मसूरी झील से बदलेगी कई गांवों की तकदीर ! मछली पालन के साथ रोजगार और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
Udaipur Times, New Delhi : गांवों के तालाब और झीलें अब सिर्फ पानी के स्रोत नहीं रहेंगे, बल्कि रोजगार, स्वरोजगार, पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकते हैं। गाजियाबाद की मसूरी झील इसी दिशा में एक उदाहरण के तौर पर सामने आ रही है। यहां मत्स्य पालन के साथ प्रशिक्षण और पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया जा रहा है।
मसूरी झील पर विकसित हो रहा यह मॉडल मछली पालन करने वाले किसानों और ग्रामीण युवाओं को पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक अपनाने का अवसर दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि तालाब और जलाशयों का बेहतर प्रबंधन कर मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
मछली पालन के लिए युवाओं को मिल रहा प्रशिक्षण
मसूरी झील पर युवाओं और मत्स्य पालकों को मछली पालन की बारीकियों के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण में तालाब प्रबंधन, पानी की गुणवत्ता बनाए रखने, मछलियों के लिए उचित आहार, रोग नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने जैसी तकनीकों की जानकारी दी जाती है।
इसके अलावा आधुनिक एरेशन तकनीक और पानी की निगरानी के तरीकों के बारे में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य मत्स्य पालकों को ऐसी तकनीक से जोड़ना है, जिससे कम संसाधनों में उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ाया जा सके।
प्रशिक्षण हासिल करने के बाद कई युवा मत्स्य पालन को व्यवसाय के तौर पर अपनाने और इस क्षेत्र में नए स्टार्टअप शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
तालाब से पर्यटन तक बढ़ेगी कमाई
मसूरी झील की खासियत यह है कि यहां मत्स्य पालन को पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है।
झील के आसपास नौकायन, एंगलिंग, स्थानीय खानपान और छोटे कियोस्क जैसी गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं। इससे ग्रामीण युवाओं के लिए मछली पालन के अलावा अतिरिक्त कमाई के रास्ते खुल सकते हैं।
अगर झील को व्यवस्थित तरीके से पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है तो स्थानीय लोगों को गाइड, नाव संचालन, खानपान, बिक्री और अन्य सेवाओं से जुड़े रोजगार भी मिल सकते हैं।
सिर्फ मछली बेचने तक सीमित नहीं रहेगी कमाई
मत्स्य पालन करने वाले परिवारों की आय अक्सर मछली उत्पादन और बिक्री पर निर्भर रहती है। लेकिन झील आधारित पर्यटन विकसित होने पर कमाई के कई अतिरिक्त साधन तैयार हो सकते हैं।
मछली पालन + पर्यटन + स्थानीय खानपान + नौकायन + एंगलिंग जैसी गतिविधियां एक साथ विकसित होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आधार मिल सकता है।इस मॉडल से युवाओं को गांव में ही रोजगार और स्वरोजगार के विकल्प मिलने की संभावना है।
गुणवत्तापूर्ण बीज और पानी की गुणवत्ता पर जोर
मत्स्य पालन विशेषज्ञों के अनुसार उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल अधिक मछलियां डालना पर्याप्त नहीं है। गुणवत्तापूर्ण बीज, पानी की सही गुणवत्ता, संतुलित आहार और रोग नियंत्रण बेहद जरूरी हैं।
तालाब के पानी में ऑक्सीजन का स्तर बनाए रखने के लिए एरेशन तकनीक का इस्तेमाल भी उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मसूरी झील पर दिए जा रहे प्रशिक्षण में इन्हीं आधुनिक तरीकों पर जोर दिया जा रहा है, ताकि मत्स्य पालक वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन कर सकें।
सरकारी योजनाओं का भी मिलेगा लोगों को लाभ
मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत अनुदान और आर्थिक सहायता का प्रावधान है। इन योजनाओं का लाभ लेकर किसान तालाब विकसित करने, मत्स्य पालन शुरू करने और जरूरी उपकरण खरीदने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि प्रशिक्षण, सरकारी सहायता और बाजार की सुविधा एक साथ उपलब्ध हो जाए तो मत्स्य पालन ग्रामीण युवाओं के लिए एक मजबूत स्वरोजगार मॉडल बन सकता है।
‘लेक टू प्लेट’ से किसान को बेहतर दाम, उपभोक्ता को मिल पाएंगी ताजी मछली
मसूरी झील जैसे मॉडल में अब ‘लेक टू प्लेट’ की अवधारणा को भी बढ़ावा देने की जरूरत बताई जा रही है। इसका उद्देश्य मछली को उत्पादन स्थल से सीधे उपभोक्ता तक स्वच्छ और सुरक्षित तरीके से पहुंचाना है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर लाइव और फ्रेश फिश मार्केट, कोल्ड चेन और बेहतर परिवहन व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे बीच के बिचौलियों की भूमिका कम होने और किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना है।
वहीं, उपभोक्ताओं को भी ताजी और गुणवत्तापूर्ण मछली उपलब्ध हो सकेगी।
विशेषज्ञ बोले- मछली पालन को रोजगार के साथ पोषण से जोड़ना जरूरी
प्रगतिशील मत्स्य पालक रजनीश कुमार के अनुसार मछली उत्पादन को केवल कारोबार के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इसे ग्रामीण रोजगार के साथ-साथ पोषण से भी जोड़ने की जरूरत है।
मछली प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में ‘फिश फॉर हेल्थ एंड वेल्थ’ की अवधारणा को बढ़ावा देकर उत्पादन और खपत दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। मसूरी झील जैसी पहल इस सोच को गांवों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है।
प्रदेश के दूसरे जिलों में भी तैयार होगा यही मॉडल
गाजियाबाद की मसूरी झील के बाद प्रदेश के अन्य जिलों में मौजूद सामुदायिक और निजी तालाबों को भी इसी तरह विकसित करने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
मत्स्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार प्रदेश में उपलब्ध जलस्रोतों को चिह्नित कर उनकी क्षमता के आधार पर मत्स्य पालन, प्रशिक्षण और अन्य गतिविधियों से जोड़ने की योजना तैयार की जा रही है।
अगर यह मॉडल दूसरे जिलों में लागू होता है तो हजारों ग्रामीण युवाओं और किसानों को स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं।
बिहार में भी जलकरों से रोजगार की बड़ी संभावना
जलस्रोतों को रोजगार से जोड़ने की संभावनाएं केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। नालंदा में 361 सरकारी जलकरों की बंदोबस्ती की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है और 15 सितंबर से नीलामी प्रस्तावित है।
इस तरह सरकारी जलस्रोतों को व्यवस्थित तरीके से मत्स्य पालन से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
युवाओं के लिए बन सकता है नया स्वरोजगार मॉडल
बदलते समय में ग्रामीण युवाओं के लिए केवल पारंपरिक खेती ही रोजगार का विकल्प नहीं है। मत्स्य पालन, फिश प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन, फिश मार्केट, पर्यटन और जलाशय आधारित सेवाओं में भी कारोबार की बड़ी संभावनाएं हैं।
मसूरी झील का मॉडल दिखाता है कि एक ही जलस्रोत को मछली उत्पादन, प्रशिक्षण, पर्यटन और रोजगार से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
जाने मसूरी झील मॉडल से क्या मिलेगा फायदा?
मछली उत्पादन बढ़ाने में मदद
ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार
मत्स्य पालकों की आय बढ़ाने का अवसर
झील आधारित पर्यटन को बढ़ावा
नौकायन और एंगलिंग से अतिरिक्त कमाई
स्थानीय खानपान और कियोस्क से रोजगार
फ्रेश फिश मार्केट और कोल्ड चेन की संभावनाएं
दूसरे गांवों के तालाबों के विकास का मॉडल
अगर मसूरी झील की तर्ज पर प्रदेश के अन्य तालाबों और जलस्रोतों को भी विकसित किया जाता है तो गांवों में जल संरक्षण के साथ रोजगार और पर्यटन का नया मॉडल तैयार हो सकता है। इससे ग्रामीण युवाओं को अपने गांव में ही कमाई के अवसर मिलेंगे और मत्स्य पालन स्थानीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकेगा।