परेशानी को मानो प्रभु का प्रसाद: आचार्य शान्ति सागरजी
मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि वह स्वयं की गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता, लेकिन दूसरों के दोषों की विवेचना जरूर करता है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह बड़ा इंसान बने लेकिन आम इंसान कोई बनना नहीं चाहता। खुद को महान और बड़ा बनाने के चक्कर में वह आम इंसान भी नहीं बन पाता।
मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि वह स्वयं की गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता, लेकिन दूसरों के दोषों की विवेचना जरूर करता है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह बड़ा इंसान बने लेकिन आम इंसान कोई बनना नहीं चाहता। खुद को महान और बड़ा बनाने के चक्कर में वह आम इंसान भी नहीं बन पाता।
उक्त विचार आचार्य शान्तिसागरजी महाराज ने हुमड़ भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किये।
आचार्यश्री ने कहा कि जब तुम संकट में हो तो संकट को संकट मत मानो, जब दुख में हो तो उसे सुख का द्वार मानो, परेशानी को भगवान का प्रसाद मानो, मन मत बिगाड़ो, अगर मन बिगड़ गया तो सब बिगड़ गया, मन सुन्दर हो तो आंखों से सम्पूर्ण सृष्टि सुन्दर दिखेगी। दुर्जन को सज्जन नहीं नजर आते और सज्जन को दुर्जन कभी नहीं दिखते। आंखों में अगर प्रेम बरसता है तो सर्वत्र प्रेम ही नजर आता है। हर व्यक्ति अपनी आंखों पर अपने-अपने भावों का चश्मा लगाकर देखते हैं, जैसा भाव होगा वैसा ही स्वयं को दिखेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि दो चीजों से हर वस्तु छोटी नजर आती है। एक तो दूर से और एक घरूर (घमण्ड) से। लक्ष्मी आती है तो मनुष्य चलता जमीन पर ही है, लेकिन उड़ता आसामान में है। लेकिन जब लक्ष्मी जाती है तो वह न जमीन का रहता है और ना ही आसमान का। आत्मा रूपी तुम्बी पर मिट्टी रूपी कर्मों का लेप है, जिस दिन कर्मों की मिट्टी हट जाएगी, उस दिन आत्मा भी स्वतंत्र हो जाएगी। जिस प्रकार सूर्य की किरण के साथ ही रात का काला स्याह अन्धेरा छिन्न- भिन्न हो जाता है। उसी प्रकार प्रभु की भक्ति करने से जन्म-जन्मान्तर के पाप भी छिन्न- भिन्न हो जाते हैं। अन्धकार कितना भी घना हो, कितना भी बड़ा हो, कितना भी पुराना हो, सिर्फ एक छोटे से दीपक से ही वह दूर हो जाता है।
कार्यवाहक अध्यक्ष सेठ शान्तिलाल नागदा ने बताया कि शुक्रवार की धर्मसभा के पुण्यार्जक श्यामसुन्दर अरकावत परिवार थे। सायंकालीन आयोजित हुए धार्मिक कार्यक्रमों में भक्ति संध्या, गुरू पूजा आदि सम्पन्न हुए।