सांस्कृतिक प्रदूषण भी रुके
झील क्षेत्र में नशे का व्यापार रोकना जरूरी है। झीलों के किनारे व घाटों पर यह असमाजिक कार्य होना चिंता जनक है। यह विचार झील मित्र संस्थान, झील संरक्षण समिति तथा गांधी मानव कल्याण समिति के तत्वावधान में रविवार को आयोजित श्रमदान संवाद में उभरे। डॉ अनिल मेहता ने कहा कि घाटों व सुनसान किनारों पर प्रायः नशे के इंजेक्शन व पन्नियां इत्यादि पड़े मिलते है। नशेड़ी इन्हें पेयजल की झीलों में भी फेंक देते है।जबकि झीलो का पानी पीने के काम आता है ।झील प्राधिकरण के सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि घाटों पर खुलेआम शराब का सेवन सांस्कृतिक प्रदूषण है। इसको रोकने के लिए सामाजिक व कानूनी प्रयास साथ साथ करने होंगे।
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