पुश्तैनी या खेती की जमीन बेचकर खाते में आए पैसों पर कितना लगेगा टैक्स ? जाने पूरा हिसाब

 | 
पुश्तैनी या खेती की जमीन बेचकर खाते में आए पैसों पर कितना लगेगा टैक्स ? जाने पूरा हिसाब 

Udaipur Times, New Delhi : अगर आपके पास गांव में पुश्तैनी या खेती की जमीन है और आपने उसे बेचकर खाते में लाखों रुपये हासिल किए हैं, तो यह मान लेना सही नहीं होगा कि जमीन बेचने से मिली पूरी रकम टैक्स फ्री है। कृषि भूमि की बिक्री पर इनकम टैक्स लगेगा या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी जमीन ग्रामीण कृषि भूमि है या शहरी कृषि भूमि।

कई लोग सिर्फ इसलिए कृषि जमीन की बिक्री को टैक्स फ्री मान लेते हैं क्योंकि उस जमीन पर खेती होती है। लेकिन इनकम टैक्स के नियमों में जमीन की लोकेशन और नगरपालिका या कैंटोनमेंट बोर्ड से उसकी दूरी जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए जमीन बेचने के बाद टैक्स का हिसाब लगाने से पहले उसकी कैटेगरी समझना बेहद जरूरी है।

 नहीं लगता टैक्स

इनकम टैक्स कानून के तहत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाली ग्रामीण कृषि भूमि (Rural Agricultural Land) को सामान्य तौर पर कैपिटल एसेट नहीं माना जाता। इसका मतलब है कि अगर आपकी जमीन वास्तव में ग्रामीण कृषि भूमि की श्रेणी में आती है, तो उसे बेचने से होने वाला कैपिटल गेन आम तौर पर इनकम टैक्स के दायरे में नहीं आता।

यही वजह है कि गांव में जमीन बेचने वाले व्यक्ति के लिए सबसे पहला सवाल यह होना चाहिए कि उसकी जमीन इनकम टैक्स कानून के अनुसार ग्रामीण कृषि भूमि की परिभाषा में आती है या नहीं।

सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का कृषि भूमि होना ही हर स्थिति में पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जमीन की लोकेशन और संबंधित नियमों को भी देखना जरूरी होता है।

शहर के पास मौजूद कृषि जमीन पर लग सकता है टैक्स

अगर आपकी जमीन किसी शहर, नगरपालिका या कैंटोनमेंट बोर्ड के आसपास स्थित है, तो मामला बदल सकता है। ऐसी जमीन को केवल इसलिए टैक्स फ्री नहीं माना जा सकता कि उस पर खेती की जाती है।

इनकम टैक्स नियमों के तहत नगरपालिका या कैंटोनमेंट बोर्ड की सीमा और जमीन की दूरी के आधार पर कृषि भूमि की स्थिति तय की जाती है। कुछ परिस्थितियों में 2 किलोमीटर, 6 किलोमीटर और 8 किलोमीटर जैसी दूरी की सीमाएं लागू हो सकती हैं, जो संबंधित नगरपालिका या कैंटोनमेंट बोर्ड की आबादी पर निर्भर करती हैं।

इसलिए अगर जमीन शहर के आसपास है और उसे बेचकर बड़ी रकम मिली है, तो बिक्री से पहले यह जांचना जरूरी है कि वह ग्रामीण कृषि भूमि है या टैक्सेबल कैपिटल एसेट।

जमीन रु1 करोड़ में बेची तो पूरे रु1 करोड़ पर नहीं लगेगा कैपिटल गेन टैक्स

यहां एक और बड़ी गलतफहमी दूर करना जरूरी है। मान लीजिए आपकी जमीन टैक्सेबल कैपिटल एसेट की श्रेणी में आती है और आपने उसे रु 1 करोड़ में बेचा। इसका मतलब यह नहीं है कि रु1 करोड़ की पूरी रकम पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा।

कैपिटल गेन की गणना सामान्य तौर पर जमीन की बिक्री कीमत और उसकी लागत के बीच बने लाभ के आधार पर होती है। जमीन खरीदने में लगी लागत, बिक्री से जुड़े योग्य खर्च और जमीन कितने समय तक आपके पास रही, जैसे पहलुओं का हिसाब लगाया जाता है।
उदाहरण के तौर पर अगर किसी जमीन की बिक्री कीमत रु1 करोड़ है और उसकी मान्य लागत व संबंधित खर्च घटाने के बाद वास्तविक लाभ काफी कम बनता है, तो टैक्स की गणना उस कैपिटल गेन के आधार पर होगी, न कि सीधे रु1 करोड़ पर।

जमीन कितने साल पुरानी है, यह भी बेहद महत्वपूर्ण

अगर कृषि भूमि टैक्सेबल कैपिटल एसेट की श्रेणी में आती है तो अगला महत्वपूर्ण सवाल उसके होल्डिंग पीरियड का होता है।

मौजूदा नियमों के अनुसार, जमीन को 24 महीने तक रखने पर बिक्री से होने वाला लाभ शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन की श्रेणी में आ सकता है। वहीं 24 महीने से ज्यादा समय तक रखी गई जमीन की बिक्री से होने वाला लाभ लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के रूप में देखा जा सकता है।

लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के मामले में मौजूदा नियमों के तहत सामान्य तौर पर 12.5% बिना इंडेक्सेशन की व्यवस्था लागू है। वहीं कुछ पुराने अधिग्रहण वाली संपत्तियों के लिए पात्र करदाताओं को 20% इंडेक्सेशन के साथ पुरानी व्यवस्था चुनने का विकल्प उपलब्ध हो सकता है। इसलिए जमीन कब खरीदी गई थी, यह जानकारी भी टैक्स कैलकुलेशन में महत्वपूर्ण हो सकती है।

पुश्तैनी जमीन बेचने पर क्या है नियम ?

पुश्तैनी या विरासत में मिली जमीन बेचने वाले लोगों के लिए भी कई सवाल होते हैं। अक्सर लोग सोचते हैं कि चूंकि उन्होंने जमीन खरीदी नहीं थी, इसलिए उसे बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगेगा। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है।

अगर विरासत में मिली जमीन टैक्सेबल कैपिटल एसेट की श्रेणी में आती है, तो उसकी बिक्री पर कैपिटल गेन की गणना की जा सकती है। ऐसे मामलों में पुराने मालिक से जुड़ी जमीन की लागत और होल्डिंग पीरियड जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है। विरासत में मिली संपत्ति के मामले में जमीन की पुरानी खरीद की जानकारी, दस्तावेज और विरासत से जुड़े कागजात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सेक्शन 54F से मिल सकती है राहत

अगर जमीन की बिक्री से लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन बनता है तो कुछ परिस्थितियों में इनकम टैक्स कानून के सेक्शन 54F के तहत टैक्स राहत का लाभ लिया जा सकता है। हालांकि इसकी पात्रता कई शर्तों पर निर्भर करती है। इसलिए जमीन बेचने के बाद टैक्स बचाने के लिए कोई निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति और संपत्ति सेक्शन 54F की सभी शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं।

जमीन बेचने से पहले इन दस्तावेजों को रखें तैयार

कृषि जमीन बेचने वालों को बिक्री से पहले जमीन से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज संभालकर रखने चाहिए। इनमें पुरानी खरीद से जुड़े कागजात, सेल डीड, जमीन का रिकॉर्ड, विरासत के दस्तावेज और बिक्री से जुड़े खर्चों के प्रमाण शामिल हो सकते हैं।

खास तौर पर पुश्तैनी जमीन के मामले में पुराने मालिक से जुड़ी जानकारी और संपत्ति आपको किस तरह विरासत में मिली, इसका रिकॉर्ड रखना आगे टैक्स कैलकुलेशन में मदद कर सकता है।

सबसे पहले पता करें जमीन ग्रामीण है या शहरी

कृषि जमीन बेचने के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ जमीन पर खेती होने के आधार पर उसे टैक्स फ्री न मानें। पहले उसकी लोकेशन और इनकम टैक्स कानून के तहत उसकी कैटेगरी की जांच करें।

अगर जमीन ग्रामीण कृषि भूमि की निर्धारित शर्तें पूरी करती है तो सामान्य तौर पर कैपिटल गेन टैक्स का सवाल नहीं उठता। लेकिन अगर जमीन शहरी कृषि भूमि या अन्य टैक्सेबल कैपिटल एसेट की श्रेणी में आती है तो बिक्री से होने वाले लाभ पर टैक्स देनदारी बन सकती है।बड़ी रकम की जमीन बेचने के मामले में अंतिम टैक्स कैलकुलेशन कराने से पहले किसी योग्य टैक्स एक्सपर्ट या चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेना बेहतर रहेगा, क्योंकि जमीन की लोकेशन, खरीद का समय, लागत और बिक्री की परिस्थितियों के आधार पर टैक्स देनदारी अलग-अलग हो सकती है।

Follow UdaipurTimes on Facebook , Instagram , and Google News