किस उम्र में अपना खुद का घर खरीदना रहता है एकदम परफेक्ट ! जाने प्रॉपर्टी खरीदने का सही समय ?

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किस उम्र में अपना खुद का घर खरीदना रहता है एकदम परफेक्ट ! जाने प्रॉपर्टी खरीदने का सही समय ?

Udaipur Times, Property Buying Tips : अपना घर खरीदना सिर्फ रहने की जगह चुनना नहीं है, बल्कि यह लंबे समय तक आपकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करने वाला बड़ा फैसला है। यही वजह है कि नौकरी शुरू होते ही या शादी के बाद तुरंत मकान खरीद लेना हमेशा समझदारी नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, बहुत ज्यादा इंतजार करने से भी प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमत और होम लोन की अवधि जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। 

असल सवाल यह नहीं है कि घर 30 साल की उम्र में खरीदना चाहिए या 40 में, बल्कि सही सवाल यह है कि किस उम्र में आपकी आय, बचत, करियर और भविष्य की जरूरतें घर खरीदने के लिए तैयार होती हैं। आइए समझते हैं कि अलग-अलग उम्र में घर खरीदने का फैसला कब सही हो सकता है।

20 से 30 साल: घर से ज्यादा वित्तीय नींव मजबूत करने का समय

करियर के शुरुआती वर्षों में आमतौर पर आय बढ़ने की गुंजाइश ज्यादा होती है, लेकिन बचत और नौकरी की स्थिरता उतनी मजबूत नहीं होती। इसी दौर में कई लोगों पर शिक्षा ऋण, परिवार की जिम्मेदारियां या करियर बदलने जैसी परिस्थितियां भी हो सकती हैं। इसलिए इस उम्र में घर खरीदने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना जरूरी है। इस उम्र में घर खरीदने का फायदा यह है कि लंबी अवधि का होम लोन लिया जा सकता है और EMI को ज्यादा वर्षों में बांटा जा सकता है। इससे हर महीने की किस्त का बोझ कुछ हद तक कम रखा जा सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। 

अगर शुरुआती करियर में बड़ी रकम घर की डाउन पेमेंट में चली गई, तो दूसरे निवेशों और भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों के लिए पैसा कम बच सकता है। इसलिए 20 से 30 साल की उम्र में घर खरीदने से पहले यह देखना जरूरी है कि डाउन पेमेंट देने के बाद आपके पास आपातकालीन बचत और दूसरे वित्तीय लक्ष्यों के लिए पर्याप्त पैसा बच रहा है या नहीं। केवल कम उम्र में होम लोन मिल जाना घर खरीदने के लिए पर्याप्त वजह नहीं होनी चाहिए।

30 से 40 साल: कई लोगों के लिए ज्यादा संतुलित पड़ाव

30 की उम्र के आसपास आमतौर पर करियर की दिशा स्पष्ट होने लगती है। आय में पहले की तुलना में स्थिरता आ सकती है और परिवार, बच्चों की शिक्षा तथा भविष्य की जरूरतों का अंदाजा भी बेहतर तरीके से लगाया जा सकता है। यही वह चरण है जब घर खरीदने का फैसला कई लोगों के लिए व्यावहारिक बन सकता है।हालांकि, केवल बढ़ी हुई आय देखकर महंगा घर खरीदना सही रणनीति नहीं है। मसलन, अगर किसी व्यक्ति की मासिक आय अच्छी है, लेकिन घर की EMI के बाद निवेश, बच्चों की पढ़ाई, बीमा और रोजमर्रा के खर्चों के लिए बहुत कम पैसा बचता है, तो महंगी प्रॉपर्टी खरीदना भविष्य में आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है। इसलिए इस उम्र में घर की कीमत से ज्यादा अपनी भुगतान क्षमता पर ध्यान देना चाहिए। घर खरीदने से पहले यह देखना जरूरी है कि EMI चुकाने के बाद भी बचत, निवेश और परिवार की दूसरी जरूरतों के लिए पर्याप्त रकम उपलब्ध रहे।

40 के बाद: देर नहीं, लेकिन गणित और सख्त होना चाहिए

40 साल या उसके बाद घर खरीदने का फैसला भी बिल्कुल संभव है। इस उम्र में कई लोगों की आय और बचत बेहतर स्थिति में होती है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि लंबे समय में किस शहर में रहना है और परिवार के लिए किस तरह की संपत्ति चाहिए। ऐसे में जरूरत के हिसाब से प्रॉपर्टी चुनना कुछ लोगों के लिए आसान हो सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। उम्र बढ़ने के साथ होम लोन की अवधि कम हो सकती है। कम अवधि का मतलब अक्सर ज्यादा मासिक EMI होता है। 

इसलिए 40 के बाद घर खरीदने वाले व्यक्ति को रिटायरमेंट के लिए अलग से पर्याप्त रकम बचाने के साथ-साथ कर्ज का बोझ भी नियंत्रित रखना चाहिए। इस उम्र में बड़ा घर खरीदने की बजाय ऐसी प्रॉपर्टी चुनना ज्यादा उपयोगी हो सकता है जिसकी लागत आपकी दीर्घकालिक वित्तीय योजना को नुकसान न पहुंचाए। घर की EMI इतनी ज्यादा नहीं होनी चाहिए कि रिटायरमेंट के लिए किए जा रहे निवेश पर असर पड़े।

किराया दे रहे हैं तो क्या घर खरीदना जरूरी है?

यह मान लेना सही नहीं है कि किराए पर रहना हमेशा पैसे की बर्बादी है। अगर नौकरी बदलने, शहर बदलने या करियर को लेकर अनिश्चितता है, तो किराए का घर आपको ज्यादा लचीलापन दे सकता है। ऐसे समय में बड़ी रकम डाउन पेमेंट में लगाने की बजाय अपनी बचत और निवेश को बनाए रखना कई लोगों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। इसके अलावा, घर खरीदने में केवल डाउन पेमेंट और EMI ही खर्च नहीं होते। रजिस्ट्री, टैक्स, रखरखाव, मरम्मत और अन्य शुल्क भी कुल लागत में जुड़ते हैं। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इन सभी खर्चों को अपने बजट में शामिल करना जरूरी है।

दूसरी तरफ, अगर आप किसी शहर में लंबे समय तक रहने वाले हैं और आपकी आय तथा बचत ऐसी है कि घर की EMI आराम से संभाली जा सकती है, तो खुद का घर स्थिरता दे सकता है। इसलिए किराया बनाम EMI का फैसला केवल मासिक भुगतान की तुलना करके नहीं करना चाहिए। इसमें प्रॉपर्टी की कीमत, रखरखाव, लोन की लागत और भविष्य की योजनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

पहले तय करें-आप घर खरीद रहे हैं या निवेश?

अगर घर खुद रहने के लिए खरीदा जा रहा है, तो लोकेशन, आवागमन, स्कूल, अस्पताल और परिवार की जरूरतें प्रमुख होनी चाहिए। ऐसे में केवल इस उम्मीद में प्रॉपर्टी खरीदना सही नहीं होगा कि आने वाले वर्षों में उसकी कीमत बढ़ जाएगी। वहीं अगर उद्देश्य केवल निवेश है, तो किराया आय, संभावित मूल्य वृद्धि, रखरखाव और संपत्ति को बेचने में लगने वाले समय जैसे पहलुओं की भी जांच करनी होगी। रियल एस्टेट की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे जरूरत पड़ने पर तुरंत नकद में बदलना आसान नहीं होता। इसलिए अपनी पूरी बचत एक ही प्रॉपर्टी में लगाना जोखिम बढ़ा सकता है। घर खरीदने के बाद भी आपके पास आपात स्थिति और दूसरे वित्तीय लक्ष्यों के लिए पर्याप्त पैसा बचा रहना चाहिए।

होम लोन लेने से पहले यह हिसाब जरूर करें

घर खरीदने का फैसला लेने से पहले अपनी मासिक आय और खर्चों का वास्तविक हिसाब बनाएं। इसके बाद देखें कि डाउन पेमेंट देने के बाद आपके पास कितनी बचत बचेगी और होम लोन की EMI आपके मासिक बजट पर कितना असर डालेगी। एक सुरक्षित वित्तीय योजना में इन चीजों के लिए अलग रकम रखना जरूरी है:

कम से कम कुछ महीनों के खर्च की आपातकालीन बचत

स्वास्थ्य और जीवन बीमा

बच्चों की शिक्षा जैसे बड़े भविष्य के खर्च

सेवानिवृत्ति के लिए नियमित निवेश

घर के रखरखाव और अन्य अप्रत्याशित खर्च

प्रॉपर्टी खरीदने से जुड़े अतिरिक्त शुल्क और खर्च

EMI ऐसी नहीं होनी चाहिए कि हर महीने की आय का बड़ा हिस्सा केवल कर्ज चुकाने में चला जाए। विशेषज्ञों की सामान्य सलाह यही रहती है कि आवास ऋण की मासिक किस्त आपकी हाथ में आने वाली आय पर अत्यधिक दबाव न डाले। अगर EMI चुकाने के बाद बचत और जरूरी खर्चों के लिए पर्याप्त रकम नहीं बच रही है, तो कम कीमत की प्रॉपर्टी या कुछ समय बाद घर खरीदने का विकल्प बेहतर हो सकता है।

डाउन पेमेंट के लिए पूरी बचत खर्च करना सही नहीं

घर खरीदने के लिए कई लोग अपनी लगभग पूरी जमा पूंजी डाउन पेमेंट में लगा देते हैं। इससे होम लोन की रकम कम हो सकती है, लेकिन खरीदारी के बाद नकदी की कमी की स्थिति बन सकती है। अचानक मेडिकल खर्च, नौकरी से जुड़ी समस्या या किसी अन्य आपात स्थिति में पैसों की जरूरत पड़ सकती है।इसलिए डाउन पेमेंट के साथ-साथ आपातकालीन फंड को भी अलग रखना जरूरी है। घर खरीदने के बाद फर्नीचर, शिफ्टिंग, मरम्मत और दूसरी जरूरतों पर भी खर्च हो सकता है। इन खर्चों को नजरअंदाज करने से घर खरीदने के बाद बजट बिगड़ सकता है।

तो आखिर किस उम्र में खरीदें अपना पहला घर?

इसका कोई एक जवाब नहीं है। किसी के लिए 28 साल की उम्र सही हो सकती है, तो किसी के लिए 38, 40 या 42 साल की उम्र। घर खरीदने का सही समय उम्र से ज्यादा आपकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करता है। सही समय वह है जब आपकी आय स्थिर हो, डाउन पेमेंट के बाद भी पर्याप्त बचत बची रहे, करियर और शहर को लेकर तस्वीर काफी स्पष्ट हो और EMI आपकी बाकी वित्तीय योजनाओं को न बिगाड़े। अगर इन चीजों का संतुलन नहीं बन रहा है तो केवल इसलिए घर खरीदना जरूरी नहीं है कि आपकी उम्र किसी तय पड़ाव पर पहुंच गई है।

निष्कर्ष: उम्र नहीं, वित्तीय तैयारी तय करती है सही समय

कुल मिलाकर, अपना पहला घर खरीदने के लिए 30 या 40 साल की कोई तय उम्र नहीं है। 20 से 30 की उम्र में लंबी लोन अवधि का फायदा मिल सकता है, लेकिन इस दौरान बचत और करियर की स्थिरता पर ध्यान देना जरूरी है। 30 से 40 की उम्र में आय और पारिवारिक जरूरतें ज्यादा स्पष्ट होने के कारण घर खरीदना कई लोगों के लिए संतुलित फैसला हो सकता है। वहीं 40 के बाद बेहतर बचत के बावजूद लोन की अवधि और रिटायरमेंट की योजना को ज्यादा गंभीरता से देखना पड़ता है।

इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले खुद से यह सवाल पूछें कि क्या आप डाउन पेमेंट, EMI, रखरखाव और दूसरे खर्चों को लंबे समय तक आसानी से संभाल सकते हैं। घर खरीदने का ‘राइट टाइम’ आपकी उम्र से ज्यादा आपकी आय, बचत, करियर की स्थिरता और भविष्य की वित्तीय जरूरतें तय करती हैं।

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