यकीन मानिए ‘मोती की भी हो सकती है खेती‘
‘पैसों का पेड़ लगाना‘ और ‘मोती की खेती‘ करना अब तक जुमलों और कहानी-किस्सों का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन किस्सों को हकीकत में बदलते हुए ‘मोती की खेती‘ कर प्रदेश के सैंकड़ों किसान अपनी किस्मत को चमकाने में लगे हुए हैं। ऐसे ही सफल किसान नरेन्द्र गिर्वा प्रदेश के अन्य किसानों को भी प्रशिक्षण और सलाह देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की बेहतरीन कोशिश कर रहे हैं।
‘पैसों का पेड़ लगाना‘ और ‘मोती की खेती‘ करना अब तक जुमलों और कहानी-किस्सों का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन किस्सों को हकीकत में बदलते हुए ‘मोती की खेती‘ कर प्रदेश के सैंकड़ों किसान अपनी किस्मत को चमकाने में लगे हुए हैं। ऐसे ही सफल किसान नरेन्द्र गिर्वा प्रदेश के अन्य किसानों को भी प्रशिक्षण और सलाह देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की बेहतरीन कोशिश कर रहे हैं।
किशनगढ़-रेनवाल के मोतीपालक किसान नरेन्द्र गिर्वा को जब कुछ साल पहले मोती की खेती के कॉन्सेप्ट का पता लगा तो उन्होंने थोड़े संकोच के साथ इसकी शुरूआत कर दी। लेकिन कुछ ही महीनों में वे सफल होते नजर आए। वे कहते हैं कि कोई भी किसान केवल 15 से 50 हजार रुपए का निवेश कर सालाना 2 से 3 लाख रुपए आसानी से कमा सकता है। किसान 5 से 10 रुपए में समुद्री क्षेत्रों से सीपी खरीद कर उन्हें साल भर या 18 महीने रखकर एक सीपी से 2 मोती कमा सकता है। बाजार में एक मोती 200 से 2000 रुपए तक आसानी से बिक जाता है। पिछले कई सालों से नरेन्द्र मोती की खेती कर हर साल लाखों रुपए कमा रहे हैं। वे किशनगढ़ में बेहद कम खर्चे पर किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। दो दिन के प्रशिक्षण में एक दिन प्रैक्टिकल और एक दिन थ्योरी सिखाते हैं।
ऐसे बनता है बीज से मोती
नगेन्द्र बताते हैं कि समंदर में मिलने वाली एक सीपी 5 से 10 रुपए में आसानी से मिल जाती है। सबसे पहले हम लाई गई सीपियों में बीज डालने का काम करते हैं। जैसा बीज होता है वैसे ही मोती का निर्माण सीपी के पेट में होता है। कृषक एक सीपी में दो बीज डाल सकता है। 12 से 18 महीनों तक बीज सीपियों के पेट में पड़ा रहता है और पेट में ही मोती का आकार लेने लगता है। इस दौरान अर्धगोलाकार और गोलाकार मोती बनने लगता है। बाजार में असली मोती की अच्छी डिमांड है।
