सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : हाउसवाइफ भी ‘राष्ट्र निर्माता’, मिलेंगे 30 हजार रुपये मासिक

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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : हाउसवाइफ भी ‘राष्ट्र निर्माता’, मिलेंगे 30 हजार रुपये मासिक

Udaipur Times, Supreme Court on Housewife : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि घरेलू कामकाज करने वाली गृहिणियां (homemakers) “राष्ट्र निर्माता” हैं और उनके योगदान को अब कानूनी व आर्थिक रूप से उचित मान्यता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत मुआवजा तय करते समय, जिन गृहिणियों की कोई स्वतंत्र आय नहीं है, उनके लिए 30,000 रुपये प्रति माह को न्यूनतम काल्पनिक आय (notional income) माना जाएगा।

अवैतनिक घरेलू काम को मिली मान्यता

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि जिन मामलों में गृहिणी की कोई प्रत्यक्ष आय नहीं होती, वहां 30,000 रुपये मासिक को घरेलू सेवाओं के मूल्यांकन के आधार के रूप में लिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई गृहिणी पहले से किसी रोजगार में थी, तो उसके वास्तविक वेतन के साथ घरेलू काम के मूल्य का मुआवजा अलग से जोड़ा जाएगा।

‘गृहिणी पर निर्भर है परिवार की व्यवस्था’

फैसले में कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज में अक्सर गृहिणी को आश्रित माना जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि घर का पूरा संचालन उनकी भूमिका पर निर्भर होता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वास्तव में कमाने वाले सदस्य भी घरेलू कामकाज के लिए गृहिणी पर निर्भर होते हैं।

GDP में योगदान का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 16 अरब घंटे का अवैतनिक घरेलू कार्य होता है। भारत में महिलाओं का यह अवैतनिक कार्य देश के GDP में लगभग 15% से 17% तक का योगदान देता है, हालांकि इसे औपचारिक मान्यता नहीं मिलती।

‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा

कोर्ट ने कहा कि गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” कहा जाना चाहिए, क्योंकि वे परिवार के सदस्यों को शिक्षा, रोजगार और जीवनयापन के लिए सक्षम बनाती हैं। फैसले में कहा गया कि घर की नींव मजबूत करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मुआवजा बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये किया गया

यह मामला 2001 में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा था, जिसमें एक गृहिणी की मृत्यु हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 62,77,900 रुपये कर दिया।

लंबित मामलों पर चिंता

कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में वर्षों की देरी एक गंभीर समस्या है। अदालत ने सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से ऐसे लंबित मामलों को प्राथमिकता से निपटाने और अतिरिक्त बेंच की आवश्यकता पर विचार करने को कहा। यह फैसला घरेलू श्रम को पहचान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पहल माना जा रहा है। 

किस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला 

जानकारी के लिए आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह ऐतिहासिक फैसला पंजाब के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 2003 में ट्रिब्यूनल ने फैसला दिया, लेकिन यह मामला सालों-साल कानूनी दांवपेच में फंसा रहा। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस पर दिसंबर 2024 में हादसे के 23 सालों के बाद जाकर फैसला सुनाया था।

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