देश का पहला बुजुर्गों की देखभाल से जुड़ा बिल हुआ पेश, नियम तोड़ने पर 'तीन साल तक की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माना'

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देश का पहला बुजुर्गों की देखभाल से जुड़ा बिल हुआ पेश, नियम तोड़ने पर 'तीन साल तक की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माना'

Udaipur Times, Keralam introduces country’s first elderly care Bill : मंगलवार (13 अक्टूबर) को केरल सरकार ने विधानसभा में 'केरल वरिष्ठ नागरिक (देखभाल और अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, 2026' पेश किया। अगर यह विधेयक पास हो जाता है, तो इससे बुजुर्गों की देखभाल की सुविधाओं और सेवाओं को रेगुलेट करने के लिए एक ढांचा तैयार होगा। इसमें देखभाल केंद्रों और देखभाल करने वालों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, तय मानक और नियमों के उल्लंघन पर सज़ा का प्रावधान होगा।

केरल उन शुरुआती राज्यों में से एक था जिसने 2006 में बुजुर्गों की देखभाल के लिए पॉलिसी शुरू की थी। राज्य ने 2013 में इस पॉलिसी को अपडेट किया और अगस्त 2025 में बुजुर्गों के लिए एक नई राज्य पॉलिसी का ड्राफ्ट जारी किया। इसमें तेज़ी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक व्यापक योजना का प्रस्ताव दिया गया है। राज्य ने 'केरल राज्य वरिष्ठ नागरिक आयोग अधिनियम, 2025' भी लागू किया है और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए एक अलग विभाग भी बनाया है।

केरल देश में सबसे तेज़ी से बदलते डेमोग्राफिक बदलावों (जनसांख्यिकीय बदलावों) का सामना कर रहा है। जन्म दर और मृत्यु दर में कमी के कारण बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है। 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट' के अनुसार, 2011 में राज्य की आबादी में 60 साल और उससे ज़्यादा उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 12.7% थी, जो 2021 में बढ़कर 15% हो गई। अनुमान है कि 2051 तक यह हिस्सेदारी 30% तक पहुँच जाएगी और 2030 तक बुजुर्गों की आबादी बच्चों की आबादी से ज़्यादा हो जाएगी।

इस विधेयक की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

अपनी जगह पर ही बुढ़ापा बिताना (Ageing in place)

इस विधेयक की एक मुख्य बात "अपनी जगह पर ही बुढ़ापा बिताना" (ageing in place) है। यह वरिष्ठ नागरिकों की उस क्षमता को मान्यता देता है जिसके तहत वे अपनी आय या क्षमता की परवाह किए बिना, अपने घर या अपनी पसंद के समुदाय में सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से रह सकते हैं। विधेयक का मकसद वरिष्ठ नागरिकों को उनके अपने घरों में रहने में मदद करना है, जहाँ परिवार के सदस्यों या कानूनी उत्तराधिकारियों से ज़रूरी देखभाल की उम्मीद की जाती है। संस्थागत देखभाल (जैसे ओल्ड एज होम) को आखिरी विकल्प के तौर पर देखा गया है।

लिविंग विल (Living will) को मान्यता

'लिविंग विल' में वरिष्ठ नागरिक की मेडिकल देखभाल से जुड़ी पसंद बताई जाती है, ताकि अगर वे अपनी इच्छा बताने में असमर्थ हो जाएँ, तो उसका पालन किया जा सके। इसमें इंटेंसिव केयर (ICU) में भर्ती होने, इनवेसिव ट्यूब (शरीर के अंदर डाली जाने वाली ट्यूब) और जीवन बचाने वाली अन्य मेडिकल प्रक्रियाओं के बारे में पसंद बताई जा सकती है। 

कोई सीनियर सिटिज़न, ज़िला-स्तरीय सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन फ़ोरम या ज़िला-स्तरीय सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन यूनिट के चेयरपर्सन की मौजूदगी में 'लिविंग विल' (living will) बना सकता है। इसे बनवाने में मदद करने की ज़िम्मेदारी सीनियर सिटिज़न केयर सेंटर, कानूनी वारिस या रिश्तेदार की होगी। इस वसीयत को केयर सेंटर, रिश्तेदार या परिवार के सदस्य के पास सुरक्षित रखा जाना चाहिए और इसकी एक कॉपी संबंधित ज़िला-स्तरीय अथॉरिटी और स्थानीय निकाय को दी जानी चाहिए।

अधिकार, सेवाएं और बुज़ुर्गों के अनुकूल माहौल

यह बिल देखभाल और कल्याण के दायरे को भोजन, कपड़े, आवास और इलाज से आगे बढ़ाकर सामाजिक सेवाओं, मनोरंजन और आध्यात्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी तक ले जाता है। यह आराम और सम्मानजनक जीवन पर ज़ोर देता है, खासकर उन बुज़ुर्गों के लिए जो अक्षम हैं या जिन्हें कोई विकलांगता है।

इस बिल का मकसद होम केयर, डे केयर, असिस्टेड लिविंग, हॉस्पिस केयर और इमरजेंसी मेडिकल सहायता को सस्ता, आसानी से उपलब्ध और भेदभाव-मुक्त बनाना है। यह कमज़ोर वर्ग की बुज़ुर्ग महिलाओं को प्राथमिकता देता है, जिनमें विधवाएँ, बेसहारा लोग, विकलांग व्यक्ति, हिंसा की शिकार महिलाएँ और बेघर या ज़रूरतमंद महिलाएँ शामिल हैं। सार्वजनिक जगहों को बुज़ुर्गों के अनुकूल बनाने के प्रस्तावित उपायों में रैंप, प्राथमिकता वाली सीटिंग और लाइनें, और आसानी से इस्तेमाल होने वाले वॉशरूम शामिल हैं।

दुर्व्यवहार, शोषण और साइबर धोखाधड़ी से व्यापक सुरक्षा

दुर्व्यवहार की परिभाषा में शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, मौखिक, यौन और आर्थिक दुर्व्यवहार के साथ-साथ ज़बरदस्ती नियंत्रण, विश्वासघात और ज़रूरी चीज़ों व सेवाओं से वंचित करना शामिल है। शोषण में बुज़ुर्ग नागरिक के संसाधनों, पहचान, साख, प्रतिष्ठा या संपत्ति का गैर-कानूनी, बिना मंज़ूरी के या धोखाधड़ी से इस्तेमाल करना शामिल है, जिसमें आर्थिक शोषण भी आता है। बिल में "साइबर धोखाधड़ी" को किसी बुज़ुर्ग नागरिक को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, ऑनलाइन या अन्य तकनीकी साधनों के ज़रिए पूरी तरह या आंशिक रूप से किए गए किसी भी काम के तौर पर परिभाषित किया गया है। इसमें ऑनलाइन बैंकिंग या वित्तीय धोखाधड़ी, पहचान की चोरी (आइडेंटिटी थेफ्ट) और उन्हें धोखा देने या ठगने के लिए AI-जनरेटेड कंटेंट का इस्तेमाल शामिल है।

इस प्रावधान का मकसद पीड़ितों के लिए तालमेल और सहायता को आसान बनाना है। यह इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के खिलाफ कोई नया अपराध, जाँच की शक्ति या प्रक्रिया नहीं बनाता है। उस एक्ट या भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत मुकदमा चलाने की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

देखभाल केंद्रों और देखभाल करने वालों का नियम

बिल में देखभाल केंद्रों, रिटायरमेंट होम, हॉस्पिस, एजेंसियों और देखभाल करने वालों के ट्रेनिंग सेंटरों के नियमन का प्रावधान है। इन संस्थानों को तय मानकों को पूरा करना होगा, सामाजिक और मनोरंजक गतिविधियों के मौके देने होंगे, और वहाँ रहने वालों को दुर्व्यवहार और शोषण से बचाना होगा।

बुज़ुर्गों की देखभाल करने वाले सभी तरह के केंद्रों के लिए रजिस्ट्रेशन ज़रूरी होगा। सीनियर सिटिज़न विभाग के डायरेक्टर रजिस्ट्रार के तौर पर काम करेंगे। देखभाल करने वालों को स्टेट सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन यूनिट के पास रजिस्टर करना होगा। एक पब्लिक रजिस्टर में हर सर्टिफाइड केयरगिवर का नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर, सर्टिफिकेशन कैटेगरी, वैलिडिटी और मौजूदा स्टेटस की जानकारी होगी। यह बिल केयरगिवर्स को सही वेतन, काम करने की सुरक्षित जगह और सोशल सिक्योरिटी का अधिकार भी देता है।

यह बिल केयरगिवर्स के लिए अलग-अलग लेवल का सर्टिफिकेशन शुरू करने के लिए 'केरल जेरिएट्रिक केयर सर्टिफिकेशन फ्रेमवर्क' का प्रस्ताव करता है। यह फ्रेमवर्क ट्रेनिंग का सिलेबस तय करेगा और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन की ज़रूरत बताएगा। इसमें सीनियर सिटिज़न केयर सेंटर में काम करने वाले या अकेले रहने वाले सीनियर सिटिज़न की देखभाल (लाइव-इन केयर) करने वाले केयरगिवर्स के लिए पुलिस क्लीयरेंस ज़रूरी होगा। केयरगिवर्स को हर तीन साल में रिफ्रेशर ट्रेनिंग भी लेनी होगी।

सुरक्षा के उपाय और फंडिंग

यह बिल 'स्टेट सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन यूनिट', ज़िला स्तर पर 'सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन फोरम' और 'सीनियर सिटिज़न प्रोटेक्शन यूनिट', केयर-सेंटर रजिस्ट्रेशन के लिए एक रजिस्ट्रार, और पुलिस स्टेशन, ज़िला और राज्य स्तर पर सीनियर सिटिज़न के लिए पुलिस नोडल अधिकारियों का प्रस्ताव करता है। ज़िला-स्तरीय यूनिट शिकायतें देखेंगी, केयर सेंटरों के कामकाज की जांच करेंगी, सुविधाओं का निरीक्षण करेंगी और ज़रूरी कार्रवाई करेंगी। यह बिल सीनियर सिटिज़न के कल्याण के लिए 'स्टेट रिज़र्व फंड' का भी प्रस्ताव करता है।

 इसके लिए सरकारी ग्रांट, स्थानीय निकायों, फीस, जुर्माने, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी फंड और दान से पैसा जुटाया जाएगा। इस फंड का इस्तेमाल सिर्फ़ सीनियर सिटिज़न की देखभाल, कल्याण, सुरक्षा और सोशल सिक्योरिटी के लिए किया जाएगा। यह सीनियर सिटिज़न केयर सेंटर में रहने वालों को अपनी मर्ज़ी से अपनी प्रॉपर्टी, बैंक फंड या दूसरी इनकम सेंटर, स्टेट रिज़र्व फंड या किसी और पार्टी को दान करने की भी इजाज़त देता है।

नियम तोड़ने पर सज़ा

बिना रजिस्ट्रेशन के केयर सेंटर चलाने पर एक साल तक की जेल, 25,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। कानून को लागू करने में रुकावट डालने पर दो साल तक की जेल और 25,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। वहां रहने वाले व्यक्ति की प्रॉपर्टी पर गैर-कानूनी कब्ज़ा, दुर्व्यवहार या क्रूरता और उन्हें बेसहारा छोड़ देने पर तीन साल तक की जेल और 50,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। 

ज़रूरत पड़ने पर शक होने वाले दुर्व्यवहार की रिपोर्ट न करने पर 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इस बिल के तहत अपराध कॉग्निज़ेबल (पुलिस बिना वारंट के गिरफ़्तार कर सकती है) और बेलेबल (ज़मानत मिल सकती है) हैं।

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