कर्म आप करों और उसका फल भगवान पर न थोपोंःडाॅ. शिवमुनि


कर्म आप करों और उसका फल भगवान पर न थोपोंःडाॅ. शिवमुनि

श्रमणसंघीय आचार्य डाॅ. शिवमुनि महाराज ने कहा कि कर्म बहुत सोच-समझकर करना चाहिए क्योंकि हंसते-हंसते हम कर्म का बंधन तो कर लेते है लेकिन जब उनका फल भोगने का समय आता है तब परमात्मा से कहते है कि हे परमात्मा तेरे राज में यह क्या हो रहा हैं, यहाँ पापी लोग तो आनंद में है और सारे दुःख मेरे ही हिस्से में आए है। इस समय मनुष्य यह नहीं सोचता है कि स्वयं द्वारा किये गये कर्मो के फल कष्ट के रूप में ही आपको मिले हैं, उन दुखों के बीज आपने ही बोए है। इसलिए कर्म करते हुए सावधान रहना चाहिये

 

कर्म आप करों और उसका फल भगवान पर न थोपोंःडाॅ. शिवमुनिश्रमणसंघीय आचार्य डाॅ. शिवमुनि महाराज ने कहा कि कर्म बहुत सोच-समझकर करना चाहिए क्योंकि हंसते-हंसते हम कर्म का बंधन तो कर लेते है लेकिन जब उनका फल भोगने का समय आता है तब परमात्मा से कहते है कि हे परमात्मा तेरे राज में यह क्या हो रहा हैं, यहाँ पापी लोग तो आनंद में है और सारे दुःख मेरे ही हिस्से में आए है। इस समय मनुष्य यह नहीं सोचता है कि स्वयं द्वारा किये गये कर्मो के फल कष्ट के रूप में ही आपको मिले हैं, उन दुखों के बीज आपने ही बोए है। इसलिए कर्म करते हुए सावधान रहना चाहिये।

वे आज महाप्रज्ञ विहार स्थित शिवाचार्य समवसरण में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित कर रहे थे। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में मित्रता का महत्त्वपूर्ण स्थान रहता है। कोई भी काम करों समर्पण से करों क्योंकि उसका अनन्त फल मिलता है। कोई भी स्वप्न देखो तो उठ जाना चाहिए। शुभ स्वप्न है तो नवकार मंत्र पढ़ लेना, स्वप्न का शुभ फल मिलता है। आचार्य, उपाध्याय, साधु, तपस्वी बालमुनि की सेवा उत्कृष्ट भावना से तीर्थंकर नाम गोत्र का बंध होता है।

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ईष्र्या का भाव स्त्री योनी का कारण है। कर्म कैसे-कैसे नाच नचाते हैं। तीर्थंकर चक्रवर्ती को भी नहीं छोड़ते है तो हम तो बहुत ही मामूली लोग है। उन्होंने कहा कि पुरूष माया करें तो स्त्री बनता है। स्त्री माया करे तो तिर्यंच बनता है, तिर्यंच माया करता है तो नरक का मेहमान बनता है। इसलिए जीवन में माया, कपट, छल, विश्वासघात किसी के साथ नहीं करना है। सरल व्यक्ति ही परमात्मा के नजदीक होता है सरल व्यक्ति ही परमात्मा को प्राप्त करता है।

आचार्यश्री ने कहा कि जिनशासन में दान का बड़ा महत्व हैं, देना बहुत महत्वपूर्ण है। शुद्ध भाव से देना जरूरी नहीं है। लाखों, करोड़ों का दान करें मगर जब भी दे हृदय की अनंत करूणा से दान देना हैं। उच्च भावना, श्रेष्ठ भावना से किया गया दान और धर्म आपका जीवन सुधार देता है।

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