हरियाणा में NHM के कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, कोर्ट ने सुनाया ये बड़ा फैसला
Udaipur Times, Haryana news : हरियाणा से बड़ी खबर सामने आई है। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारियों के हक में एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में सरकार को आदेश दिया है कि NHM के संविदा कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने इसे पूरी तरह से भेदभावपूर्ण माना है, क्योंकि राज्य सरकार पहले ही अन्य कई श्रेणियों के कर्मचारियों को यह लाभ दे चुकी है।
'समान कार्य के लिए अलग-अलग लाभ देना संविधान के खिलाफ'
जस्टिस संदीप मौदगिल की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार के पास एनएचएम कर्मचारियों को इस लाभ से वंचित रखने का कोई ठोस और तार्किक आधार नहीं है। अदालत ने माना कि ये संविदा कर्मचारी हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और लंबे समय से नियमित प्रकृति का कार्य संभाल रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समान कार्य के लिए अलग-अलग लाभ देना संविधान के समानता के सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है।
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि हाल ही में हाई कोर्ट ने 10 वर्ष से अधिक की सेवा पूरी कर चुके NHM कर्मचारियों के नियमितीकरण (Regularization) का भी आदेश दिया था। सरकार लंबे समय तक संविदा व्यवस्था के नाम पर किसी का शोषण नहीं कर सकती।
हाई कोर्ट के 3 और बड़े फैसले
फाइल **148823.jpg** के अनुसार, हाई कोर्ट ने इसके अलावा तीन अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर भी अपने कड़े और अहम फैसले सुनाए हैं:
1. MPHW (पुरुष) भर्ती की मेरिट सूची दोबारा बनाने का आदेश
हाई कोर्ट ने बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कर्मचारियों (MPHW-पब्लिक हेल्थ वर्कर्स) की भर्ती के अभ्यर्थियों को बड़ी राहत दी है। जस्टिस संदीप मौदगिल ने साल 2015 की भर्ती याचिकाओं का निपटारा करते हुए आदेश दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने NHM के तहत सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइजर (STS) और पैरा मेडिकल वर्कर (PMW) जैसे पदों पर काम किया है, उनके अनुभव के अंक जोड़कर 2 महीने के भीतर मेरिट सूची दोबारा तैयार की जाए। कोर्ट ने अनुभव अंक न देने के फैसले को अनुचित और भेदभावपूर्ण बताते हुए परिणाम रद्द कर दिया है।
2. छेड़छाड़ के आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
करनाल के निसिंग क्षेत्र में एक युवती के साथ छेड़छाड़ और उसका पीछा करने के मामले में हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि आरोपी ने कोर्ट के सामने एफआईआर का अधूरा और गलत अंग्रेजी अनुवाद पेश करके तथ्यों को छुपाने की कोशिश की थी। कोर्ट ने कहा कि अदालत से राहत मांगने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह सभी तथ्यों को ईमानदारी से सामने रखे।
3. 34 साल पुराने ट्रेन बम धमाके के पीड़ितों को मिलेगा मुआवजा
हाई कोर्ट ने करीब 34 वर्ष पुराने जनता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में रेलवे प्रशासन की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यात्री ट्रेन में हुआ बम विस्फोट सीधे तौर पर रेलवे की लापरवाही को दर्शाता है। ऐसे में जान गंवाने वाले यात्रियों के परिजनों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी पूरी तरह से रेलवे प्रशासन की होगी। कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा है।
