हरियाणा के 76 शहरों में अवैध कॉलोनियों पर लगेगी रोक ! अब पहले सड़क, पानी और सीवरेज और फिर मिलेगी मंजूरी

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हरियाणा के 76 शहरों में अवैध कॉलोनियों पर लगेगी रोक ! अब पहले सड़क, पानी और सीवरेज और फिर मिलेगी मंजूरी

Udaipur Times, Haryana News, चंडीगढ़ : हरियाणा सरकार ने छोटे शहरों के नियोजित विकास की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए प्रदेश की 76 नगर परिषदों और नगर पालिकाओं के लिए पहली बार अलग टाउन प्लानिंग नीति लागू कर दी है। नई व्यवस्था के तहत अब बिना सड़क, पेयजल, सीवरेज, वर्षा जल निकासी, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था किए किसी भी नई कॉलोनी को लाइसेंस नहीं मिलेगा। सरकार का मानना है कि इस नीति से वर्षों से चली आ रही अवैध कॉलोनियों की समस्या पर प्रभावी अंकुश लगेगा और छोटे शहरों में योजनाबद्ध शहरी विकास को बढ़ावा मिलेगा।

अब तक छोटे शहरों में अक्सर पहले खेतों में प्लॉट काट दिए जाते थे, फिर कॉलोनियां बस जाती थीं और उसके बाद सड़क, पानी, सीवरेज व अन्य सुविधाओं के लिए लोग सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाते थे। कई कॉलोनियां अवैध घोषित होती रहीं और बाद में उन्हें नियमित करने के लिए सरकारों को अलग-अलग नीतियां बनानी पड़ती थीं। नई नीति इसी व्यवस्था को बदलने का प्रयास है। अब पहले आधारभूत ढांचा विकसित होगा और उसके बाद ही कॉलोनी को लाइसेंस मिलेगा।

यह नीति नगर परिषद और नगर पालिका क्षेत्रों में अनियोजित शहरी विकास पर प्रभावी रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब कॉलोनी विकास को स्पष्ट नियमों, बुनियादी सुविधाओं और डेवलपर की जवाबदेही से जोड़ा गया है। इससे किफायती आवास को बढ़ावा मिलेगा, अवैध कॉलोनियों की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा और छोटे शहरों में टिकाऊ एवं योजनाबद्ध शहरी विकास का नया मॉडल स्थापित होगा। -विपुल गोयल, शहरी स्थानीय निकाय मंत्री।

पूरी कॉलोनी विकसित करनी होगी

नीति के अनुसार कॉलोनी विकसित करने के लिए कम से कम पांच एकड़ भूमि होना अनिवार्य होगा। परियोजना तक कम से कम 33 फुट चौड़ी संपर्क सड़क होनी चाहिए, जबकि कॉलोनियों के भीतर सभी सड़कें कम से कम 10 मीटर चौड़ी बनाई जाएंगी। कॉलोनी का लेआउट, पार्क, सार्वजनिक स्थान और अन्य बुनियादी ढांचा स्वीकृत योजना के अनुरूप विकसित करना होगा। इससे डेवलपर केवल प्लॉट बेचकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकेंगे।

पहले सड़क-पानी, फिर बसेंगे लोग

बनाई व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं को सीधे लाइसेंस से जोड़ दिया गया है। डेवलपर को पेयजल, सीवरेज, वर्षा जल निकासी और अन्य शहरी सुविधाओं की व्यवस्था स्वयं करनी होगी। जहां जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग का सीवर नेटवर्क उपलब्ध नहीं होगा, वहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित करना अनिवार्य होगा। यानी अधूरी सुविधाओं वाली कॉलोनियों को मंजूरी नहीं मिलेगी और बाद में सरकार पर विकास कार्यों का बोझ भी नहीं पड़ेगा।

लाइसेंस और शुल्क का भी तय हुआ ढांचा

सरकार ने पहली बार लाइसेंस और शुल्क व्यवस्था को भी स्पष्ट किया है। डेवलपर को 10 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर से स्क्रूटनी फीस जमा करनी होगी। इसके अलावा लाइक परिवर्तन शुल्क का 50 प्रतिशत और बाह्य विकास शुल्क (ईडीसी) का 25 प्रतिशत विकास शुल्क के रूप में देना होगा। लाइसेंस शुल्क भी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की मौजूदा दरों के 25 प्रतिशत के आधार पर तय किया गया है, जिससे पूरे प्रदेश में एक समान व्यवस्था लागू होगी।

छोटे शहरों के लिए अलग योजना

अब तक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग की लाइसेंस प्रणाली मुख्य रूप से बड़े शहरों और नियंत्रित क्षेत्रों तक सीमित थी। नगर परिषद और नगर पालिका क्षेत्रों में स्पष्ट नियामक व्यवस्था नहीं होने से अनियोजित कॉलोनियां लगातार विकसित होती रही हैं। नई नीति पहली बार इस कमी को दूर करेगी। अब इन 76 शहरों में निजी डेवलपर को कॉलोनी विकसित करने से पहले सरकारी लाइसेंस लेना होगा और सभी निर्धारित मानकों का पालन करना होगा।

किफायती आवास को भी मिलेगा बढ़ावा

मध्यम और निम्न आय वर्ग को ध्यान में रखते हुए नीति में किफायती आवास को भी विशेष स्थान दिया गया है। कुल विकसित प्लॉटों में कम से कम 50 प्रतिशत प्लॉट 150 वर्गमीटर या उससे कम आकार के रखना अनिवार्य होगा। वहीं परियोजना क्षेत्र का अधिकतम 65 प्रतिशत हिस्सा आवासीय और व्यावसायिक उपयोग के रखा जा सकेगा, जबकि व्यावसायिक गतिविधियों की सीमा पांच प्रतिशत निर्धारित की गई है।

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