उदयपुर में बढ़ता पैंथर संकट! जंगलों से शहरों तक क्यों पहुंच रहे तेंदुए?

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Udaipur Times, Wildlife News: 23 मई 2026। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर ग्रीन पीपल सोसायटी एवं वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में वन भवन में गोष्ठी एवं प्रेजेंटेशन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पर्यावरणविदों, वन अधिकारियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जैव विविधता संरक्षण, घटती वन्यजीव विविधता तथा बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

कार्यक्रम में यूनिसेफ इंडिया के भूतपूर्व पर्यावरण विशेषज्ञ एस. एन. दवे ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से जैव विविधता की महत्ता और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर मौजूद पेड़-पौधे, वन्यजीव, सूक्ष्मजीव और संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक कड़ी के टूटने से पूरा पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ सकता है।

बढ़ती पेंथर आबादी बन रही चिंता का कारण

संगोष्ठी में उदयपुर क्षेत्र में तेजी से बढ़ती पेंथर आबादी और घटती फॉनल डाइवर्सिटी (वन्यजीव विविधता) को लेकर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि अरावली क्षेत्र में फ्लोरल डाइवर्सिटी यानी वनस्पति विविधता तो अब भी दिखाई देती है, लेकिन शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या लगातार घट रही है। परिणामस्वरूप पेंथर भोजन की तलाश में गांवों, ढाणियों और शहरों की सीमाओं तक पहुंचने लगे हैं।

वरिष्ठ वन अधिकारियों एवं पर्यावरणविदों ने बताया कि आज तेंदुए “प्राकृतिक जंगल तंत्र” पर नहीं, बल्कि “मानव-आधारित खाद्य स्रोतों” पर निर्भर होने लगे हैं। यही कारण है कि ग्रामीण एवं अर्धशहरी क्षेत्रों में पेंथर का दिखाई देना सामान्य घटना बनती जा रही है। मवेशियों पर हमले बढ़ रहे हैं और कई स्थानों पर मानव जीवन भी खतरे में आया है।

“केवल पेड़ पर्याप्त नहीं, शिकार प्रजातियां भी जरूरी”

पर्यावरणविद प्रो. महेश शर्मा ने कहा कि यदि जंगलों में चीतल, सांभर, खरगोश, जंगली सूअर और अन्य शिकार प्रजातियां नहीं बचेंगी, तो शीर्ष शिकारी पेंथर प्राकृतिक रूप से गांवों और शहरों की ओर आएंगे। उन्होंने बताया कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जिले में पिछले वर्ष करीब 130 तेंदुए दर्ज किए गए थे, जबकि कई सेवानिवृत्त वन अधिकारी यह संख्या 700 से 1000 तक मानते हैं।

उन्होंने कहा कि एक तेंदुए को वर्षभर में औसतन 40 से 50 बड़े शिकार की आवश्यकता होती है, जबकि उदयपुर के जंगलों में उपलब्ध शिकार प्रजातियां सीमित हो चुकी हैं। ऐसे में बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष को केवल वन विभाग की समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में देखने की आवश्यकता है।

जैव विविधता बचाने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी जरूरी

ग्रीन पीपल सोसायटी के अध्यक्ष राहुल भटनागर ने घटते वन, सिमटते जल स्रोत, बढ़ते शहरीकरण और पर्यावरण असंतुलन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पेड़ लगाना, पानी बचाना, कचरा कम करना और प्लास्टिक के उपयोग को सीमित करना जैसे छोटे कदम भी जैव विविधता संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

सुहेल मजबूर ने अति जल दोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, कीटनाशकों और रसायनों के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन पर पड़ रहे दुष्प्रभावों की जानकारी दी।

प्रकृति के साथ जीने का लिया संकल्प

कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने और जैव विविधता संरक्षण के लिए व्यक्तिगत स्तर पर कार्य करने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि यदि समय रहते फॉनल डाइवर्सिटी को पुनर्स्थापित करने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

कार्यक्रम में मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव सेडूराम यादव, मुख्य वन संरक्षक उदयपुर सुनील चिदरी, उप वन संरक्षक मुकेश सैनी, शैतान सिंह देवड़ा, यादवेंद्र सिंह, संजय गुप्ता, डॉ. ललित जोशी, वी.एस. राणा, यासीन पठान, डॉ. विजय कोहली, डॉ. सुमन भटनागर, अनिरुद्ध चुण्डावत, प्रीति मुर्डिया सहित वन विभाग के अधिकारी, कर्मचारी एवं ग्रीन पीपल सोसायटी के सदस्य उपस्थित रहे।
 

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