जीवंता हॉस्पिटल ने 400 ग्राम के शिशु को जीवनदान देकर रचा इतिहास
उदयपुर के जीवंता हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिणी एशिया में अब तक की सबसे छोटी व सबसे कम वजनी मात्र 400 ग्राम की नन्ही बिटिया को जीवनदान देकर मानवता के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। अब यह नन्ही बिटिया 7 महीनों तक जीवन और मौत के बीच चले लम्बे संघर्ष के बाद मानवता की मिसाल बनकर नई उम्मीदें लिए अपने घर जा रही है।
उदयपुर के जीवंता हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिणी एशिया में अब तक की सबसे छोटी व सबसे कम वजनी मात्र 400 ग्राम की नन्ही बिटिया को जीवनदान देकर मानवता के इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। अब यह नन्ही बिटिया 7 महीनों तक जीवन और मौत के बीच चले लम्बे संघर्ष के बाद मानवता की मिसाल बनकर नई उम्मीदें लिए अपने घर जा रही है।
जीवंता चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. सुनील जांगिड ने बताया कि नन्ही बिटिया के जीवन की संघर्ष गाथा अनूठी है। कोटा निवासी सीता गिरिराज नामक दम्पती को शादी के 35 वर्षों बाद मां बनने का सौभाग्य मिला लेकिन इस दौरान उनका ब्लड प्रेशर बेकाबू हो गया। सोनोग्राफी करवाने पर पता चला कि भ्रूण में रक्त का प्रवाह बंद हो गया है। तभी आपात परिस्थिति में सीजेरियन ऑपरेशन से शिशु का जन्म 15 जून, 2017 को करवाया गया। जब नन्ही बिटिया दुनिया में आई तब उसका वजन मात्र 400 ग्राम था। जन्म के बाद वह खुद सांस तक नहीं ले पा रही थी। शरीर नीला पड रहा था। शिशु को जन्म के तुरंत बाद जीवन्ता हॉस्पिटल, उदयपुर की नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई में शिफ्ट किया गया जहाँ नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ सुनील जांगिड, डॉ निखिलेश नैन एवं उनकी टीम के द्वारा शिशु का विशेष निगरानी में उपचार शुरू हुआ।
डॉ. सुनील जांगिड ने बताया की इतने कम वजन के शिशु को बचाना हमारी टीम के लिए बहुत बडी चुनौती थी। अब तक भारत एवं पूरे दक्षिण एशिया में इतने कम वजनी शिशु के अस्तित्व की कोई रिपोर्ट नहीं है। इससे पहले भारत में अब तक 450 ग्राम वजनी शिशु का मोहाली चंडीगढ में सन 2012 में इलाज हुआ था। बहरहाल, इस नन्ही बिटिया को तुरंत वेंटीलेटर पर लिया गया। प्रारंभिक दिनों में शिशु की नाजुक त्वचा से शरीर के पानी का वाष्पीकरण होने से उसका वजन 360 ग्राम तक के स्तर पर आ गया। पेट की आंतें अपरिपक्व एवं कमजोर होने के कारण दूध का पचना संभव नहीं हो रहा था। इस स्थिति में शिशु के पोषण के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व जैसे ग्लूकोज, प्रोटीन्स और वसा उसे नसों द्वारा ही दिए गए।
धीरे-धीरे बून्द-बून्द दूध, नली के द्वारा दिया गया मगर शिशु को दूध पचाने में बार-बार परेशानी हो रही थी, इससे उसका पेट फूल जाता। सात हफ्तों बाद शिशु पूरा दूध पचाने में सक्षम हुआ और साढे 4 महीने के बाद मुंह से दूध लेने लगा। शिशु को कोई संक्रमण न हो इसका विशेष ध्यान रखा गया। शुरूआती दिनों में श्वसन प्रणाली एवं मस्तिष्क की अपरिपक्वता के कारण, शिशु सांस लेना भूल जाता था। ऐसे में उसे कृत्रिम सांस की जरूरत पडती थी। शिशु को 4 बार खून भी चढाया गया। शिशु की 210 दिनों तक गहन चिकित्सा इकाई में विशेष देखरेख की गई। नियमित रूप से मस्तिष्क एवं ह्रदय की सोनोग्राफी भी की गयी जिससे आतंरिक रक्तस्त्राव तो नहीं हो रहा है को सुनिश्चित किया गया। आंखों की नियमित रूप से जांच की गई। आज 7 महीने की कठिन मेहनत के बाद इस लाडली बिटिया का वजन 2400 ग्राम हो गया है, और अब यह पूरी तरह से स्वस्थ है। जीवन्ता हॉस्पिटल की टीम और बच्ची के माता पिता आज बहुत खुश हैं कि इतनी बडी कामयाबी मिली है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। जीवन्ता नर्सिंग स्टाफ के अनुसार यह नन्ही सी परी बहुत ही सुन्दर है। इसका नाम मानुषी रखा है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
सीनियर प्रोफेसर निओनेटोलॉजी भारती यूनिवर्सिटी पुणे, डॉ. प्रदीप सूर्यवंशी ने बताया कि इतने कम कम दिन के बच्चे का शारीरिक सर्वांगीण विकास पूरा हुआ नहीं होता है। शिशु के फेफडे , दिल, पेट की आतें , लीवर, किडनी, दिमाग, आंखें, त्वचा आदि सभी अवयव अपरिपक्व, कमजोर एवं नाजुक होते हैं और इलाज के दौरान काफी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। हमेशा आप को एक नाजुक सी डोर पे चलना होता है जहां कभी-कभी सारी कोशिशों के बाद भी सफलता नहीं मिल पाती। हल्की सी आवाज, हलचल या जरा सी भी ज्यादा दवाई की मात्रा से ऐसे शिशु के दिमाग में रक्तस्त्राव होने का खतरा होता है। बेहतरीन इलाज के बावजूद भी केवल 0.5 प्रतिशत शिशु ही मस्तिष्क क्षति के बिना जीवित रहते है।
डॉ अजय गंभीर, पूर्व नेशनल प्रेजिडेंट राष्ट्रीय नवजात स्वास्थ्य संघटन ने कहा कि हम सीता और उसके परिवार का आभार व्यक्त करते हैं और सराहना करते है कि उन्होंने पूरी मानवता के सामने नया उदाहरण पेश किया। जहां पर राजस्थान में आज भी लडकियों को बोझ समझा जाता है, जन्म के तुरंत बाद कूडे में फेंक दिया जाता है या अनाथाश्रम में छोड दिया जाता है वहां दम्पती ने ऐसे बच्ची का पूरा इलाज कराया जिसके बचने की संभावना नहीं के बराबर थी और आज वही बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ है और अपने घर जा रही है ।
डॉ. एस के टाक ने बताया की आजकल नवीनतम अत्याधुनिक तकनीक, अनुभवी नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर्स व प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की टीम से 500 से 600 ग्राम के प्री-मैचुअर शिशु का बचना भी सम्भव हो चुका है। जीवन्ता हॉस्पिटल ने पिछले 3 साल में कई 6 मासी गर्भावस्था एव 500 से 600 ग्राम के बच्चों का सफल उपचार किया है।
