गाय या भैंस, किसको पालने पर होगी ज्यादा कमाई ? दूध के फैट से समझें पूरा गणित

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गाय या भैंस, किसको पालने पर होगी ज्यादा कमाई ? दूध के फैट से समझें पूरा गणित

Udaipur Times, Dairy Farming : खेती के साथ डेयरी फार्मिंग गांवों में किसानों और युवाओं के लिए कमाई का अच्छा जरिया बनती जा रही है। दूध बेचकर रोजाना आमदनी हो जाती है, इसलिए काफी किसान गाय और भैंस पालने की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन डेयरी फार्मिंग शुरू करने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि गाय पालना ज्यादा फायदेमंद है या भैंस। खासकर दूध के फैट को लेकर किसानों में काफी उत्सुकता रहती है, क्योंकि कई जगह दूध की कीमत फैट के हिसाब से तय होती है। 

लखीमपुर खीरी के पशु विशेषज्ञ डॉ. एनके त्रिपाठी के मुताबिक, आमतौर पर भैंस के दूध में गाय के दूध से ज्यादा फैट होता है। भैंस के दूध में फैट करीब 6 से 8 प्रतिशत या उससे अधिक हो सकता है, जबकि गाय के दूध में यह आमतौर पर 3 से 5 प्रतिशत के आसपास रहता है। हालांकि, असली फैट नस्ल, पशु की सेहत, आहार और दूध देने की अवस्था पर निर्भर करता है।

भैंस के दूध में ज्यादा होता है फैट

डेयरी कारोबार में दूध की गुणवत्ता के साथ उसमें मौजूद फैट भी महत्वपूर्ण माना जाता है। डॉ. एनके त्रिपाठी बताते हैं कि भैंस के दूध में फैट की मात्रा गाय के दूध से अधिक होती है। इसी वजह से भैंस के दूध का इस्तेमाल घी, मक्खन, खोया, पनीर और दूसरे दुग्ध उत्पाद तैयार करने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। भैंस के दूध में सामान्य तौर पर करीब 6 से 8 प्रतिशत या उससे अधिक फैट हो सकता है, जबकि गाय के दूध में यह करीब 3 से 5 प्रतिशत के आसपास रहता है। यही अंतर उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है, जो दूध को डेयरी या ऐसे खरीदारों को बेचते हैं जहां भुगतान फैट के आधार पर किया जाता है।

डेयरी कारोबार में दूध की गुणवत्ता के साथ उसका फैट भी काफी मायने रखता है। डॉ. एनके त्रिपाठी बताते हैं कि भैंस के दूध में फैट गाय के दूध से ज्यादा होता है। इसी वजह से भैंस के दूध से घी, मक्खन, खोया, पनीर और दूसरे दुग्ध उत्पाद ज्यादा बनाए जाते हैं। भैंस के दूध में आमतौर पर करीब 6 से 8 प्रतिशत या उससे अधिक फैट हो सकता है, जबकि गाय के दूध में यह करीब 3 से 5 प्रतिशत रहता है। यह फर्क उन किसानों के लिए खास मायने रखता है, जो दूध डेयरी या ऐसे खरीदारों को बेचते हैं जहां भुगतान फैट के हिसाब से होता है।

फैट के आधार पर दूध बेचने वालों के लिए भैंस हो सकती है बेहतर


पशु विशेषज्ञ के अनुसार, जिन क्षेत्रों में दूध की खरीद फैट के आधार पर होती है, वहां भैंस पालन किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकता है। अधिक फैट वाला दूध होने के कारण इससे घी, मक्खन, खोया और पनीर जैसे उत्पाद तैयार करने में अधिक उपयोगिता होती है। इसी वजह से ग्रामीण इलाकों में कई किसान व्यावसायिक डेयरी के लिए भैंस पालन को प्राथमिकता देते हैं। मिठाई की दुकानों, चाय की दुकानों और दुग्ध उत्पाद तैयार करने वाले कारोबारियों के बीच भी अधिक फैट वाले दूध की मांग बनी रहती है। हालांकि, किसी किसान के लिए सिर्फ फैट को देखकर पशु का चुनाव करना सही नहीं होगा। दूध उत्पादन, पशु की नस्ल, चारे की लागत, पशु स्वास्थ्य और स्थानीय बाजार की मांग को भी ध्यान में रखना चाहिए।

पशु विशेषज्ञ के मुताबिक, जिन इलाकों में दूध की खरीद फैट के आधार पर होती है, वहां भैंस पालना किसानों के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है। ज्यादा फैट वाले दूध से घी, मक्खन, खोया और पनीर जैसे उत्पाद आसानी से तैयार किए जाते हैं। यही वजह है कि गांवों में कई किसान व्यावसायिक डेयरी के लिए भैंस पालन को प्राथमिकता देते हैं। मिठाई की दुकानों, चाय की दुकानों और दुग्ध उत्पाद बनाने वाले कारोबारियों के बीच भी ज्यादा फैट वाले दूध की मांग रहती है। हालांकि, सिर्फ फैट देखकर पशु खरीदना सही नहीं होगा। दूध उत्पादन, नस्ल, चारे का खर्च, पशु की सेहत और स्थानीय बाजार की मांग को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

गाय पालन भी हो सकता है फायदे का सौदा

ऐसा नहीं है कि डेयरी फार्मिंग में गाय पालन कम फायदेमंद है। अच्छी नस्ल की गाय, संतुलित आहार और उचित देखभाल के जरिए किसान अच्छा दूध उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। कई क्षेत्रों में गाय के दूध की घरेलू बाजार में अच्छी मांग रहती है और बड़ी संख्या में उपभोक्ता इसे पसंद करते हैं। गाय के दूध से घी, पनीर, दही और दूसरे दुग्ध उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। कुछ बाजारों में गाय के दूध और इससे बने उत्पादों की अलग मांग होती है। इसलिए अगर किसी इलाके में गाय के दूध की स्थानीय मांग अच्छी है और किसान को अच्छी नस्ल का पशु उचित कीमत पर मिल रहा है, तो गाय पालन भी डेयरी व्यवसाय के लिए अच्छा विकल्प बन सकता है।

ऐसा नहीं है कि डेयरी फार्मिंग में गाय पालना कम फायदेमंद है। अच्छी नस्ल की गाय, संतुलित आहार और सही देखभाल से किसान अच्छा दूध उत्पादन ले सकते हैं। कई इलाकों में गाय के दूध की घरेलू बाजार में अच्छी मांग है और काफी लोग इसे पसंद करते हैं। गाय के दूध से घी, पनीर, दही और दूसरे दुग्ध उत्पाद भी बनाए जाते हैं। कुछ बाजारों में गाय के दूध और इससे बने उत्पादों की अलग मांग होती है। इसलिए अगर किसी इलाके में गाय के दूध की मांग अच्छी है और किसान को अच्छी नस्ल की गाय सही कीमत पर मिल रही है, तो गाय पालन भी डेयरी कारोबार के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है।
गर्मियों में भैंसों की देखभाल पर देना होगा खास ध्यान

भैंस पालन में किसानों को मौसम का भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है। खासकर गर्मी के मौसम में भैंसों को पर्याप्त पानी, छाया और ठंडक की जरूरत होती है। भैंस का शरीर गर्मी के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील हो सकता है, इसलिए गर्म मौसम में पशु को धूप से बचाना और पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना जरूरी है। अगर पशु को लंबे समय तक तेज धूप और गर्मी में रखा जाए तो उसके स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसलिए व्यावसायिक डेयरी शुरू करने वाले किसानों को पशु शेड की व्यवस्था, पानी की उपलब्धता, साफ-सफाई और गर्मी से बचाव की व्यवस्था पहले से करनी चाहिए।

भैंस पालने वाले किसानों को मौसम का भी खास ध्यान रखना पड़ता है। खासकर गर्मी में भैंसों को पर्याप्त पानी, छाया और ठंडक चाहिए होती है। भैंस गर्मी के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकती है, इसलिए उसे धूप से बचाना और भरपूर पानी देना जरूरी है। अगर पशु को लंबे समय तक तेज धूप और गर्मी में रखा जाए, तो उसकी सेहत और दूध उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसलिए डेयरी शुरू करने से पहले पशु शेड, पानी, साफ-सफाई और गर्मी से बचाव की पूरी व्यवस्था कर लेनी चाहिए।

नस्ल का चुनाव डेयरी की कमाई में निभाता है बड़ी भूमिका

डेयरी फार्मिंग में सिर्फ यह तय करना पर्याप्त नहीं है कि गाय पालनी है या भैंस। पशु की नस्ल का चुनाव भी कमाई पर सीधा असर डाल सकता है। अच्छी नस्ल और स्वस्थ पशु से अपेक्षाकृत बेहतर दूध उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। वहीं, पशु खरीदते समय उसकी उम्र, स्वास्थ्य, दूध उत्पादन का रिकॉर्ड और प्रजनन संबंधी स्थिति की जानकारी लेना जरूरी है। डॉ. एनके त्रिपाठी के मुताबिक, गाय और भैंस की कई ऐसी नस्लें हैं जिनसे किसान अच्छा दूध उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए पशु खरीदने से पहले स्थानीय पशु चिकित्सक या पशुपालन विशेषज्ञ की सलाह लेना किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

डेयरी फार्मिंग में सिर्फ यह तय करना काफी नहीं है कि गाय पालनी है या भैंस। पशु की नस्ल का कमाई पर सीधा असर पड़ता है। अच्छी नस्ल और स्वस्थ पशु से बेहतर दूध उत्पादन मिल सकता है। पशु खरीदते समय उसकी उम्र, सेहत, दूध उत्पादन का रिकॉर्ड और प्रजनन की स्थिति जरूर जांचनी चाहिए। डॉ. एनके त्रिपाठी के मुताबिक, गाय और भैंस की कई ऐसी नस्लें हैं जिनसे किसान अच्छा दूध उत्पादन ले सकते हैं। इसलिए पशु खरीदने से पहले स्थानीय पशु चिकित्सक या पशुपालन विशेषज्ञ से सलाह लेना फायदेमंद रहेगा।

किसके पालन में ज्यादा कमाई? ऐसे समझें

अगर किसान का मुख्य लक्ष्य अधिक फैट वाले दूध की बिक्री है और उसके क्षेत्र में फैट के आधार पर दूध का अच्छा भाव मिलता है, तो भैंस पालन आकर्षक विकल्प हो सकता है। वहीं, जहां गाय के दूध की स्थानीय मांग अधिक है और अच्छी नस्ल की गाय आसानी से उपलब्ध है, वहां गाय पालन भी बेहतर कमाई दे सकता है। डेयरी फार्मिंग में वास्तविक मुनाफा केवल दूध के फैट से तय नहीं होता। दूध उत्पादन, दूध का बाजार भाव, चारे और दाने की लागत, पशु की देखभाल, दवाइयों का खर्च, श्रम और पशु की उत्पादकता जैसे कई कारक किसान की कुल कमाई तय करते हैं। इसलिए पशु खरीदने से पहले पूरे कारोबार का लागत और आय के हिसाब से आकलन करना जरूरी है।

अगर किसान का मुख्य लक्ष्य ज्यादा फैट वाले दूध की बिक्री है और उसके इलाके में फैट के हिसाब से अच्छा भाव मिलता है, तो भैंस पालन बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं, जहां गाय के दूध की मांग ज्यादा है और अच्छी नस्ल की गाय आसानी से मिल जाती है, वहां गाय पालन भी अच्छी कमाई दे सकता है। डेयरी फार्मिंग में मुनाफा सिर्फ दूध के फैट से तय नहीं होता। दूध उत्पादन, बाजार भाव, चारे और दाने का खर्च, पशु की देखभाल, दवाइयां, मजदूरी और पशु की उत्पादकता जैसे कई factors कुल कमाई तय करते हैं। इसलिए पशु खरीदने से पहले पूरे कारोबार की लागत और संभावित आमदनी का हिसाब जरूर लगा लेना चाहिए।

गाय के दूध की भी बनी रहती है मांग

भैंस के दूध में फैट अधिक होने के बावजूद गाय के दूध की मांग भी कई उपभोक्ताओं के बीच बनी रहती है। कुछ लोग रोजाना पीने के लिए गाय का दूध पसंद करते हैं, जबकि बाजार में गाय के दूध से बने घी और अन्य उत्पादों की भी मांग रहती है। इसी वजह से पशुपालन विभाग की ओर से कई जगह स्वदेशी नस्ल की गायों के संरक्षण और पालन को बढ़ावा दिया जाता है। कुल मिलाकर, डेयरी फार्मिंग में गाय और भैंस दोनों से कमाई की संभावना है। भैंस के दूध में आमतौर पर अधिक फैट होने के कारण फैट आधारित खरीद वाले बाजार में इसका फायदा मिल सकता है, जबकि गाय पालन में दूध की स्थानीय मांग, नस्ल और उत्पादन क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसान को अपने क्षेत्र के बाजार, चारे की उपलब्धता, पशु की कीमत और देखभाल के खर्च को ध्यान में रखकर ही फैसला लेना चाहिए।

भैंस के दूध में फैट ज्यादा होने के बावजूद गाय के दूध की मांग भी काफी लोगों के बीच बनी रहती है। कुछ लोग रोज पीने के लिए गाय का दूध पसंद करते हैं, वहीं बाजार में गाय के दूध से बने घी और दूसरे उत्पादों की भी मांग रहती है। इसी वजह से पशुपालन विभाग कई जगह देशी नस्ल की गायों के संरक्षण और पालन को बढ़ावा देता है। कुल मिलाकर, डेयरी फार्मिंग में गाय और भैंस दोनों से कमाई की अच्छी संभावना है। भैंस के दूध में आमतौर पर ज्यादा फैट होने से फैट के आधार पर खरीद वाले बाजार में इसका फायदा मिल सकता है, जबकि गाय पालन में स्थानीय मांग, नस्ल और दूध उत्पादन ज्यादा मायने रखते हैं। किसान को अपने इलाके के बाजार, चारे की उपलब्धता, पशु की कीमत और देखभाल के खर्च को देखकर ही फैसला लेना चाहिए।

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