क्षुधा एक रोग हैं एवं भोजन उसकी औषधि : मुनि प्रसन्न सागर जी

सर्वऋतु विलास स्थित सभा मण्डप में रविवारीय धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना मुनिश्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने कहा कि आज समाज में, देश में, भोजन का रूप बिगड़ गया है। आज की आपा-धापी और व्यस्त जीवन, भोजन पद्धति को प्रभावित कर रहा है। आज व्यकित अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो गया है और सिर्फ स्वाद की लोलूपता के कारण स्वास्थ्यकारी खाध पदार्थों को छोड़कर शरीर के लिये नुकसान देह चीजों को खा रहा है। पशिचम सभ्यता का अंधानुकरण हो रहा है और पिज्जा, बरगर, चार्इनीज आदि का उपयोग करने लगा है। ये चीजे किसी भी दृषिट से शरीर के लिए लाभकारी नहीं है। धार्मिक दृषिट से ये वस्तुएं अक्षम्य है।

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क्षुधा एक रोग हैं एवं भोजन उसकी औषधि : मुनि प्रसन्न सागर जी

सर्वऋतु विलास स्थित सभा मण्डप में रविवारीय धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना मुनिश्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने कहा कि आज समाज में, देश में, भोजन का रूप बिगड़ गया है। आज की आपा-धापी और व्यस्त जीवन, भोजन पद्धति को प्रभावित कर रहा है। आज व्यकित अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो गया है और सिर्फ स्वाद की लोलूपता के कारण स्वास्थ्यकारी खाध पदार्थों को छोड़कर शरीर के लिये नुकसान देह चीजों को खा रहा है। पशिचम सभ्यता का अंधानुकरण हो रहा है और पिज्जा, बरगर, चार्इनीज आदि का उपयोग करने लगा है। ये चीजे किसी भी दृषिट से शरीर के लिए लाभकारी नहीं है। धार्मिक दृषिट से ये वस्तुएं अक्षम्य है।

मुनि श्री ने कहा कि सबने अपने पेट को कचरा पात्र बना डाला है और स्वाद एवं आधुनिकता के नाम पर सभी उपयोगी, अनुपयोगी वस्तुओं से इसे भर रहा है। परिणाम स्वरूप लोगों में पेट सम्बन्धी व्याधियां बढ़ रही है और वैसे भी अधिकांश बीमारियों का कारण पेट ही है।

क्षुधा एक रोग हैं एवं भोजन उसकी औषधि : मुनि प्रसन्न सागर जी

मुनि श्री ने कहा कि उपवास, व्रत आदि से पेट का संतुलन बना रहता है। यह सब वैज्ञानिक दृषिट से भी सिद्ध हो चुका है। भोजन का श्रेष्ठ अनुपात तो यह है कि आधा पेट भोजन से, चौथार्इ पानी से भरा जाये एवं शेष चौथार्इ हवा के लिए खाली रखा जाय भूख एक रोग है और भोजन उसकी औषधि। अत: भोजन को औषधी समझ कर ही ग्रहण करना चाहिये। भोजन उचित आसन पर बैठकर प्रसन्न चित होकर ग्रहण करना चाहिये। टीवी देखते हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिये। जिसका भोजन शुद्ध होता है उसका भजन शुद्ध होता है। जिसका खान पान शुद्ध होता है उसका खानदान शुद्ध होता है। जिसकी रोटी शुद्ध होती है उसकी बेटी शुद्ध होती है। पेट में भी जो भी डालो विवेक पूर्वक डालो पेट तुम्हारा है, पेट पंचायती नहीं है।

इससे पूर्व मुनि पीयूष सागर महाराज ने कहा कि भोजन बनाते समय क्षेत्र की विशुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिये। प्राचीनकाल में चौका की व्यवस्था थी। परिवारजन मिल बैठकर प्रशस्त मन से भोजन करते थे। खान पान के अनुसार ही व्यकित विचार बनते थे। शुद्ध शाकाहारी भोजन नहीं करना चाहिये। यही जीवन का वर्धन व संवर्धन करता है। शरीर को पुष्ट करता है।

नैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं वैज्ञानिक दृषिट से मांसाहार का सर्वथा त्याग करना चाहिये। मांसाहार प्राणियों की हिंसा से ही उपलब्ध होता है और प्राणियों की हिंसा आजकल आधुनिक बुचड़ खानों ने वृहद स्तर पर की जाती है। मांसाहार व्यकितयों में संवेदनहीनता भी पैदा कर रहा है। जैन धर्म में सूर्यास्त से पहले भोजन करने से होने वाले लाभ वैज्ञानिक दृष्टि से भी पुष्ट हो चुके हैं।

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