बाद अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की।
उन्हें कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी। ग्रामीण बैकग्राउंड से होने के कारण, उन्हें यह भी नहीं पता था कि तैयारी कैसे शुरू की जाए। फिर भी, उन्होंने शुरुआत की और धीरे-धीरे परीक्षा की तैयारी में पूरी तरह जुट गईं।
पहली कोशिश में 10 नंबर से रह गईं पीछे
रोहिणी ने 2021 में पहली बार परीक्षा दी। उन्होंने शुरुआती चरण (प्रीलिम्स) तो पास कर लिया, लेकिन मुख्य परीक्षा (मेन्स) में लगभग 10 नंबर से पीछे रह गईं। यह असफलता निश्चित रूप से निराशाजनक थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने 2023 में फिर से परीक्षा दी और तैयारी के लिए जयपुर चली गईं, जहाँ उन्होंने अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाया। हालाँकि, इसी दौरान उनके जीवन में एक और बड़ा दुखद हादसा हुआ।
दादी-सास का निधन
जनवरी 2024 में रोहिणी की दादी-सास, पुष्पा देवी का निधन हो गया। वे रोहिणी के लिए परिवार की सिर्फ़ एक बुजुर्ग सदस्य ही नहीं थीं, बल्कि हिम्मत का एक बड़ा स्रोत थीं—एक ऐसा सहारा जो तब काम आया जब रोहिणी समाज के ताने और अकेलेपन के बीच खुद को संभालने की कोशिश कर रही थीं। उनके निधन से रोहिणी को गहरा सदमा लगा। इसके बावजूद, उन्होंने परीक्षा की तैयारी जारी रखने का फैसला किया। उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि एक और भी बड़ा दुखद हादसा उनका इंतज़ार कर रहा है।
10 साल की बेटी की मौत से टूट गईं
26 जून को रोहिणी अपनी बेटियों के साथ रहने के लिए अजमेर पहुंचीं। 28 जून को उनकी सबसे बड़ी बेटी जो 10 साल की थी वो अचानक बीमार पड़ गई। बच्ची को उल्टियाँ होने लगीं और रोहिणी उसे तुरंत अस्पताल ले गईं। 29 जून को उनकी बेटी ने उनकी गोद में ही दम तोड़ दिया। यह घटना रोहिणी के जीवन का सबसे दर्दनाक दौर था।
वह पहले से ही अपने पति को खोने का गम मना रही थीं, और अब उन्होंने अपनी छोटी बेटी को भी खो दिया था। सबसे मुश्किल बात यह थी कि कुछ ही दिनों बाद उन्हें RAS की मुख्य परीक्षा में शामिल होना था। बेटी की मौत के बाद उन्होंने परीक्षा न देने का मन बना लिया था; किताब खोलने का ख्याल तक उन्हें नामुमकिन लग रहा था।
दुखद हादसे के बावजूद परीक्षा में शामिल हुईं
बेटी की मौत के बाद, गांव में लगभग 12 दिनों तक रस्में निभाई गईं। इसके बाद, रोहिणी के भाई उन्हें उनके मायके ले गए। इस दौरान, उनकी अपनी सेहत भी बिगड़ने लगी। अस्पताल से लौटते समय रोहिणी और उनकी भाभी एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं; सामने से आ रही एक गाड़ी उनकी कार से टकरा गई।
उनके चेहरे और आंखों में चोटें आईं, जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और लगभग 5 दिनों तक इलाज करवाना पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें कुछ दिनों तक आंखें न खोलने की सलाह दी। ऐसे हालात में परीक्षा देना लगभग नामुमकिन लग रहा था। हालांकि, उनके परिवार ने उनका हौसला बढ़ाया। फिर रोहिणी ने अपनी छोटी बेटी, भूमि खटाना, का चेहरा देखा और परीक्षा देने का फ़ैसला किया।
छोटी बेटी बनी हिम्मत का सहारा
रोहिणी को एहसास हुआ कि अगर वह अपनी छोटी बेटी का भविष्य बेहतर बनाना चाहती हैं, तो उन्हें खुद आगे बढ़ना होगा। उन्होंने हिम्मत जुटाई और परीक्षा देने गईं। एक बेटी को खोने के कुछ ही हफ़्तों बाद परीक्षा देना उनके लिए सिर्फ़ एक कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम नहीं था; यह एक तरह से ज़िंदगी के लिए दोबारा लड़ने जैसा था।
उन्होंने मन ही मन ठान लिया, "मुझे कुछ हासिल करना ही होगा; तभी उसका भविष्य बेहतर हो पाएगा।" उनकी मेहनत रंग लाई और जब नतीजे घोषित हुए, तो रोहिणी RAS अधिकारी के तौर पर चुनी गईं।
अब बेटियों और लड़कियों के लिए काम करना चाहती हैं
आज रोहिणी और उनकी छोटी बेटी, भूमि खटाना, ही उनका परिवार हैं। इस पूरे सफ़र में उनके भाई, नरेंद्र गुर्जर, हमेशा उनके साथ खड़े रहे। साथ ही, उनकी दादी-सास पुष्पा देवी की कही बातें उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं। रोहिणी अब चाहती हैं कि समाज में लड़कियों को शिक्षा और आगे बढ़ने के ज़्यादा मौके मिलें। उनका उद्देश्य पुरानी और दकियानूसी सोच को बदलने की दिशा में काम करना है।
उनकी कहानी सिर्फ किसी परीक्षा में सफलता की कहानी नहीं है; यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने अपने पति को खोया, समाज की बातें सुनीं, एक बेटी को खोया और एक दुर्घटना का सामना किया, फिर भी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। रोहिणी गुर्जर की सफलता यह संदेश देती है कि ज़िंदगी चाहे कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, अगर कोई अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ता, तो वही संघर्ष एक दिन उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।