पिता की संपत्ति पर बेटी-बहन और बुआ का कितना अधिकार ? जाने कोर्ट के नियम

 | 
पिता की संपत्ति पर बेटी-बहन और बुआ का कितना अधिकार ? जाने कोर्ट के नियम 

Udaipur Times, Property Rule : पिता की संपत्ति पर बेटी-बहन और बुआ का कितना अधिकार है, आइए आज हम आपको इससे जुड़ी पूरी जानकारी देने वाले है। पिता की संपत्ति पर बेटियों का अधिकार को लेकर कई फैसले सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले देखने को मिल रहे हैं। यानी मामला जो है एक तरीके से देखा जाए निचली अदालत से लेकर जो हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंच गया। पिता की संपत्ति पर बेटियों का अधिकार पिता के पास 12 एकड़ पैतृक जमीन थी। पिता का देहांत बिना वसीयत का हो गया। 

मतलब देखें पैतृक दादा परदादा की जो जमीन होती थी ना वही जमीन थी। अब आपको यह समझना होगा कि क्या एक बेटी जो है अपना अधिकार प्राप्त कर सकती है। क्या एक भाई जो है यहां पर उस पर रोक लगा सकता है। क्या यहां पर एक भाई अगर पहले बंटवारा कर लिया मान लेते हैं कि अभी बंटवारा हुआ है। बंटवारा तो आज से 30 साल हो गया बंटवाड़ा किए हुए। 30 साल पहले का बंटवाड़ा। पहले का बंटवारा अब जो है आपकी बुआ आ गई है कि नहीं? मेरा भी तो हिस्सा बनता है। तो 30 साल पहले जब बंटवारा हो गया उस समय बुआ हिस्सा नहीं खोज रही थी। आज बुआ जो है घर में वह आ रही है हिस्सा खोजने के लिए शेयर खोजने के लिए। Property Rule

क्या कहता है हमारा कानून? क्या यह पॉसिबल है? क्या यह संभव है? क्या ऐसा हो सकता है? 

तो आज ये जो सबसे पहले नियम यह कहता है कि जो बेटा हो और बेटी हो सभी का समान अधिकार है। लेकिन क्या होता है कि बेटी का विवाह हो गया। वो चली गई और वो उसको गए कितना साल हो गया? 40-50 साल हो गया। गए 40 50 साल हो गया। अब जो है उनका एक तरह से एज हो गया। है वो बूढ़ी हो गई है। अब 30 साल बाद जो है वो आकर 30 साल पहले जो बंटवारा हुआ था अब वो आकर कह रहे हैं मेरा भी तो हक बनता है। मेरा भी तो हिस्सा बनता है। ऐसे सिचुएशन ऐसे कंडीशन उत्पन्न हो रहे हैं। Property Rule

आखिर इससे कैसे निकला जाए? क्या कोई रास्ता है? कोई आसान सा रास्ता है? तो बिल्कुल है। 

हर रास्ता है। यानी आपको निकलने के लिए ऐसा नहीं है कि रास्ता नहीं है। लेकिन आपको यह प्रक्रिया समझना पड़ेगा। अगर आप समझ लिए तो फिर समस्या नहीं होगा। तो पिता की संपत्ति पर बेटियों का कानूनी रूप से जो है यह अधिकार तो है। वर्तमान में अधिकार है। यानी अगर आप पिता हैं और आपके पास संपत्ति है। आपका एक बेटा है और एक बेटी है तो कानूनी तौर पर दोनों का जो है समान अधिकार होगा। अब देखें पिता जो है यहां पर 12 एकड़ पैतृक जमीन थी। तो पिता का देहांत हो जाता है। अब देहांत हो जाता है पिता का तो घर परिवार में अगर देखा जाए तो मां है तो यानी जो आपके पिता है उनकी पत्नी है। उनका एक बेटा है। एक दूसरा बेटा भी है। दो बेटी भी है। अब है कि कुल कान जो यहां पर कुल अगर देखा जाए तो पांच कानूनी वारिस यहां पर है। ये कानूनी वारिस है। और कानूनी वारिस का मतलब हो गया कि इनको अधिकार मिलेगा। Property Rule

यानी इनको क्या मिलेगा? हिस्सा मिलेगा। इनको क्या मिलेगा? 

हक मिलेगा। तो ये कानूनी वारिस है। पत्नी भी कानूनी वारिस है। बेटा भी कानूनी वारिस, बेटी भी कानूनी वारिस। तो हिस्सा कैसे बंटेगा? सभी वारिसों को बराबर मिलेगा। 

यानी कुल जमीन है 12 एकड़। पांच से डिवाइड कर दें। तो 2.4 एकड़ क्या होगा?

सबको मिलेगा। यानी पत्नी है तो उनको भी 2 जो है यहां पर 4 एकड़ जमीन मिलेगा। अब आप कहेंगे कि उनको भी मिलेगा। तो हां वो उनको भी मिलेगा। यानी अब वो जिसके साथ रहेगी वो 2.4 एकड़ उसके साथ जाएगा। अब वहां पर एक बेटा है उसको भी 2.4 इसको भी 2.4 इसको भी 2.4 और इसको भी 2.4 ये कानूनी तरीका है। लेकिन अब ये कानूनी जो तरीका है ना ये तो एक तरह से बेटी जो है उनको भी हक दे दिया गया। Property Rule

आखिरकार कैसे इससे बचा जा सकता है? इसका क्या तरीका है? क्या कहता है हमारा कानून?

तो कानून की अगर बात करें तो यहां पर देखें पिता की मृत्यु 1995 में हुई और बेटा बेटा है और बेटा तीन बेटे हैं। तीन बेटे ने आपस में जमीन क्या है बांट ली। अलग-अलग जो है सब ने अपना जमीन कर लिया। दो बेटियों को हिस्सा नहीं दिया। बाद में क्या हुआ? 2007 में बेटियों ने कोर्ट में दावा कर दिया। अब कोर्ट में दावा कर दिया बेटी कि मुझे मेरा हक चाहिए। मुझे मेरा यहां पर जो कानूनी अधिकार बनता है मुझे मेरा जो हिस्सा बनता है वो मुझे चाहिए। अब ये बेटी के द्वारा क्या हुआ? कोर्ट में दावा कर दिया। तो सुप्रीम कोर्ट का जो सिद्धांत है कि केवल भाइयों का आपसी बंटवारा बेटियों का अधिकार खत्म नहीं करता। Property Rule

ये सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले में वो जजमेंट भी हम बताएंगे आपको। कई फैसले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा ऐसा कहा गया कि देखें अगर कोई भाई है ना वह अगर आपसी बंटवारा कर लेता है जमीन को अलग-अलग डिवाइड कर लेता है तो बेटी जो है घर की या जो बहन है उनकी उनका अधिकार ऐसा नहीं कि खत्म हो जाता है वो अपना अधिकार का दावा कर सकती है वो दावा करने के लिए स्वतंत्र है कानून उनको अधिकार जो है देता है देखें अब ये डिपेंड करता है ना कि संपत्ति है दो तरह का एक मान लेते हैं कि जो पैतिक संपत्ति है तो ये संपत्ति हो गया दादा परदादा दादा से जो संपत्ति प्राप्त हुआ है। दूसरा यहां पर है स्वर्जित संपत्ति यानी पिता के द्वारा खुद से यह संपत्ति जो है अर्जित किया गया है। तो दो तरह तरह का संपत्ति हो गया। Property Rule

तो पिता ने लिखित वसीयत बनाई तो पिता ने जो लिखित वसीयत पिता के द्वारा बनाया जाएगा ना तो वो किसका बनाया जाएगा? स्वार्जित संपत्ति का। मतलब पैतृक संपत्ति का वसीयत नहीं बनेगा। किसका बनेगा? स्वार्जित संपत्ति का। तो पूरा मकान जो है ये छोटे बेटे को पिता के द्वारा दे दिया गया। तो ठीक है। पिता स्वतंत्र है देने के लिए। स्वर्जित संपत्ति पिता खुद अपनी कमाई से अगर संपत्ति खरीदें, प्रॉपर्टी खरीदें तो वह देने के लिए स्वतंत्र है। उसके लिए अब जो है यहां पर परेशानी नहीं टेंशन नहीं है। उसके बाद खेती की जमीन दोनों बेटियों को खेती वाला जो जमीन है ये क्या करते हैं?

वहां पर भी उनके पास स्वार्जित संपत्ति है। ये दोनों बेटियों को देते हैं। ऐसी स्थिति में संपत्ति वसीयत के अनुसार बांटी जाएगी। अब पैतृक संपत्ति जो है पैतृक संपत्ति में पिता जो भी करेंगे अपना शेयर करेंगे। अपना हक करेंगे। इसलिए कि पैतृक संपत्ति में सभी उत्तराधिकारी है। आप जिस बेटे और बेटियों को आप अपने मन से दे रहे हैं ना वह कानूनी तौर पर आपसे ले सकते हैं। यानी कानूनी तौर पर वो क्या है? Property Rule

उत्तराधिकारी हैं। इसलिए कि पिता ने अपनी कमाई से मकान खरीदा और वह जीवित रहते किसी एक बच्चे के नाम जो है गिफ्ट रीड कर देते हैं। या किसी एक बच्चे को वो जो है यहां पर गिफ्ट कर देते हैं। वसीयत बनाकर दे देते हैं। तो ये कानूनी रूप से मान्य हो सकता है। देखें एक तरह से बेच ले पिता। एक बेटे को दान कर दे। ठीक है? दान कर दे या एक बेटे को करे या किसी को कर दे या उसको यहां पर बेच ले या उसका जो है यहां पर वसीयत कर दे। वसीयत जो है ना कर दे। ये सब जो है मान्य होगा। लेकिन यहां पर धोखाधड़ी, दबाव और मानसिक जो है अस्वस्थता में अगर ऐसा किया गया है तो फिर यह सारे डॉक्यूमेंट रद्द हो जाएंगे। साबित होने पर कोर्ट चुनौती जो है सुन सकती है। अगर कोई मानसिक रूप से बीमार है, दिमागी हालत सही नहीं है, उससे आप क्या किए? जमीन लिखवा लिए। तो ये एक प्रकार का क्या है? Property Rule

धोखाधड़ी है। ये एक प्रकार का यहां पर जालसाजी है। यानी इसमें क्या होता है कि बाद में जब ऐसा लगेगा कि नहीं इनके साथ जो है धोखा हो गया है तो उनके बच्चे या उनके परिवार के सदस्य जो भी जिनका मानसिक स्थिति सही है। तो ये कोर्ट में जाकर साबित कर सकते हैं कि ऐसा किया गया। लेकिन उनका मानसिक स्थिति सही नहीं है। तो कोई भी व्यक्ति है वह अपना स्वर्जित संपत्ति है स्वेच्छा से जो है जिसको भी देना चाहे दे सकते हैं। तो दादा की जमीन हो गया तो पैतृक जमीन हो गया तो स्वर्जित का बात कर रहे थे कि ठीक है वसीयत से दे दे गिफ्ट से दे दे जैसे देना है लेकिन दादा की जमीन है उसके बाद पिता ने उपयोग किया अब आगे बच्चे उपयोग करेंगे तो ये पैतृक संपत्ति मानी जा सकती है कि दादा का जमीन है पहले दादा उसके बाद पिता उसका उपयोग किया और बाद में बेटा बेटा और बेटी बेटी सब सबका यहां पर क्या होगा यहां पर समान अधिकार होगा समान अधिकार आप ऐसा नहीं कर सकते कि हम इनको अधिकार नहीं देंगे इसको अधिकार से वंचित कर देंगे कि बेटा बेटा और बेटी है दोनों का क्या होगा? समान अधिकार होगा। Property Rule

बेटी का जन्म से अधिकार बनता है और उसे बेटे के बराबर जो है यहां पर हिस्सा मिलता है। यानी कानून यही कहता है कि जो बेटी है ना घर की उसको जन्म से अधिकार बेटी को भी मिलता है, बेटा को भी मिलता है। और कभी भी बेटी जो है वह कानूनी तौर पर संपत्ति को लेकर दावा कर सकती है। लेकिन आपके मन में सवाल चल रहा होगा कि दावा कर सकती है। कब दावा कर सकती है? कब दावा नहीं कर सकती है? यानी यह भी तो होगा कि आज ठीक है वो दावा नहीं कि बेटी का विवाह हो गया वो तो अपने ससुराल चली गई वहां भी उनकी संपत्ति है वहां भी उनकी जमीन है लेकिन हम आपको बता दें कि ये जो है ना इनका कानूनी जो संपत्ति में अधिकार है कानूनी एक तो जो पति का है ना पति का जो संपत्ति होगा उसमें ये दावेदारी जो है करते हैं कोई शेयर नहीं डिवाइडेड है और लेकिन जो पिता का संपत्ति है इनका उसमें इनको शेयर डिवाइडेड है कि इनको यानी बराबर का समान जो अधिकार है वह मिलने वाला है और कहीं ना कहीं यह सब जो समस्या का वजह बनता है ना उसका कारण क्या है पता है? उसका कारण है मौखिक बंटवारा भविष्य में विवाद उत्पन्न करता है। ये सिर्फ भाई बहन का विवाद नहीं उत्पन्न करता। यह जो है ना भाई भाई का भी विवाद उत्पन्न कर देता है। बाद में यहां पर आपके पिता और चाचा इसीलिए आज लड़ रहे हैं। आपके पिता और चाचा का अगर संपत्ति का विवाद है, जमीन का विवाद है, हिस्सेदारी का विवाद है तो कारण क्या है पता है? Property Rule

मौखिक बंटवारा। तो इसलिए ये क्या किया?

पिता और चाचा भी तो भाई थे। तो भाई-भाई का विवाद उत्पन्न कर दिया भविष्य में। तो भविष्य में ये विवाद पैदा करता है मौखिक बंटवारा। आज ठीक है परिवार में जो है कोई झगड़ा नहीं है। आज आप दो भाई हैं। आप दोनों भाई में तीन भाई में कोई झगड़ा नहीं है। तो इसलिए आपने क्या कर लिया? मौखिक बंटवारा तो मौखिक क्यों करना? अगर आप जो बंटवारा करने के लिए निकल ही गए हैं तो बंटवारा आप जो है अमौखिक क्यों करेंगे?
लिखित क्यों नहीं कर लेंगे? तो लिखित यहां पर पार्टीशन डीड और रजिस्ट्री सबसे सुरक्षित तरीका होता है। कि अगर आप जो भी करेंगे लिखित तौर पर करेंगे। में पार्टीशन डीड आपके पास है, रजिस्ट्री है तो यह सुरक्षित है। आपको उतना समस्या नहीं होगा। बेटियों का नाम जमीन रिकॉर्ड में दर्ज करवाना भी बेहद जरूरी होता है। Property Rule

अगर हिस्सेदार है तो आप उसको दर्ज जरूर करवा दें। कोर्ट में जो है फैमिली ट्री और जमीन रिकॉर्ड बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कानून की जानकारी और समय रहते सही कदम उठाना आपके अधिकारों की रक्षा करता है। तो यह हो गया। अब है कि यहां पर मान लेते हैं कि आप कहेंगे कि बेटी का नाम हम तो बेटी का नाम आपने क्या किया? जमाबंदी जो है उसमें दर्ज करा दिया। जमाबंदी में आपने यहां पर दर्ज करा दिया और उसके बाद जो है ना जमीन का क्या करवा दिए? आप यहां पर पार्टीशन जो है यहां पर डीड बनवा लिए। पार्टीशन डीड यानी जॉइंट में जमाबंदी में दर्ज हो गया ना पार्टीशन डीड बना लिए या जमीन का क्या करा लिए? रजिस्ट्री करा लिए। जो भी है यानी अब खर्च तो करना ही पड़ेगा। रजिस्ट्री में कहेंगे ज्यादा खर्च लगेगा तो खर्च लगेगा। लेकिन ये तरीका क्या है? Property Rule

यहां पर सुरक्षित है। भविष्य में कोई प्रकार का समस्या नहीं होगा। जितना शेयर बनता था ना बहन का जितना शेयर बनता था हम क्या किए? उतना सिर्फ लिखा लिए उससे लिखा लिए। तो इसमें क्या हो गया कि अब भविष्य में जो है कुछ भी हो जाए यानी वो दावे दावा नहीं कर सकती है। यानी हम जो है बहन आदि बहन से अभी कोई विवाद नहीं है तो हम क्या किए उससे संपत्ति जितना उसका शेयर बनता है कानूनी अधिकार बनता है हम उससे क्या किए रजिस्ट्री करवा लिए। अब ये सब जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला देख रहे हैं ना विनीता शर्मा वर्सेस राकेश शर्मा का जो फैसला है, जजमेंट है। ये सारा जो है ना यानी बेटी के अधिकार को लेकर ही जो विवाद है वो कोर्ट में चला गया। Property Rule

 सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। तो सुप्रीम कोर्ट का यह सब महत्वपूर्ण फैसला विनीता शर्मा, राकेश शर्मा अगर बात करें इसका जो केस नंबर है उस केस नंबर की तो केस नंबर है 32601 32 यहां पर 601 ऑफ 2018। तो ये जो है यहां पर केस नंबर है। उसके बाद यहां पर क्या कहा गया इसमें कि बेटी को जन्म से बराबर अधिकार है। उसके बाद जो है दूसरा भी जो जजमेंट है दूसरा भी जो फैसला है यही है कि शादीशुदा बेटी को अभी हिस्सा मिलेगा। मतलब एक हो गया कि बेटी को जन्म से एक फैसला जो सुप्रीम कोर्ट का है, उसमें ये कहा जाता है कि बेटी को जन्म से अधिकार है। दूसरा जो जजमेंट है उसमें कह रहा है कि नहीं। यह शादीशुदा बेटी को भी हिस्सा मिलेगा। तो ये यहां पर जो है सुमन सुरपुर वर्सेस अमर का जो जजमेंट है जिसके अगर बात करें केस नंबर की तो इसका जो केस नंबर है 188 ऑफ 200 यहां पर 18 अब ये इसके बाद जो है ये है प्रकाश वर्सेस जो है फुलवती यहां पर क्या कहा गया यहां पर ये कहा गया कि उत्तराधिकार कानून की व्याख्या पर ये महत्वपूर्ण फैसला है जैसे कि किसका हक कितना होना चाहिए किसका अधिकार कितना होना चाहिए चाहिए। यह जजमेंट उसी को लेकर है। और अगर इसके यहां पर देखें केस नंबर की बात करें तो केस नंबर जो है यह है 7217 ऑफ 2013 2013 तो ये सब जो है ना यानी उत्तराधिकार की बात करें शादीशुदा बेटी की बात करें बिना शादीशुदा बेटी की बात करें तो सबको कानूनी रूप से यह फैसला ये जजमेंट जो है बेटियों को बराबर का अधिकार देता है। Property Rule

बेटियों को अधिकार देता है। और यह सारा जो आप जजमेंट देख रहे हैं, यह सारा जजमेंट एक हिंदू परिवार की पैतृक संपत्ति पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा था। जिसमें बेटियों को यहां पर हिस्सा नहीं दिया गया था। ये भी यहां पर आगे हम आपको जो है बताएंगे कि यहां पर जो है ठीक है नहीं भी दिया गया है इस जजमेंट में आगे हम आपको बताते हैं ऐसा नहीं है कि जो हर जजमेंट में अधिकार ही दिया गया है। ये मामला जो है अब आगे जो मामले की बात करने वाले हैं वहां पर आप देखेंगे कि एक फैसला आता है और फैसला में बेटी को अधिकार नहीं दिया जाता है। तो आखिर ये कौन सा फैसला है? कहां का फैसला है जो कि बेटी को अधिकार नहीं दिया। अब विवाद का कारण समझ है। पिता है बीना शर्मा। उसके बाद पत्नी है। यहां पर पत्नी है। तीन बेटियां हैं। चार बेटे हैं। पिता की मृत्यु 1985 में हो जाती है। कोई वसीयत जो है पिता के द्वारा यहां पर नहीं छोड़ा गया। यानी तीन बेटी हैं, चार बेटे हैं। और मृत्यु वर्ष जो है यानी 1985 है और यह जो हुआ है वह बिना वसीयत का हुआ है। जैसे ही पिता की मृत्यु होती है कुछ दिन के बाद जो है पिता की मृत्यु के बाद चारों बेटे ने अपने आपस में संपत्ति बांट ली। Property Rule

एक रजिस्टर पार्टीशन डील भी तैयार किया गया। बंटवारा पत्र भी बनाया गया। सब कुछ किया गया। यानी जैसे स्ट पर आप क्या करते हैं? एक पंचनामा बनवा लेते हैं। यहां पर पंचनामा बनवा लिए। यानी आपका एक पार्टीशन डीड है। आप इससे क्या किए? Property Rule

जमीन का इस पर सारा कुछ हिस्सा मेंशन कर दिए। तो जमीन का बंटवारा आप जो है कर लिए। लेकिन यह बंटवारा का जो कागज बना ना इसमें बेटियों को ना तो शामिल किया गया और ना ही कोई हिस्सा दिया गया। तो क्या यह पार्टीशन डीड कानूनी रूप से सही है? अगर यह पार्टीशन डीड पर आपकी बहन का सिग्नेचर नहीं है। यह कानूनी जो पार्टीशन डीड है, इस पर आपका बहन ने सपोर्ट नहीं किया है। तो क्या यह पार्टीशन डीड सही है? तो बिल्कुल नहीं सही है। इसलिए कि आपने क्या किया कि बेटियों को ना तो शामिल किया और ना ही कोई हिस्सा दिया। ये चारों भाई जमीन अपने हिस्से की जमीन जो है उसका तो बंटवारा कर लिए लेकिन यहां पर उस बेटी को जो है उस बहन को हक नहीं दिया गया। अब बहन को भी लग गया कि भाई के द्वारा उनको हक नहीं दिया जाएगा। इसलिए 2007 में बेटियों ने जबकि पिता की मृत्यु 1985 में ही हो गया था। 2007 में बेटियों ने अदालत में एक मुकदमा दायर कर दिया और उन भाई के खिलाफ अपना हक को लेकर उनका कहना था कि पिता की मृत्यु बिना वसीयत हुई है। यानी पिता पिता के द्वारा वसीयत नहीं बनाया गया। हम भी कानूनी वारिस हैं। मेरा भी कानूनी रूप से अधिकार बनता है। अब यहां पर देखें हमारा कानून क्या कहता है? कौन सा ऐसा कानून है? Property Rule

तो कानून है हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा आठ के अनुसार हमें बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए। अब ये धारा आठ की अगर बात करें तो क्या ये धारा आठ जो सेक्शन एट है क्या इसमें यह सारा बात का जिक्र किया हुआ है? तो इसका जवाब है हां बिल्कुल किया हुआ है। अगर कोई पुरुष की संपत्ति जो है यानी उत्तराधिकार के नियम को यह तय करती है। अगर किसी प्रकार का बिना वसीयत अगर उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उस उनके जितने भी उत्तराधिकारी हैं और ये उत्तराधिकारी को हम लोग बोलते हैं वर्ग यहां पर एक के उत्तराधिकारी। वर्ग एक। Property Rule

अब वर्ग एक के एक के अगर यहां पर वारिस की बात करें, तो यह वारिस जो है कौन-कौन होते हैं? तो उस व्यक्ति उस पुरुष जिसकी मृत्यु हुई है वर्ग एक के वारिस उनकी पत्नी होती है। उसके बाद जो है यानी जिनको बोलते हैं कि उनकी पत्नी जो कि उनकी विधवा है उनका क्या होगा? अधिकार होगा कानूनी रूप से। उसके बाद जो है यानी पुत्र जो है उनका अधिकार बनता है। उसके बाद यहां पर जो पुत्री है उनका अधिकार बनता है और एक और अधिकार शामिल हो जाता है वर्ग एक में अगर वो जीवित हो और वो होती है उस व्यक्ति उस पुरुष की माता। Property Rule

अगर उस पुरुष की माता जीवित है तो कानूनी रूप से उस संपत्ति पर माता का भी अधिकार होगा। अब है कि वर्ग जो यहां पर एक है ना अगर उसका वारिस ठीक है। मान लेते हैं वर्ग जो वन है ना यह व्यक्ति का विवाह नहीं हुआ। यह व्यक्ति का यहां पर जो है विवाह विवाह नहीं हुआ। तो विवाह नहीं हुआ तो यहां पर जो है इस इसमें अगर देखा जाए तो इनका कौन-कौन नहीं है? यहां पर पत्नी नहीं है। विवाह ही नहीं हुआ तो पत्नी कहां से होगा? उसके बाद कौन बच्चे नहीं होंगे। यहां पर जो है ना बच्चे बच्चे नहीं होंगे। तो मां तो होगी। मां होगी। तो अब यहां पर वर्ग एक की अगर बात करें तो अब चले जाएंगे वर्ग दो में। Property Rule

तो अगर वर्ग एक के में नहीं है कोई उत्तराधिकारी तब वर्ग टू के जो वारिस हैं उनको क्या होगा कानूनी रूप से अधिकार मिलेगा और वर्ग टू के जो वारिस होंगे वो कौन होंगे पता है वो है पिता है ना वर्ग टू में आ जाएंगे पिता वर्ग टू में आ जाएंगे भाई वर्ग टू में आ जाएगी यहां पर क्या बहन इनकी संपत्ति है लेकिन इनका बहन का अधिकार होगा और वर्ग टू में इनके जो दादा हैं वो आ जाएंगे इनके जो दादी हैं वो आ जाएंगे ठीक है अगर इनके पोते हैं तो वो भी आएंगे। इनके अगर यहां पर पोतियां हैं। ठीक है? पोतियां तो वो भी आएंगी। ये सारे जो है ना वर्ग टू यानी क्या होता है? रिश्तेदार को मिलेगा संपत्ति अगर वर्ग एक में कोई भी वारिस मौजूद नहीं हो तभी ऐसा संभव है। तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की अगर बात करें उसका जो धारा यहां पर धारा आठ है ये आपके अधिकारों को तय करती है। Property Rule

यानी आपकी संपत्ति किसको मिले मिलेगा यह अधिकार तय होता है। संपत्ति का बंटवारा पहले हो चुका है। यह एक भाई का कहना है। एक बंटवारा पत्र भी बनाया गया था। इसलिए कि मामला तो चला गया कोर्ट में। मामला कोर्ट में चला गया। तब तो भाई स्टेटमेंट दे रहा है कि संपत्ति का बंटवारा तो पहले हो गया था। अब ये जो है जबरन 2007 में 1985 में हमारे पिता की मृत्यु हुई है। Property Rule

अब 2007 में हम बंटवारा करके सभी भाई जो है अलग-अलग हो गए हैं। अब ये आती है और कहती है मेरे मुझे मेरा हक चाहिए। तो एक बंटवारा पत्र भी यहां पर बनाया गया है। इसलिए अब बेटियों दावा जो है नहीं कर सकती है। तो अब यहां पर जो है ना कि अब आपको डायरेक्ट जो है एक तरह से सिविल कोर्ट का नहीं हाई कोर्ट का फैसला जो है वो बताते हैं कि मामला जब जैसे ही हाई कोर्ट में पहुंचता है ना तो कर्नाटक हाई कोर्ट में यह मामला चला गया। पहुंच गया। तो कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटियों का दावा जो है खारिज कर दिया। मतलब वो जो बेटी जो दावा की थी 2007 में 2007 में उनके द्वारा क्या किया गया था? Property Rule

दावा किया गया था। निचली अदालत में मामला हाई कोर्ट में पहुंचता है तो उनका बेटी का ही दावा क्या हो गया? खारिज हो गया। कहा कि पुराना बंटवारा हो चुका था। इसलिए अब बेटियां को हिस्सा नहीं मिल सकता है। पहले तो बंटवारा हो गया। तो ऐसे में तो कोई भी कभी भी जाकर हिस्सा मांगना शुरू कर देगा। आपने पहले अपना शेयर क्यों नहीं लिया?

इसका एक ठोस रीज़न आपको लिखित तौर पर देना होगा कि आखिर आपको आपका अधिकार जो है आप अपना अधिकार का दावा उस समय क्यों नहीं किए जिस समय भाई के द्वारा बंटवारा किया जा रहा था। पुराना बंटवारा हो चुका है। सभी का यहां पर दखल अलग-अलग है। सभी का यहां पर मकान अलग-अलग बना हुआ है। ऐसे सिचुएशन में आपका ये दावा जो है वो खारिज किया जाता है। तो यहां पर क्या हो गया? Property Rule

बेटियों को अधिकार दिया गया नहीं दिया गया। बेटियों के पक्ष में फैसला दिया गया नहीं दिया गया। तो अब ये जो सिचुएशन है ये जो कंडीशन है कि पिता की संपत्ति में आप कहते हैं नहीं बेटियों का अधिकार। तो यहां पर तो कर्नाटक हाई कोर्ट का जो फैसला है वो बेटी का दावा खारिज करता है। लेकिन अगर ये फिर आगे जाकर सुप्रीम कोर्ट में इनके द्वारा अगर अपील किया गया तब देखें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जो फैसला दिया गया वो यह कहा गया कि केवल बेटों के बीच किया गया बंटवारा बेटियों का अधिकार खत्म नहीं करता है। यदि पिता की मृत्यु बिना मुसीबत की हुई है तो बेटियां क्लास वन के उत्तराधिकारी हैं। वारिस हैं। क्लास वन में बेटी आती है। क्लास वन में बेटा भी आता है तो इसलिए बेटी को भी हक मिलेगा और बेटियों को भी बेटों के बराबर शेयर यहां पर मिलना चाहिए। पुराना पारिवारिक समझौता या विभाजन बेटियों के कानूनी उत्तराधिकार अधिकार को समाप्त नहीं करता है। अगर मान लेते हैं आपने पुराना बंटवारा कर दिया तो उसका मतलब कि यह नहीं हुआ कि आप बेटी का जो है अधिकार को समाप्त कर देंगे। Property Rule

अगर कानून उनको अधिकार दिया है। कानून के द्वारा अगर उनको जो है प्रथम श्रेणी वारिस में शामिल कर लिया गया है। ऐसे सिचुएशन में प्रथम श्रेणी वारिस जो है एक बेटा भी है और प्रथम श्रेणी वारिस एक बेटी भी है। दोनों को समान अधिकार मिलना तय है। तो उत्तराधिकार अधिकार को समाप्त जो है नहीं कर सकता। यहां पर कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश जो है रद्द कर दिया गया। यानी सुप्रीम कोर्ट में आप देख सकते हैं कि कर्नाटक हाईकोर्ट का जो फैसला है उसको रद्द कर दिया गया। मामला फिर से ट्रायल कोर्ट भेजा गया और साथ ही कहा गया कि संपत्ति की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव ना किया जाए। यानी संपत्ति का जो वर्तमान स्थिति है उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। सभी का कानूनी रूप से क्या होगा? यहां पर समान अधिकार जो है वो तय होगा। तो इसलिए यह बात समझना बेहद जरूरी है कि अगर जो संपत्ति है अगर आप उसका बंटवारा कर रहे हैं ना तो अगर यह जमीन है और आप जो है चाहते हैं कि यह जमीन में कभी विवाद नहीं हो तो इसका बेहतर सा तरीका है कि आप एक रजिस्टर्ड डीड तैयार कर लें और आपकी जो बहन है आपके घर की जो बेटी है अगर आप जो है एक तरह से उनका विवाह हो गया है तो आप उनसे संपत्ति एक रजिस्टर्ड डीड के तहत ले लें। Property Rule

मौखिक अगर आप ले भी लेंगे तो कल को अगर उनका एक तरह से आप कहेंगे कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। ऐसा तो इस केस में भी लग रहा था शुरुआती दौर में 1985 में जब पिता की मृत्यु हुई तब ऐसा लग रहा था भाइयों को कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। लेकिन हुआ तो इसलिए आपको यह सतर्क रहना समझना बेहद जरूरी है। और यह कंडीशन आपको भी समझ लेना बेहद जरूरी है कि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के अगर हुआ है और बेटियों को बंटवारे में शामिल नहीं किया गया तो बेटियां बाद में अपना हिस्सा जो है वो मांग सकती है। पुराने पारिवारिक बंटवारे चुनौती जो है दिए जा सकते हैं। बेटियों के अधिकार मजबूत एक तरह से हो गया है। ये जो फैसला ये जजमेंट है इससे हुआ क्या? बेटी का अधिकार मजबूत हो गया। पैतृक संपत्ति में समान अधिकार की पुष्टि हुई। महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार को न्यायिक सुरक्षा मिली है। अगर आज ये जो एक तरह से अगर देखा जाए ना आखिर आपके मन में सवाल तो चल रहा होगा कि आखिर ये जमीन है। ये जमीन है और यहां पर जो है आप कह सकते हैं यहां पर एक जो है मकान बना हुआ है। Property Rule

ये जमीन है और ये मकान है। इसमें बेटी को बहन को बुआ को अधिकार क्यों? देखें रीजन यह भी है कि अगर मान लेते हैं कि बेटी का विवाह हो जाता है। बेटी का जो है एक तरह से विवाह हो गया। विवाह हो गया और विवाह होने के बाद यहां पर बेटी का क्या हो गया? तलाक हो गया। किसी कारणवश जो है पति के द्वारा जो है छोड़ दिया गया। तलाक हो गया। तो तलाक हो गया तो यहां पर तलाक के लिए कंडीशन है। ये आपको जानना पड़ेगा। इसके लिए भी नियम कानून है। तो तलाक होने में जो भी अब संपत्ति तय होगा कोर्ट से वो एक तरह से दिया जाएगा कि आप खर्च करने के लिए फिलहाल तो पहले कानूनी प्रक्रिया चलेगा तो कोर्ट के द्वारा तय होगा कि कितना जो है इनको हर मंथ खर्च देना है या एक बार दे देना है। तो ये तलाक हो गया। तो अब यह तलाक हो गया तो यहां पर पिता का जो संपत्ति है वही कानूनी रूप से जो है एक तरह से आप हक प्राप्त कर सकते हैं। पति का जो संपत्ति है उसमें कोई शेयर डिवाइड नहीं किया गया है। तो पति तो अब घर से निकाल दिया तो अब संपत्ति में अब शेयर क्या लेंगे? तो यहां पर संपत्ति में हक़ किसका होगा? पिता की संपत्ति में। जमीन मकान जो भी है उसमें जो है आज ये बेटी कहां जाएगी? किस घर में रहेगी? ये तो कहेंगे कि ये तो पिता का घर है तो पिता का भी घर है। Property Rule

 पति का भी घर चला गया। पिता का भी घर चला गया। तो ये कहां जाकर रहेगी? तो कानून जो बनाया गया इसीलिए कि जहां पर उनका जन्म हुआ है ना यानी उनका वहां पर कानूनी अधिकार हमेशा बरकरार रहेगा। अगर मान लेते हैं बेटा हो बेटी हो जहां जन्म हुआ वहां पर कानूनी अधिकार कभी खत्म नहीं होने वाला है। और यह अधिकार कहां तय होता है? हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जो है यह कानून है और यह कानून में यह बात स्पष्ट कर दिया गया है कि एक बेटी का यानी एक पिता का जो संपत्ति है उसमें जन्म से अधिकार प्राप्त है और अगर जन्म से अधिकार प्राप्त है तो यह अधिकार यह कभी भी ले सकते हैं। जब इनको लगेगा कि नहीं मुझे जरूरत है इस संपत्ति की। वो अपने अधिकार का दावा कर सकते हैं। ऐसे में आपका पुराना पारिवारिक बंटवारा है उसको भी चुनौती दिया जा सकता है। वो बंटवारा भी टूट सकता है। Property Rule

अगर वो एक तरह से बहन के द्वारा बुआ के द्वारा दावेदारी की जाए तो वो अपना हक जो है वो प्राप्त कर सकती है। तो पिता की संपत्ति है तो उस पर कानूनी तौर पर बेटी का क्या होगा? समान अधिकार होगा। इससे बचने के लिए अब आप कहेंगे ये सब तो ठीक है। हम बचने के लिए जानना चाहते हैं कि हम क्या करें? फिलहाल तो हम आपको बता दें ऐसे सिचुएशन ऐसे कंडीशन में आपको जब भी आपको यह लगे कि आप पारिवारिक बंटवारा जो भविष्य में ऐसा कोई समस्या मेरे साथ उत्पन्न नहीं हो तो पुराना पारिवारिक बंटवारा या जब भी आप क्या करेंगे यहां पर पारिवारिक जो बंटवारा करेंगे पारिवारिक यहां पर जो बंटवारा तो वो पारिवारिक बंटवारा के समय जो है आप बहन का जो शेयर बनता है यहां पर बहन का हक जो बनता है इसको आप क्या करेंगे एक तरह से जमीन को रजिस्टर्ड डीड पर यहां पर आपको लिखा लेना है। Property Rule तो इससे क्या होगा कि अगर आप ऐसा कर लिए तो यह हो गया कि इनके द्वारा हक त्याग कर दिया गया। अगर इनके द्वारा हक त्याग कर दिया गया तो ये दोबारा क्या कर सकते हैं? हक का दावा नहीं कर सकते हैं। तो यही है हमारा कानून।

Follow UdaipurTimes on Facebook , Instagram , and Google News