संतुष्टि प्राप्त करने के लिए भटक रहा है मनुष्य

मनुष्य को इस प्रकार की आत्म संतुष्टि कहीं नहीं मिली कि वह संतोषपूर्वक जीवन यापन कर सकें। वह आज भी जीवन के प्रति असंतुष्टि से संत्रस्त और अशान्त है। वह जो कुछ करता है उससें उसे हर्ष और आनन्द नही मिलता जो करता है वह उसे अपर्याप्त और अनुपयुक्त लगता है।

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संतुष्टि प्राप्त करने के लिए भटक रहा है मनुष्य

मनुष्य को इस प्रकार की आत्म संतुष्टि कहीं नहीं मिली कि वह संतोषपूर्वक जीवन यापन कर सकें। वह आज भी जीवन के प्रति असंतुष्टि से संत्रस्त और अशान्त है। वह जो कुछ करता है उससें उसे हर्ष और आनन्द नही मिलता जो करता है वह उसे अपर्याप्त और अनुपयुक्त लगता है।

अपने प्रति ही आत्म संतोष का मानव में भंयकर अभाव है । यही कारण है कि अक्सर मानव रोता हुआ जन्म लेता है। शिकायतें करता जीता है और छटपटाता हुआ दुनिया से चला जाता है।

उक्त विचार श्रमण संघीय महामंत्री सौभाग्य मुनि ‘कुमुद’ ने पंचायती नोहरा में आयोजित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि बढ़ती हुई हिंसा और भ्रष्टाचार के कारण मानवीय सोच में असुरक्षा और निराशा फैल रही है। हताश व्यक्ति अनेक दुष्कर्म कर बैठता है। जीवन जीने का व्यक्ति के पास सही मार्ग हो तो वह निश्चिन्तता पूर्वक अपना और देश का विकास करेगा वह अपकर्म क्यों कर अपनाएगा।

मुनि ने कहा कि व्यक्ति के जीवन जीने की दिशा गलत है,क्योंकि वह कषाय भाव के साथ जीवन जी रहा है। कषाय मानव को भी सही ढ़ंग से नही जीने देता है। कषाय भाव जीवन में खलबली मचाने को आता है। व्यक्ति को किसी दुष्कर्म की तरफ धकेल कर चला जीता है। तीर्थंकर सद्पुरूषों ने सभी कषाय भाव को क्रोध, मानव, माया और लोभ इस तरह इन चार भागों में बांट कर व्यक्त किया है। उतेजना अथवा आवेग के रूप में जो भी भाव उमड़ते है। उन्हें इन चारो में से किसी एक में हम समाविष्ट कर सकते है।

उन्होंने कहा कि शान्तिपूर्ण जीवन विकास के लिये कषाय भावों का ह्रास करना अत्यन्त आवश्यक है। मानव की जीवनी शक्तियां भी समरस कि धारा बनकर सौम्यता के साथ जीवन के धरातल पर बहती रहे वही सौम्यधारा जीवन में सफलता सार्थकता के फूल खिलाएगी। कषायो के तुफान को लेकर बहने वाली जीवन शक्तियां तो चारो तरफ विध्वंश ही पैदा करेगी।

मुनि ने बताया कि जीवन को आनन्दपूर्ण जीने के लिये धन, संपति और साधन महत्वपूर्ण नही है महत्वपूर्ण है अपनी मन:स्थिति। मन:स्थिति कषाय मुक्त है तो स्वर्गीय संपदा का उपभोग करनेवाले इन्द्र से भी साधारण सा दिखाई देनेवाला मानव महान है और सुखी है। द:ुख बाहर का उपादान है सुख चेतना का उपादान है इसे कषाय मुक्त होकर ही पाया जा सकता है। सभा को विकसित मुनि ने सम्बोधित किया। कार्यक्रम का संचालन महामंत्री हिम्मत बड़ाला ने किया।

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