सरकारी नौकरी से लेकर 'मोगैंबो' बनने तक का सफऱ ! जाने अमरीश पुरी की फिल्मी दुनिया की अनसुनी दास्तान
Udaipur Times, The story of Bollywood's greatest villain Amrish Puri: बॉलीवुड की सफलता और असफलता की कहानियों में संघर्ष हमेशा एक अहम हिस्सा रहा है, लेकिन अभिनेता अमरीश पुरी का सफर सबसे अलग माना जाता है। उनके चचेरे भाई के. एल. सहगल संगीत जगत के महान गायक थे और उनके दो बड़े भाई चमन पुरी और मदन पुरी भी फिल्मों में सफल अभिनेता थे। इसके बावजूद अमरीश पुरी को इंडस्ट्री में अपनी पहचान खुद बनानी पड़ी।
शुरुआती दौर और सरकारी नौकरी
20वीं सदी के मध्य दशक में जब के. एल. सहगल का दौर खत्म हो चुका था, तब अमरीश पुरी अपने करियर की शुरुआत कर रहे थे। शिमला के बी.एम. कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद उन्हें कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) में सरकारी नौकरी मिल गई, लेकिन यह नौकरी उनके भीतर के कलाकार को संतुष्ट नहीं कर सकी।

थिएटर से अभिनय की असली शुरुआत
अभिनय के प्रति अपने जुनून के चलते वे एक शौकिया नाट्य मंडली से जुड़ गए। यहां उन्होंने सत्यदेव दुबे जैसे नाटककारों के साथ काम किया और पृथ्वी थिएटर में भी अभिनय किया। धीरे-धीरे वे थिएटर की दुनिया में एक मजबूत अभिनेता के रूप में पहचाने जाने लगे।
फिल्मों में संघर्ष भरा शुरुआती दौर
थिएटर में पहचान बनने के बावजूद फिल्मों में जगह बनाना आसान नहीं था। अमरीश पुरी लगातार फिल्म निर्माताओं के दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन अक्सर उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता था। कई बार छोटे रोल मिलते थे और कई बार मेहनताना भी नहीं मिलता था।
फिल्मों में पहली पहचान और शुरुआती भूमिकाएं
उन्हें पहली बार क्रेडिट फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ से मिला। इसके बाद उन्होंने ‘रेशमा और शेरा’, ‘हलचल’ जैसी फिल्मों में छोटे लेकिन प्रभावशाली किरदार निभाए। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा पर श्याम बेनेगल जैसे बड़े निर्देशक की नजर पड़ी।
श्याम बेनेगल और समानांतर सिनेमा में पहचान
श्याम बेनेगल ने उन्हें ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘कोन्दुरा’ और ‘कलयुग’ जैसी फिल्मों में काम दिया। इसके बाद गोविंद निहलानी की फिल्मों ‘आक्रोश’, ‘अर्ध सत्य’ और ‘तमस’ में भी वे लगातार नजर आने लगे।

बॉलीवुड के सबसे बड़े विलेन के रूप में पहचान
1980 के दशक की शुरुआत में अमरीश पुरी ने मुख्य खलनायक के रूप में बड़ी सफलता हासिल की। ‘हम पांच’ के वीर प्रताप सिंह, ‘विधाता’ के जगुआर चौधरी और ‘हीरो’ के पाशा जैसे किरदारों ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया।
हॉलीवुड तक पहुंच और मोला राम का किरदार
फिल्म ‘गांधी’ में छोटे रोल के बाद स्टीवन स्पीलबर्ग ने उन्हें नोटिस किया और ‘इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ डूम’ में मुख्य विलेन ‘मोला राम’ का किरदार दिया। इस भूमिका के लिए उन्होंने अपना सिर मुंडवाया, जो उनका सिग्नेचर लुक बन गया।
दिलवाले दुल्हनियां से बदल गई विलेन वाली छवि
1995 में फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में उन्होंने चौधरी बलदेव सिंह का किरदार निभाया। इस भूमिका ने उनकी विलेन छवि को पूरी तरह बदल दिया। उनका डायलॉग “जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी” आज भी बेहद प्रसिद्ध है।
आखिरी साल और विरासत
इसके बाद उन्होंने ‘परदेस’, ‘विरासत’ और ‘चाची 420’ जैसी फिल्मों में भी काम किया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक वे सक्रिय रहे और हर साल कई फिल्मों में नजर आते रहे। 12 जनवरी 2005 को 73 वर्ष की उम्र में ब्लड कैंसर के कारण उनका निधन हो गया।
