एकाग्रता से होती है भक्ति
श्रमण संधीय महामंत्री सौभाग्य मुनि ने कहा कि मानव मन भौतिक आसक्तियों के बंधन में बंधा हुआ है। इन आसक्तियों के बंधनों के टूटने से ही मन में भक्ति का भाव जागृत होता है।
श्रमण संधीय महामंत्री सौभाग्य मुनि ने कहा कि मानव मन भौतिक आसक्तियों के बंधन में बंधा हुआ है। इन आसक्तियों के बंधनों के टूटने से ही मन में भक्ति का भाव जागृत होता है।
वे आज पंचायती नोहरे में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मन एक समय में एक ही कार्य करता है। यदि आसक्ति का भाव मन में रमण करता है तो भक्ति में मन किस प्रकार रमण करेगा। एकाग्रता से ही प्रभु की भक्ति होती है। देश में जितने साधक, भक्त या राष्ट्रभक्त हुए है,उन्होंने अपनी संासारिक आकांक्षाओं को तोड़ा था तभी वे भक्ति भाव या राष्ट्र भक्ति से जुड़ सकें थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में आसक्ति से भक्ति की ओर बढऩे की प्रक्रिया नहीं है। व्यक्ति संासारिक इच्छाएं रखकर भी भक्त बनना चाहता है। राष्ट्र सेवा के नाम पर वर्तमान में गृहसेवा हो रही है। वे राष्ट्र सेवा के लिए बोलते अवश्य है लेकिन आसक्ति के कारण अवसर पा कर बड़े-बड़े घोटाले कर अपना घर भरते है।
मुनि ने कहा कि भक्ति का मार्ग स्वंय के बलिदान का मार्ग है। अपना तन, मन निछावर कर देने पर भक्ति आश्रे सेवा की सार्थकता बनेगी। आसक्ति व अनासक्ति का संबंध किसी वेशभूषा से नहीं है। यदि भावनाओं में अनासक्ति है जो उपार्जित है तो मनुष्य उसी से निर्वाह कर लेगा।
