सुपर अल नीनो को लेकर बड़ी अपडेट ! जाने भारत में इस बार सूखा रहेगा या होगी जबरदस्त बारिश ?
Udaipur Times, Super El Nino : दुनियाभर में इस समय "सुपर अल नीनो" चर्चा का विषय बना हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों से लेकर मीडिया तक, हर जगह इस शब्द का उल्लेख हो रहा है। लेकिन क्या वास्तव में सुपर अल नीनो भारत के मानसून को प्रभावित कर सकता है? क्या इस वर्ष मानसून कमजोर पड़ सकता है? और क्या देश में सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा है? आइए समझते हैं कि सुपर अल नीनो क्या है और भारत के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं।
सुपर अल नीनो क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि "सुपर अल नीनो" कोई आधिकारिक वैज्ञानिक शब्द नहीं है। मौसम विज्ञान के साहित्य में इसका औपचारिक उपयोग नहीं होता। वैज्ञानिक इसे "Very Strong El Niño" की श्रेणी में रखते हैं। अल नीनो तब बनता है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाता है और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है। इसी प्रकार जब तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक नीचे चला जाता है, तब ला नीना की स्थिति बनती है। Super El Niño
सामान्य से अधिक तापमान के आधार पर अल नीनो को चार श्रेणियों कमजोर (Weak), मध्यम (Moderate), मजबूत (Strong) और बहुत मजबूत (Very Strong) में बांटा जाता है, । आम बोलचाल में बहुत मजबूत अल-नीनो (Very Strong El Niño) को ही "सुपर अल-नीनो (Super El Niño)" कहा जाता है। Super El Niño
अल नीनो का क्या संबंध है?
अल नीनो का केंद्र भले ही प्रशांत महासागर हो, लेकिन इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों में दिखाई देता है। भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून भी इससे प्रभावित होता है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि लगभग 75 से 80 प्रतिशत अल नीनो वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं लगभग 60 प्रतिशत मामलों में सूखे जैसी परिस्थितियां भी बनी हैं। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक अल नीनो की हर गतिविधि पर करीब से नजर रखते हैं। Super El Niño
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर अल नीनो वर्ष में सूखा ही पड़ेगा। कई बार मजबूत अल नीनो के बावजूद सामान्य मानसून भी दर्ज किया गया है। फिर भी मानसून पर इसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कितनी संभावना है?
दुनिया की प्रमुख मौसम एजेंसियां जैसे अमेरिका की राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA), क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC), इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (IRI), ऑस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञान ब्यूरो (Australian Bureau of Meteorology), जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (Japan Meteorological Agency) और ब्रिटेन का मौसम कार्यालय (UK Met Office) लगातार प्रशांत महासागर के तापमान की निगरानी कर रही हैं। Super El Niño
वर्तमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि आने वाले महीनों में अल नीनो तेजी से विकसित हो सकता है। जून से जुलाई के बीच इसके आधिकारिक रूप से अल नीनो श्रेणी में प्रवेश करने की संभावना है। सबसे जरूरी बात यह है कि कई अंतरराष्ट्रीय मॉडल मानसून सीजन के दौरान अल नीनो बने रहने की 95 प्रतिशत या उससे अधिक संभावना दिखा रहे हैं। यह आंकड़ा असाधारण रूप से ऊंचा माना जा रहा है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि इसकी तीव्रता कितनी होगी और इसका चरम (Peak) कब आएगा। यही सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है।
भारत का रिकॉर्ड
अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच लंबे समय से संबंध देखा गया है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ा, लेकिन कई बार मानसून सामान्य से कमजोर रहा है। 1982-83 का अल नीनो अब तक के सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में गिना जाता है। उस दौरान समुद्री सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2.5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया था। 1987, 2002, 2009 और 2015 जैसे वर्षों में भी अल नीनो के साथ मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला। Super El Niño
फिर भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि अल नीनो और मानसून का संबंध पूर्ण रूप से रैखिक नहीं है। कुछ वर्षों में मजबूत अल नीनो के बावजूद मानसून बेहतर रहा है। इसलिए केवल अल नीनो के आधार पर पूरे मानसून का आंकलन करना उचित नहीं होगा।
रिकॉर्ड टूट सकता है?
कुछ वैश्विक मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस बार बढ़ता समुद्री तापमान 1982-83 के रिकॉर्ड को चुनौती दे सकत है। यही कारण है कि सुपर अल नीनो को लेकर चर्चा बढ़ रही है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इस बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। मौजूदा समय में केवल संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। आने वाले महीनों के आंकड़े यह तय करेंगे कि यह अल नीनो कितना मजबूत बनेगा और क्या वास्तव में यह रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच पाएगा। Super El Niño
मानसून खराब होगा?
यह सबसे जरूरी सवाल है और इसका जवाब "जरूरी नहीं" है। इतिहास बताता है कि सबसे मजबूत अल नीनो वर्षों में भी भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा हुई है।पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी राजस्थान, सौराष्ट्र क्षेत्र और कुछ मामलों में कर्नाटक जैसे क्षेत्रों में मजबूत अल नीनो के दौरान भी अच्छी वर्षा दर्ज की गई थी। इसका अर्थ है कि अल नीनो पूरे देश में समान प्रभाव नहीं डालता। कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी हो सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सामान्य या अधिक बारिश भी संभव है। Super El Niño
कहाँ ज्यादा असर
पिछले सुपर अल नीनो वर्षों के अध्ययन से संकेत मिलता है कि पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात के कुछ हिस्से और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में मानसून बेहतर रह सकता है। वहीं मध्य भारत के कुछ हिस्सों, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों और मानसून कोर जोन में वर्षा की कमी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि यह केवल संभावित संकेत हैं और वास्तविक तस्वीर मानसून की प्रगति तथा अन्य वैश्विक मौसमीय कारकों पर निर्भर करेगी। सबसे बड़ी चुनौती यही है कि मानसून शुरू होने से पहले सटीक रूप से यह बताना कठिन होता है कि कौन-सा क्षेत्र अधिक प्रभावित होगा और कौन-सा क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन करेगा। Super El Niño
मानसून की शुरुआत
अल नीनो का पहला प्रभाव मानसून की शुरुआत और उसकी प्रगति पर दिखाई दे सकता है।संकेत मिल रहे हैं कि केरल में मानसून का आगमन तो हो गया है, लेकिन इसकी प्रगति सामान्य गति से धीमी रह सकती है। तटीय कर्नाटक और गोवा तक अच्छी बारिश हो सकती है, लेकिन आंतरिक हिस्सों में मानसून की रफ्तार कमजोर पड़ने के आसार हैं। सामान्य परिस्थितियों में मानसून 8 जुलाई तक पूरे देश को कवर कर लेता है, लेकिन इस बार इसकी प्रगति में रुकावट या देरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। Super El Niño
किसानों के लिए संकेत
भारत की कृषि काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। इसलिए अल नीनो की स्थिति किसानों के लिए विशेष महत्व रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है। बुवाई से जुड़े निर्णय स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों को ध्यान में रखकर लेने चाहिए। जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और जोखिम प्रबंधन जैसी रणनीतियां भी उपयोगी साबित हो सकती हैं। मौसम से जुड़े अपडेट पर नियमित नजर रखना इस बार पहले से अधिक जरूरी होगा। Super El Niño
सबसे बड़ा सवाल
मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अल नीनो बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि इसकी चरम तीव्रता कब आएगी और यह कितना मजबूत होगा। वर्तमान मॉडल संकेत देते हैं कि अल नीनो जून-जुलाई से मजबूत होना शुरू कर सकता है और अगस्त से अक्टूबर के दौरान इसकी तीव्रता सबसे अधिक हो सकती है। हालांकि मौसम मॉडल समय-समय पर बदलते रहते हैं और नई जानकारी आने के साथ पूर्वानुमानों में संशोधन भी संभव है। यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार प्रशांत महासागर के तापमान और अन्य वैश्विक मौसमीय संकेतकों की निगरानी कर रहे हैं। Super El Niño
मानसून पर असर?
सुपर अल नीनो की संभावना निश्चित रूप से चिंता का विषय है, क्योंकि इसका भारत के मानसून पर ऐतिहासिक रूप से नकारात्मक प्रभाव रहा है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस वर्ष मानसून कमजोर ही रहेगा। मानसून पर केवल अल नीनो ही असर नहीं डालता। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), मैडेन-जूलियन ऑस्सीलेशन (MJO), पश्चिमी विक्षोभ और अन्य वैश्विक मौसमीय कारक भी भूमिका निभाते हैं। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो के विकास और उसकी तीव्रता पर लगातार नजर रखी जाए। Super El Niño आने वाले कुछ सप्ताह मानसून और अल नीनो दोनों की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगे। सुपर अल नीनो का खतरा जरूर है, लेकिन अभी यह मान लेना कि पूरा मानसून खराब हो जाएगा, उचित नहीं होगा। सतर्कता जरूरी है, लेकिन घबराने की नहीं।
